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Chandauli News: चरवाहों को रेहड़ा के जंगल में मिली थी मां की प्रतिमा
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कंदवा। क्षेत्र के चिरईगांव में कर्मनाशा नदी के तट पर स्थित मां रेहड़ा भगवती का मंदिर ऐतिहासिक महत्व का माना जाता है। यहां की देवी स्वयंभू मानी जाती हैं। तकरीबन 500 साल पहले यहां के जंगल में देवी की प्रतिमा मिली थी। उसके बाद लोगों ने मंदिर बनवा दिया। यहां दूर-दूर से श्रद्धालु दर्शन करने आते हैं।
चिरईगांव में कर्मनाशा नदी के तट पर स्थित मां रेहड़ा भगवती शक्ति एवं भक्ति की प्रतीक हैं। मंदिर का इतिहास रेहड़ा नाम के जंगल से जुड़ा हुआ है। इस मंदिर की स्थापना के बारे में गांव के बड़े बुजुर्गों का कहना है कि करीब 500 वर्ष पूर्व रेहड़ा के जंगल में पशुओं को चराते समय चरवाहों को मां की प्रतिमा जमीन में धंसी हुई दिखी थी। कुछ समय बाद धीरे धीरे वह प्रतिमा जमीन के ऊपर दिखने लगी। तब चरवाहों ने गांव में यह बात बताई। गांव के लोग वहां पूजा करने पहुंचने लगे। फिर एक छोटा सा मंदिर बनवाया गया।
फक्कड़ बाबा ने मंदिर में रहकर साधना शुरू कर दी। उनके ब्रह्मलीन होने पर मंदिर के बगल में उनकी समाधि बनाई गई। इस समाधि पर भी दर्शन-पूजन करने श्रद्धालु पहुंचते हैं। वर्ष 2014 त्रिदंडी स्वामी के शिष्य सुंदर राज जी महाराज ने लक्ष्मी नारायण महायज्ञ करवाया। उसके बाद गांव के लोगों ने मिलकर भव्य मंदिर का निर्माण कराया।
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मंदिर के पुजारी दीनानाथ पांडेय और अरविंद ने बताया कि मां रेहड़ा भगवती के दर्शन के लिए क्षेत्र के साथ-साथ बिहार, झारखंड, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु आते हैं। मंदिर से जुड़ी किंवदंती है कि इसकी रखवाली नाग देवता करते हैं। मंदिर के आसपास नाग दिखते हैं लेकिन कभी किसी को नुकसान नहीं पहुंचाया।
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चिरईगांव में कर्मनाशा नदी के तट पर स्थित मां रेहड़ा भगवती शक्ति एवं भक्ति की प्रतीक हैं। मंदिर का इतिहास रेहड़ा नाम के जंगल से जुड़ा हुआ है। इस मंदिर की स्थापना के बारे में गांव के बड़े बुजुर्गों का कहना है कि करीब 500 वर्ष पूर्व रेहड़ा के जंगल में पशुओं को चराते समय चरवाहों को मां की प्रतिमा जमीन में धंसी हुई दिखी थी। कुछ समय बाद धीरे धीरे वह प्रतिमा जमीन के ऊपर दिखने लगी। तब चरवाहों ने गांव में यह बात बताई। गांव के लोग वहां पूजा करने पहुंचने लगे। फिर एक छोटा सा मंदिर बनवाया गया।
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फक्कड़ बाबा ने मंदिर में रहकर साधना शुरू कर दी। उनके ब्रह्मलीन होने पर मंदिर के बगल में उनकी समाधि बनाई गई। इस समाधि पर भी दर्शन-पूजन करने श्रद्धालु पहुंचते हैं। वर्ष 2014 त्रिदंडी स्वामी के शिष्य सुंदर राज जी महाराज ने लक्ष्मी नारायण महायज्ञ करवाया। उसके बाद गांव के लोगों ने मिलकर भव्य मंदिर का निर्माण कराया।
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मंदिर के पुजारी दीनानाथ पांडेय और अरविंद ने बताया कि मां रेहड़ा भगवती के दर्शन के लिए क्षेत्र के साथ-साथ बिहार, झारखंड, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु आते हैं। मंदिर से जुड़ी किंवदंती है कि इसकी रखवाली नाग देवता करते हैं। मंदिर के आसपास नाग दिखते हैं लेकिन कभी किसी को नुकसान नहीं पहुंचाया।