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समय के साथ बदल गया होली मनाने का अंदाज
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कंदवा। ग्रामीण क्षेत्र के बुजुर्ग अपने समय और वर्तमान की होली में काफी बदलाव महसूस कर रहे हैं। उनके लिए होली संस्कृति और संस्कार से जुड़ी थी लेकिन अब होली में फूहड़पन व राग-द्वेष इन्हें कचोट रहा है। बातचीत में इन्होंने अपने विचार इस प्रकार व्यक्त किए।
बरहनी विकास खंड के जमुड़ा गांव निवासी राजनेत सिंह का कहना है कि पहले होली शिष्टाचार से मनाई जाती थी लेकिन अब होली के नाम पर अशिष्टता होती है। पहले गाए जाने वाले होली के पारंपरिक गीतों का स्थान अब फूहड़ गीतों ने ले लिया है। बरहनी गांव निवासी हरिद्वार सिंह ने कहा कि पहले रंग, गोबर, कीचड़-माटी की होली होती थी। अब उसके स्थान पर जले मोबिल, केमिकल युक्त रंगों व वार्निश आदि का इस्तेमाल धड़ल्ले से हो रहा है। इससे चर्म रोग होने का खतरा बना रहता है। अब होली के नाम पर किसी के कपड़े फाड़ देना और नशा कर कुछ भी बक देना देना आम बात हो गई है। पहले होली में मजाक भी काफी शालीनता से होता था पर अब फूहड़ता होती है। अमड़ा गांव निवासी अनिल सिंह का कहना है कि पहले कई माह पूर्व से ही फाग गीत शुरू हो जाते थे। पुरुष गांव की चौपाल पर इकठ्ठा होते थे और महिलाएं घरों में पकवान की तैयारियों में जुट जाती थीं। अफसोस के साथ कहा कि अब पहले वाली होली की वह मिठास नहीं रही। घोसवा गांव निवासी गिरजा सिंह ने कहा कि पहले होली शांतिपूर्वक उत्साह से खेली जाती थी। होली पर बजने वाले गीत देश की संस्कृति से जुड़े होते थे लेकिन अब तो अश्लील गीत शर्मिंदगी का कारण बने हुए हैं। वहीं मां मंशा देवी पीजी कालेज के समाज शास्त्र विभाग के नेट क्वालीफायर सुनील कुमार का कहना है कि लोगों के बीच अपनत्व कम हुआ है और दूरियां बढ़ी हैं। पश्चिमी सभ्यता अपनाने के चक्कर में लोग संस्कारों को भूलते जा रहे हैं।
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बरहनी विकास खंड के जमुड़ा गांव निवासी राजनेत सिंह का कहना है कि पहले होली शिष्टाचार से मनाई जाती थी लेकिन अब होली के नाम पर अशिष्टता होती है। पहले गाए जाने वाले होली के पारंपरिक गीतों का स्थान अब फूहड़ गीतों ने ले लिया है। बरहनी गांव निवासी हरिद्वार सिंह ने कहा कि पहले रंग, गोबर, कीचड़-माटी की होली होती थी। अब उसके स्थान पर जले मोबिल, केमिकल युक्त रंगों व वार्निश आदि का इस्तेमाल धड़ल्ले से हो रहा है। इससे चर्म रोग होने का खतरा बना रहता है। अब होली के नाम पर किसी के कपड़े फाड़ देना और नशा कर कुछ भी बक देना देना आम बात हो गई है। पहले होली में मजाक भी काफी शालीनता से होता था पर अब फूहड़ता होती है। अमड़ा गांव निवासी अनिल सिंह का कहना है कि पहले कई माह पूर्व से ही फाग गीत शुरू हो जाते थे। पुरुष गांव की चौपाल पर इकठ्ठा होते थे और महिलाएं घरों में पकवान की तैयारियों में जुट जाती थीं। अफसोस के साथ कहा कि अब पहले वाली होली की वह मिठास नहीं रही। घोसवा गांव निवासी गिरजा सिंह ने कहा कि पहले होली शांतिपूर्वक उत्साह से खेली जाती थी। होली पर बजने वाले गीत देश की संस्कृति से जुड़े होते थे लेकिन अब तो अश्लील गीत शर्मिंदगी का कारण बने हुए हैं। वहीं मां मंशा देवी पीजी कालेज के समाज शास्त्र विभाग के नेट क्वालीफायर सुनील कुमार का कहना है कि लोगों के बीच अपनत्व कम हुआ है और दूरियां बढ़ी हैं। पश्चिमी सभ्यता अपनाने के चक्कर में लोग संस्कारों को भूलते जा रहे हैं।
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