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यूपी में महज एक महिला चिकित्सक के भरोसे है सैकड़ों जिंदगियां

Ghaziabad Bureau गाजियाबाद ब्यूरो
Updated Thu, 16 Jan 2020 11:36 PM IST
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amar ujala - फोटो : amar ujala
यूपी में महज एक महिला चिकित्सक के भरोसे है सैकड़ों जिंदगियां
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चेतन शर्मा
बुलंदशहर। जिले में बाल रोग विशेषज्ञों की कमी चल रही है। वहीं, जिला महिला अस्पताल में बच्चों के उपचार के लिए बने एसएनसीयू में दो चिकित्सकों के स्थान पर वर्तमान में महज एक महिला चिकित्सक हैं जो बीमार बच्चों का उपचार करती हैं। पूर्व में रात्रि के समय चिकित्सक न होने पर वार्ड में भर्ती दो नवजातों की स्टाफ की लापरवाही के चलते मौत हो चुकी है।
जिला महिला अस्पताल में प्रतिदिन 500 के करीब गर्भवती महिलाएं जांच के लिए आती है और वहीं, प्रसव के लिए करीब 100 से अधिक महिलाएं भर्ती होती है। प्रसव के बाद नवजात की हालत गंभीर होने पर उसकी जांच करने के लिए कोई बाल रोग विशेषज्ञ तैनात नहीं है। आकस्मिक समय पर जिला अस्पताल के बाल रोग विशेषज्ञ को बुलाया जाता है। अफसरों की मानें तो जिले में सीएचसी-पीएचसी समेत अन्य सरकारी चिकित्सालयों में बाल रोग विशेषज्ञ की कमी चल रही है। जिले में मात्र तीन चिकित्सालयों में चार बाल रोग विशेषज्ञ तैनात हैं। स्टाफ की कमी होने से कामकाज काफी हद तक प्रभावित हो रहा है। वहीं, सरकारी चिकित्सालयों में बच्चों के उपचार की कोई खास व्यवस्था न होने पर इसका खामियाजा परिजनों को उठाना पड़ रहा है। सीएचसी-पीएचसी समेत अन्य निजी अस्पतालों में उपचार के बाद बच्चों की हालत में सुधार न होने पर परिवार के लोग बच्चों को लेकर जिला महिला अस्पताल पहुंचते हैं, लेकिन यहां भी स्थिति काफी खराब हैं। जिला महिला अस्पताल में भी चिकित्सकों के साथ स्टाफ की भारी कमी है। वहीं, गंभीर बच्चों के लिए बना एसएनसीयू वार्ड में भी स्टाफ की कमी वर्षों से चल रही है। वार्ड में दो के सापेक्ष वर्तमान में एक महिला चिकित्सक के भरोसे ही संचालित किया जा रहा है।
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आठ बेड की है क्षमता, चार अतिरिक्त
एसएनसीयू वार्ड की चिकित्सका डॉ. शालिनी तिवारी ने बताया कि वार्ड में नवजातों की देखरेख के लिए 10 स्टाफ नर्स, तीन वार्ड आया तैनात है। साथ ही साफ-सफाई और सुरक्षा को लेकर तीन-तीन कर्मी तैनात हैं। उनकी देखरेख में ही नवजात बच्चों का उपचार होता है। बताया कि शासन की ओर से वार्ड आठ बेड का है, जबकि अधिक बच्चे आने पर चार बेड अतिरिक्त लगाए गए हैं।
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तीन बेड पर एक चिकित्सक के है आदेश
अफसरों की मानें तो एसएनसीयू वार्ड में बेड के हिसाब से 12 बेड पर तीन चिकित्सक होने चाहिए, लेकिन वर्तमान में एसएनसीयू वार्ड महज एक चिकित्सक के सहारे चल रहा है। इसका नतीजा यह है कि आकस्मिक समय पर चिकित्सक के आने का इंतजार किया जाता है। साथ ही अस्पताल में आने वाले गंभीर नवजातों को चिकित्सक के ना होने पर रेफर कर दिया जाता हैं। इसकी वजह से गत 11 माह में वार्ड में भर्ती नवजातों में से 214 बच्चों को रेफर किया गया, जबकि 11 बच्चों के परिजन उपचार को बीच में छोड़कर ले गए।
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लापरवाही के चलते दिसंबर 2017 में हो गई थी दो नवजातों की मौत
वर्ष 2017 में 11/12 दिसंबर की रात्रि जिला महिला अस्पताल के एसएनसीयू वार्ड में भर्ती दो नवजातों की मौत हो गई थी। विभागीय अफसरों ने वार्ड में बिजली न होने की शिकायत मिलने पर जनरेटर कर्मी पर कार्रवाई के आदेश दिए थे। इसके बाद मामले में अन्य कर्मचारियों की लापरवाही भी सामने आई थी। मामले को शासन द्वारा संज्ञान लेने पर सीएमओ ने एक जांच कमेटी बनाकर घटना के दिन एसएनसीयू वार्ड में तैनात स्टाफ से स्पष्टीकरण देने के आदेश दिए थे लेकिन अफसरों ने जनरेटर कर्मी पर कार्रवाई कर मामले को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया। जबकि अन्य कर्मियों को चेतावनी देकर छोड़ दिया गया। इसका नतीजा यह है कि अभी भी वार्ड में तैनात स्टाफ द्वारा लापरवाही बरती जा रही हैं। एक कर्मी ने बताया कि चिकित्सक के रहने पर स्टाफ कार्य करता है और उनके जाने के बाद लापरवाही बरती जाती हैं। 24 घंटे में मात्र पांच घंटे ही चिकित्सका वार्ड में मौजूद रहती हैं। शेष समय नवजात स्टाफ के हवाले रहते हैं।

कोट -----------
एसएनसीयू वार्ड में आने वाले नवजातों को भर्ती कर चिकित्सकों की देखरेख में उपचार किया जाता हैं। अगर कोई कर्मी लापरवाही बरत रहा हैं तो इसकी जांच की जाएगी। साथ ही एसएनसीयू वार्ड में एक अन्य चिकित्सक को अटैच किया हुआ हैं, जो इस समय अवकाश पर हैं। अन्य स्टाफ की तैनाती के लिए शासन से मांग की जा चुकी हैं। - डॉ. केएन तिवारी, मुख्य चिकित्सा अधिकारी, बुलंदशहर
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