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घर लौटे विद्यार्थी, बोले- यूक्रेन में बंकर में गुजारनी पड़ती थी रात
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घर लौटे विद्यार्थी, बोले- यूक्रेन में बंकर में गुजारनी पड़ती थी रात
भाटपाररानी/खुखुंदू (देवरिया)। रात में 12 बजे के करीब बम धमाका शुरू हो जाता था, आसमान नारंगी दिखने लगता था। बंकर में छिपकर रात गुजारनी पड़ती थी। जिंदगी बचाने के लिए 30-35 किलोमीटर पैदल भी चलना पड़ा। यह दास्तान, यूक्रेन से घर लौटे बेटे और बेटियों ने परिजनों को सुनाई तो वे भी सहम गए। माता-पिता की आंखों से आंसू टपक पड़े।
इन विद्यार्थियों ने बताया कि कई बार तो ऐसा लगा कि अब जिंदा लौटना मुमकिन नहीं है। खाने-पीने के लिए कुछ नहीं मिल रहा था। भूखे पेट कई-कई घंटे पैदल चलना पड़ा और बर्फीली हवा से ठंड लग रही थी।
खुखुंदू थाना क्षेत्र के जैतपुरा गांव निवासी अरमानुल्लाह सिद्दीकी के पिता अतिकुर्ररहमान स्थानीय कस्बे में निजी डॉक्टर हैं। उनके तीसरे नंबर के बेटे अरमानुल्लाह, यूक्रेन में एमबीबीएस के चौथे वर्ष के छात्र हैं। इस छात्र ने बताया कि जब शुरुआत में लड़ाई छिड़ी तो लगा जल्द माहौल शांत हो जाएगा। जब चार दिन बीत गया तो छात्र साथियों के साथ वह कीव से निकलकर लवीव जाने के लिए स्टेशन पर पहुंचे। उसी बीच सायरन बजने लगा और गोलीबारी शुरू हो गई। फिर आनन-फानन में विनिशिया के लिए ट्रेन पर सवार होकर चल दिए। वहां मेडिकल कॉलेज हास्टल में एक दिन ठहरने के बाद अगले दिन दोपहर को बस से 13 घंटा सफर कर लोन्या पहुंचे। वहां हंग्री चेक पोस्ट पार करके बूडा पेस्ट राजधानी पहुंच गए। वहां तीन दिन रहने के बाद फ्लाइट से दिल्ली पहुंचे। 38 मेडिकल विद्यार्थियों का जत्था एक साथ आया। उसमें यूपी, बिहार, साउथ और कश्मीर के भी विद्यार्थी थे। अरमानुल्लाह का कहना है कि रात 12 बजे से बमबारी शुरू होती थी तो सुबह तक सिलसिला चलता रहता था। इस दौरान पूरा आसमान नारंगी दिखाई देता था। उनका कहना है वहां पल-पल मौत का डर बना रहता था। हम अपने वतन वापसी की उम्मीद छोड़ चूके थे। अतिकुर्ररहमान और उनकी पत्नी खुशबू निशा ने बेटे की वतन वापसी का श्रेय प्रधानमंत्री को दिया है।
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दूसरी ओर, भाटपाररानी के भिंगारी बाजार स्थित न्यू प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र पर तैनात फार्मासिस्ट अभय गुप्ता की दो बेटियां काफी जद्दोजहद के बाद यूक्रेन से वापस पहुंची हैं। कई दिनों से उनका इंतजार कर रहे परिजन अब खुश हैं। दोनों बेटियों को माला पहनाकर उनका साहस बढ़ाया है। फार्मासिस्ट अभय गुप्ता, गोरखपुर के पादरी बाजार में मकान बनवा कर रहते हैं। उनकी दो बेटियां अंकिता गुप्ता व ज्योति गुप्ता विगत तीन वर्षों से यूक्रेन स्थित इवानो के फ्रांसिस्को मेडिकल यूनिवर्सिटी में एमबीबीएस तृतीय वर्ष की छात्रा हैं। उन्होंने बताया कि युद्ध की खबर मिलते ही वे और उनके परिवार के लोग घबरा गए थे। फिर केंद्र सरकार से बेटियों को वतन वापस लाने की गुहार लगाई। जब बेटियां वहां से अपनी तस्वीरें व वीडियो भेजती थीं, तब परिवार के लोगों को कुछ तसल्ली मिलती थी। अंकिता गुप्ता व ज्योति गुप्ता ने बताया कि डर इस कदर था कि न खाने की चिंता होती थी और पानी पीने की। सिर्फ अपना वतन दिखाई पड़ता था।
