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मुहर्रम: पांच पीढ़ी से ताजिए की परंपरा निभा रहे हिन्दू, यहीं होती है दुर्गा पूजा भी; पढ़ें विश्वास की कहानी

Fri, 04 Jul 2025 05:43 AM IST
अमन विश्वकर्मा अमर उजाला नेटवर्क, चंदौली।
अमर उजाला नेटवर्क, चंदौली। Published by: अमन विश्वकर्मा Updated Fri, 04 Jul 2025 05:43 AM IST
सार

उत्तर प्रदेश के चंदौली जिले में हिन्दू-मुस्लिम एकता की मिसाल पेश करने वाला परिवार कई वर्षों से मुहर्रम मनाता चला आ रहा है। इसी स्थाना पर दुर्गा पूजा का भी आयोजन होता है। परिवार के लोग दोनों त्योहारों को आस्था के साथ मनाते आ रहे हैं।

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Muharram Hindus have been following tradition of Tazia for five generations Durga Puja is also held
चंदाैली के दुलहीपुर में ताजिया बनाते हिन्दू परिवार के लोग। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

Muharram: जब देश के कई हिस्सों में मजहबी तनाव और कट्टरता की खबरें सुर्खियों में रहती हैं, उसी समय चंदौली जिले के दुलहीपुर गांव का एक हिंदू परिवार कौमी एकता की मिसाल बनकर सामने आया है। पटेल बस्ती स्थित यह परिवार पिछले पांच पीढ़ियों से मोहर्रम में ताजिए सजाता आ रहा है। वह भी पूरी श्रद्धा और परंपरा के साथ। बड़ी बात कि दुर्गा पूजा में जहां मां दुर्गा की पूजा करते हैं, वहीं मोहर्रम पर ताजिया को भी सजाते हैं।

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पांचवी पीढी में ताजिए की तैयारी में जुटे रतन कुमार पटेल बताते हैं कि यह परंपरा उनके पूर्वज शिवपाल पटेल से शुरू हुई थी। उन्हें संतान की प्राप्ति के लिए दुलदुल के सामने मन्नत मांगी गई थी। उसी वर्ष पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई, और तभी से उन्होंने मोहर्रम में ताजिया सजाना शुरू किया। वह परंपरा आज भी जस की तस निभाई जा रही है। 
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रतन पटेल के दादा रामधारी सिंह पटेल स्वतंत्रता संग्राम से भी जुड़े रहे। उनके खिलाफ ब्रिटिश सरकार ने गोली मारने का आदेश जारी किया था। लेकिन मोहर्रम के दौरान इमाम चौक पर ताजिया रखने की परंपरा से वह विचलित हो गए। तब वह गुप्त रूप से दरोगा मोहम्मद जाफर के पास पहुंचे, जिन्होंने उन्हें ताजिए के पास छिपाकर ब्रिटिश सैनिकों से बचाया। तभी से यह ताजिया ‘एकता और मानवता का प्रतीक’ बन गया।

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हिंदू-मुस्लिम साथ निभाते हैं रस्में, मिलकर सुनते हैं मजलिस
हर साल मोहर्रम में यह हिंदू परिवार पूरे श्रद्धा के साथ इमामबाड़ा सजाता है। महिलाएं मोमबत्तियां और अगरबत्तियां जाती हैं हैं। वहीं मुस्लिम समुदाय के सैयद परिवार से जुड़े मौलाना मजलिस पढ़ने आते हैं। पहले सैयद सिब्ते मोहम्मद जाफरी तकरीर करते थे, अब उनके पोते राहिद जाफरी और जाफर मेहंदी इस परंपरा को निभा रहे हैं।

परिवार की सदस्य कलावती देवी ने बताया कि उन्हें हर साल मोहर्रम का बेसब्री से इंतजार रहता है। उनकी बेटियां और रिश्तेदार भी शामिल होकर मन्नतें मांगती हैं। मजलिस के दौरान पटेल परिवार के सभी सदस्य फर्श पर बैठकर तकरीर सुनते हैं, मातम करते हैं और आए हुए लोगों को प्रसाद भी वितरित करते हैं।

नफरत के बीच मोहब्बत का पैगाम
आज जब समाज में धार्मिक विभाजन की रेखाएं और गहरी हो रही हैं, तब दुलहीपुर का यह परिवार एक ऐसे उदाहरण के रूप में सामने आया है, जो यह बताता है कि इंसानियत और आस्था मजहब की दीवारों से कहीं ऊपर होती है।

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