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पढ़ाई के साथ मूर्तिकला में भी पारंगत हो रही आठ साल की आंचल
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पीडीडीयू नगर। यदि शिक्षा जरूरी है तो कौशल सफलता की धूरी है। सरकार भी कौशल विकास का लगातार प्रयास कर रही है। नगर की आठ वर्षीय किशोरी आंचल शिक्षा के साथ कौशल के इस जीवन मंत्र को पूर्णत: आत्मसात कर चुकी है। पढ़ाई के साथ-साथ वह अपने पिता के पुश्तैनी पेशे मूर्तिकला में भी पारंगत हो रही है। आंचल ने होलिका के प्रतिमा के रंगरोगन, परिधान और सजावट का पूरा कार्य अपने कंधों पर ले लिया है।
नगर के नई बस्ती निवासी दशरथ प्रजापति मूर्तिकार हैं। मूर्तिकला उनका पुश्तैनी पेशा है। दुर्गा पूजा, सरस्वती पूजा, विश्वकर्मा पूजा और होलिका आदि त्योहार पर प्रतिमा बनाकर वे हजारों का कारोबार करते हैं। इधर उनकी आठ वर्षीय बेटी आंचल भी उनके पेशे में बढ़चढ़ कर भाग ले रही है। वह काफी कम उम्र में मूर्तिकला की बारीकियां सीख चुकी है। आंचल नगर के एलबीएस स्कूल में कक्षा तीन की छात्रा है। पढ़ाई के साथ-साथ समय निकालकर वह पिता के कारोबार में भी हाथ बंटाती है। होलिका पर इस बार उसके पिता ने केवल प्रतिमा बनाई है। उसके बाद रंगरोगन, परिधान और सजावट का पूरा काम आंचल ने अपने जिम्मे ले लिया है। शनिवार को वह पूरे तन्मयता के साथ मूर्ति में एक-एक गोटे और सितारों को लगा रही थी। आंचल की दुकान में एक हजार से लेकर पांच हजार तक की होलिका की प्रतिमाएं डिमांड पर बनाई गई थीं। जिनका पूरा सजावट का काम आंचल ने किया है। आंचल मूर्तिकला में इतनी पांरगत हो गई है कि उसके काम करने के दौरान सहायता या निर्देश के लिए पास में उसके पिता या कोई और परिजन नहीं थे। सबको विश्वास है कि आंचल सबकुछ ठीक से कर लेगी। वैसे तो आंचल का सपना पढ़-लिख कर अधिकारी बनने का है पर मूर्तिकला भी उसे बेहद पसंद है। पिता ने बताया कि मूर्तिकला में आंचल का खूब मन लगता है। अगर इसी लगन से काम करती रही तो 13-15 साल में ही यह मूर्तिकला में पूरी तरह से पारंगत हो जाएगी।
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नगर के नई बस्ती निवासी दशरथ प्रजापति मूर्तिकार हैं। मूर्तिकला उनका पुश्तैनी पेशा है। दुर्गा पूजा, सरस्वती पूजा, विश्वकर्मा पूजा और होलिका आदि त्योहार पर प्रतिमा बनाकर वे हजारों का कारोबार करते हैं। इधर उनकी आठ वर्षीय बेटी आंचल भी उनके पेशे में बढ़चढ़ कर भाग ले रही है। वह काफी कम उम्र में मूर्तिकला की बारीकियां सीख चुकी है। आंचल नगर के एलबीएस स्कूल में कक्षा तीन की छात्रा है। पढ़ाई के साथ-साथ समय निकालकर वह पिता के कारोबार में भी हाथ बंटाती है। होलिका पर इस बार उसके पिता ने केवल प्रतिमा बनाई है। उसके बाद रंगरोगन, परिधान और सजावट का पूरा काम आंचल ने अपने जिम्मे ले लिया है। शनिवार को वह पूरे तन्मयता के साथ मूर्ति में एक-एक गोटे और सितारों को लगा रही थी। आंचल की दुकान में एक हजार से लेकर पांच हजार तक की होलिका की प्रतिमाएं डिमांड पर बनाई गई थीं। जिनका पूरा सजावट का काम आंचल ने किया है। आंचल मूर्तिकला में इतनी पांरगत हो गई है कि उसके काम करने के दौरान सहायता या निर्देश के लिए पास में उसके पिता या कोई और परिजन नहीं थे। सबको विश्वास है कि आंचल सबकुछ ठीक से कर लेगी। वैसे तो आंचल का सपना पढ़-लिख कर अधिकारी बनने का है पर मूर्तिकला भी उसे बेहद पसंद है। पिता ने बताया कि मूर्तिकला में आंचल का खूब मन लगता है। अगर इसी लगन से काम करती रही तो 13-15 साल में ही यह मूर्तिकला में पूरी तरह से पारंगत हो जाएगी।
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