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शहर नहीं जाना चाहते मजदूर, गांव में तलाशेंगें रोजगार
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खोही में लॉकडाउन के 38 दिन गुजर चुके हैं, लेकिन मजदूरों एवं कामगारों का पलायन रुकने का नाम नहीं ले रहा। कोरोना महामारी के चलते लॉकडाउन से आजीविका का संकट खड़ा हो गया है। प्रवासी मजदूरों के शहरों से गांव वापस लौटने का सिलसिला निरंतर जारी है। अब गांव के युवा बाहर नहीं जाना चाहते।
पलायन की रफ्तार को थामने के लिए मजदूर एवं कामगारों के रिवर्स माइग्रेशन को ध्यान में रखकर भारत रत्न नानाजी देशमुख का प्रकल्प दीनदयाल शोध संस्थान एक ठोस रणनीति बनाने में लगा हुआ है। प्रधान सचिव अतुल जैन ने स्थानीय संसाधनों और लोकल टैलेंट को बढ़ावा देने की बात कही है। दीनदयाल शोध संस्थान ने इसके लिए अपने सभी प्रकल्पों के कार्यकर्ताओं को सर्वेक्षण कार्य में लगाया हुआ है।
शहरों से लौटे प्रवासी मजदूर एवं कामगारों के सर्वे के लिए एक फार्मेट तैयार किया गया है। जिसमें 36 तरह के बिंदुओं को रखा गया है, उनमें से अधिकांश उनकी आजीविका पर आधारित है। संगठन सचिव अभय महाजन ने बताया कि सर्वेक्षण में जो जानकारी निकल कर आ रही है, उसमें आधे से ज्यादा लोग काम के लिए अब पुन: बाहर नहीं जाना चाहते हैं। इसलिए अब गांव में ही रोजगार के अवसर तलाशने होंगे।
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पलायन की रफ्तार को थामने के लिए मजदूर एवं कामगारों के रिवर्स माइग्रेशन को ध्यान में रखकर भारत रत्न नानाजी देशमुख का प्रकल्प दीनदयाल शोध संस्थान एक ठोस रणनीति बनाने में लगा हुआ है। प्रधान सचिव अतुल जैन ने स्थानीय संसाधनों और लोकल टैलेंट को बढ़ावा देने की बात कही है। दीनदयाल शोध संस्थान ने इसके लिए अपने सभी प्रकल्पों के कार्यकर्ताओं को सर्वेक्षण कार्य में लगाया हुआ है।
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शहरों से लौटे प्रवासी मजदूर एवं कामगारों के सर्वे के लिए एक फार्मेट तैयार किया गया है। जिसमें 36 तरह के बिंदुओं को रखा गया है, उनमें से अधिकांश उनकी आजीविका पर आधारित है। संगठन सचिव अभय महाजन ने बताया कि सर्वेक्षण में जो जानकारी निकल कर आ रही है, उसमें आधे से ज्यादा लोग काम के लिए अब पुन: बाहर नहीं जाना चाहते हैं। इसलिए अब गांव में ही रोजगार के अवसर तलाशने होंगे।
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