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अंग्रेजों के आगे नहीं झुके आजादी के दीवाने, भर दी जेल

Wed, 09 Aug 2017 06:14 PM IST
अमर उजाला ब्यूरो, बदायूं
अमर उजाला ब्यूरो, बदायूं Updated Wed, 09 Aug 2017 06:14 PM IST
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these freedom fighters not let down against britishers

बदायूं के क्रांतिकारियों ने भारत की आजादी के लिए हुए संग्राम में बढ़चढ़ कर हिस्सा लिया। 1857 की पहली क्रांति से लेकर 1947 में देश की स्वतंत्रता तक बदायूं के क्रांतिकारियों का जिक्र है। आजादी के दीवानों ने नमक आंदोलन, सविनय अवज्ञा आंदोलन, सत्याग्रह आंदोलन और अंग्रेजों भारत छोड़ो आंदोलन में क्रांतिकारियों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम किया। कई क्रांतिकारियों को अंग्रेज हुक्मरानों ने फांसी दे दी तो वहीं आजादी के कई दीवानों को जेल में रखकर यातनाएं दीं। कलक्ट्रेट में मौजूद गजेटियर और स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास से जुड़ी किताबों में इसका उल्लेख भी है।       

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स्वतंत्रता आंदोलन की कड़ी में 1941 में सत्याग्रह शुरू हो चुका था। सदर तहसील क्षेत्र के ग्राम नगला निवासी क्रांतिकारी रघुवीर सहाय को बड़े नेताओं ने निर्देशित किया कि वह बदायूं में सत्याग्रह शुरू करें। इस पर रघुवीर सहाय ने ग्राम सुधार के चेयरमैन पद से त्यागपत्र देकर सत्याग्रह शुरू करने के लिए जिला कलक्टर को पत्र लिखा। पत्र में बताया गया कि वह सात फरवरी 1941 को मोअज्जमपुर से सत्याग्रह शुरू करेंगे। रघुवीर सहाय छह फरवरी को मोअज्जमपुर पहुंच गए। यहां वह लाला बाबूराम के घर ठहरे। किसी ने इसकी सूचना अंग्रेज अफसरों को दे दी। इस पर अंग्रेज पुलिस रघुवीर सहाय को गिरफ्तार कर उसहैत थाने ले लाई। सात फरवरी 1941 को उन्हें जेल भेज दिया गया। जेल में सत्याग्रही आपस में कोई योजना न बना पाएं, इसलिए रघुवीर सहाय को फतेहगढ़ सेंट्रल जेल भेज दिया गया। 19 सितंबर 1941 को उन्हें फिर बदायूं लाया गया। उनके खिलाफ धारा 38/121 डीआईआर (40/41) के तहत मुकदमा चलाया गया। दोषी करार देते हुए कोर्ट ने उन्हें नौ महीने कैद और दो सौ रुपये जुर्माने की सजा सुनाई। रघुवीर सहाय को सजा सुनाए जाने के बाद सैकड़ों क्रांतिकारियों ने गिरफ्तारियां दीं। 529 बंदी और कैदियों की क्षमता वाली जिला जेल में उस वक्त बंदियों की संख्या 1200 के पार हो गई थी।        

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