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भाटपाररानी/खुखुंदू (देवरिया)। रात में 12 बजे के करीब बम धमाका शुरू हो जाता था, आसमान नारंगी दिखने लगता था। बंकर में छिपकर रात गुजारनी पड़ती थी। जिंदगी बचाने के लिए 30-35 किलोमीटर पैदल भी चलना पड़ा। यह दास्तान, यूक्रेन से घर लौटे बेटे और बेटियों ने परिजनों को सुनाई तो वे भी सहम गए। माता-पिता की आंखों से आंसू टपक पड़े।
इन विद्यार्थियों ने बताया कि कई बार तो ऐसा लगा कि अब जिंदा लौटना मुमकिन नहीं है। खाने-पीने के लिए कुछ नहीं मिल रहा था। भूखे पेट कई-कई घंटे पैदल चलना पड़ा और बर्फीली हवा से ठंड लग रही थी।
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खुखुंदू थाना क्षेत्र के जैतपुरा गांव निवासी अरमानुल्लाह सिद्दीकी के पिता अतिकुर्ररहमान स्थानीय कस्बे में निजी डॉक्टर हैं। उनके तीसरे नंबर के बेटे अरमानुल्लाह, यूक्रेन में एमबीबीएस के चौथे वर्ष के छात्र हैं। इस छात्र ने बताया कि जब शुरुआत में लड़ाई छिड़ी तो लगा जल्द माहौल शांत हो जाएगा। जब चार दिन बीत गया तो छात्र साथियों के साथ वह कीव से निकलकर लवीव जाने के लिए स्टेशन पर पहुंचे। उसी बीच सायरन बजने लगा और गोलीबारी शुरू हो गई। फिर आनन-फानन में विनिशिया के लिए ट्रेन पर सवार होकर चल दिए। वहां मेडिकल कॉलेज हास्टल में एक दिन ठहरने के बाद अगले दिन दोपहर को बस से 13 घंटा सफर कर लोन्या पहुंचे। वहां हंग्री चेक पोस्ट पार करके बूडा पेस्ट राजधानी पहुंच गए। वहां तीन दिन रहने के बाद फ्लाइट से दिल्ली पहुंचे। 38 मेडिकल विद्यार्थियों का जत्था एक साथ आया। उसमें यूपी, बिहार, साउथ और कश्मीर के भी विद्यार्थी थे। अरमानुल्लाह का कहना है कि रात 12 बजे से बमबारी शुरू होती थी तो सुबह तक सिलसिला चलता रहता था। इस दौरान पूरा आसमान नारंगी दिखाई देता था। उनका कहना है वहां पल-पल मौत का डर बना रहता था। हम अपने वतन वापसी की उम्मीद छोड़ चूके थे। अतिकुर्ररहमान और उनकी पत्नी खुशबू निशा ने बेटे की वतन वापसी का श्रेय प्रधानमंत्री को दिया है।
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दूसरी ओर, भाटपाररानी के भिंगारी बाजार स्थित न्यू प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र पर तैनात फार्मासिस्ट अभय गुप्ता की दो बेटियां काफी जद्दोजहद के बाद यूक्रेन से वापस पहुंची हैं। कई दिनों से उनका इंतजार कर रहे परिजन अब खुश हैं। दोनों बेटियों को माला पहनाकर उनका साहस बढ़ाया है। फार्मासिस्ट अभय गुप्ता, गोरखपुर के पादरी बाजार में मकान बनवा कर रहते हैं। उनकी दो बेटियां अंकिता गुप्ता व ज्योति गुप्ता विगत तीन वर्षों से यूक्रेन स्थित इवानो के फ्रांसिस्को मेडिकल यूनिवर्सिटी में एमबीबीएस तृतीय वर्ष की छात्रा हैं। उन्होंने बताया कि युद्ध की खबर मिलते ही वे और उनके परिवार के लोग घबरा गए थे। फिर केंद्र सरकार से बेटियों को वतन वापस लाने की गुहार लगाई। जब बेटियां वहां से अपनी तस्वीरें व वीडियो भेजती थीं, तब परिवार के लोगों को कुछ तसल्ली मिलती थी। अंकिता गुप्ता व ज्योति गुप्ता ने बताया कि डर इस कदर था कि न खाने की चिंता होती थी और पानी पीने की। सिर्फ अपना वतन दिखाई पड़ता था।