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एक्सप्लेनर: क्या है एससीओ, क्यों इस साल की बैठक भारत के लिए पहले से भी ज्यादा अहम, पीएम मोदी की रणनीति क्या?
Mon, 31 Aug 2026 03:10 PM IST
कीर्तिवर्धन मिश्र
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
Published by: कीर्तिवर्धन मिश्र
Updated Mon, 31 Aug 2026 03:10 PM IST
सार
शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) के शिखर सम्मेलन में हिस्सा लेने के लिए पीएम मोदी किर्गिस्तान के बिश्केक में हैं। जानिए क्या है शंघाई सहयोग संगठन, इसकी आर्थिक और सैन्य ताकत और भारत के लिए इस शिखर सम्मेलन के रणनीतिक मायने।
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एससीओ सम्मेलन।
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आज शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) के शिखर सम्मेलन में हिस्सा लेने के लिए किर्गिस्तान की राजधानी बिश्केक में मौजूद हैं। इस सम्मेलन से इतर पीएम मोदी किर्गिस्तान में कुछ द्विपक्षीय बैठकों में हिस्सा लेंगे। गौरतलब है कि भारत न सिर्फ एससीओ का एक अहम हिस्सा है, बल्कि इसके सबसे ताकतवर देशों में शामिल है। पीएम मोदी किर्गिस्तान के राष्ट्रपति सादिर जैपारोव के निमंत्रण पर 31 अगस्त से 1 सितंबर के बीच होने वाले इस सम्मेलन में हिस्सा लेंगे।
ऐसे में यह जानना अहम है कि आखिर यह शंघाई सहयोग संगठन क्या है? इसमें कौन-कौन से देश शामिल हैं? इनकी आर्थिक और सैन्य ताकत कितनी ज्यादा है? भारत के लिए इस बार एससीओ सम्मेलन क्यों बेहद अहम है और इसके लिए पीएम मोदी की तरफ से क्या तैयारी की गई है? आइये जानते हैं...
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ऐसे में यह जानना अहम है कि आखिर यह शंघाई सहयोग संगठन क्या है? इसमें कौन-कौन से देश शामिल हैं? इनकी आर्थिक और सैन्य ताकत कितनी ज्यादा है? भारत के लिए इस बार एससीओ सम्मेलन क्यों बेहद अहम है और इसके लिए पीएम मोदी की तरफ से क्या तैयारी की गई है? आइये जानते हैं...
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पहले जानें- क्या है शंघाई सहयोग संगठन?
शंघाई सहयोग संगठन जिसे अंग्रेजी में शंघाई को-ऑपरेशन ऑर्गनाइजेशन (एससीओ) भी कहा जाता है दुनिया के यूरेशियाई हिस्से में आने वाले देशों का अंतर-सरकारी संगठन और आर्थिक-सुरक्षा गठबंधन है। इसकी शुरुआत 1996 में शंघाई फाइव के तौर पर हुई थी। हालांकि, अगले 30 साल में यह 10 देशों और दो पर्यवेक्षक देशों का संगठन बन चुका है।शंघाई फाइव: एससीओ की शुरुआत शंघाई फाइव के रूप में हुई थी, जिसे 1996 में चीन, रूस, कजाखस्तान, किर्गिस्तान और ताजिकिस्तान ने मिलकर बनाया था। इसका मकसद तब सोवियत संघ के टूटने के बाद उभरे सीमा विवादों को सुलझाना और सैन्य तनाव को कम करना था।
एससीओ का गठन: बाद में साल 2000 में उज्बेकिस्तान भी इस तंत्र से जुड़ गया। इसके बाद 15 जून 2001 को शंघाई (चीन) में इन छह देशों के नेताओं ने मिलकर औपचारिक रूप से शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) की स्थापना की घोषणा की।
शंघाई सहयोग संगठन का इतिहास।
- फोटो : अमर उजाला
एससीओ चार्टर: संगठन के बुनियादी दस्तावेज यानी एससीओ चार्टर पर 7 जून 2002 को हस्ताक्षर किए गए थे और यह 19 सितंबर 2003 से प्रभावी हुआ।
वैश्विक व्यापार: ये देश अंतरराष्ट्रीय व्यापार के 15 फीसदी से अधिक हिस्से का प्रतिनिधित्व करते हैं। संगठन में व्यापार, ऊर्जा और परिवहन कनेक्टिविटी को मजबूत करने पर विशेष जोर है।
आर्थिक सहयोग योजनाएं: वर्तमान में सदस्य देश एक प्रस्तावित एससीओ विकास बैंक की स्थापना पर चर्चा कर रहे हैं। इसके अलावा रूस के सेंट पीटर्सबर्ग को मुंबई से जोड़ने वाले इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर (आईएनएसटीसी) और माल ढुलाई की सुविधा के लिए 'सिल्क रोड स्टेशन्स' के नेटवर्क के निर्माण पर काम किया जा रहा है।
क्या है एससीओ की आर्थिक-सैन्य ताकत?
1. आर्थिक ताकत
वैश्विक जीडीपी में हिस्सेदारी: एससीओ के सभी सदस्य देश मिलकर दुनिया की कुल जीडीपी (सकल घरेलू उत्पाद) का लगभग 25 फीसदी हिस्सा बनाते हैं।वैश्विक व्यापार: ये देश अंतरराष्ट्रीय व्यापार के 15 फीसदी से अधिक हिस्से का प्रतिनिधित्व करते हैं। संगठन में व्यापार, ऊर्जा और परिवहन कनेक्टिविटी को मजबूत करने पर विशेष जोर है।
आर्थिक सहयोग योजनाएं: वर्तमान में सदस्य देश एक प्रस्तावित एससीओ विकास बैंक की स्थापना पर चर्चा कर रहे हैं। इसके अलावा रूस के सेंट पीटर्सबर्ग को मुंबई से जोड़ने वाले इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर (आईएनएसटीसी) और माल ढुलाई की सुविधा के लिए 'सिल्क रोड स्टेशन्स' के नेटवर्क के निर्माण पर काम किया जा रहा है।
2. सैन्य और सुरक्षा ताकत
शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) पश्चिमी देशों के सैन्य गठबंधन नाटो की तरह नहीं है। संगठन के शुरुआती दौर में (1996 और 1997 में) कजाखस्तान, चीन, किर्गिस्तान, रूस और ताजिकिस्तान के बीच सीमा क्षेत्रों में विश्वास स्थापित करने और सैन्य बलों की आपसी कटौती से जुड़े समझौतों पर हस्ताक्षर किए गए थे।एससीओ में सुरक्षा का मुख्य ध्यान आतंकवाद, अलगाववाद और चरमपंथ के खतरों से निपटने पर केंद्रित है। इसके पास एक समर्पित सुरक्षा ढांचा है जिसे रीजनल एंटी-टेररिस्ट स्ट्रक्चर (RATS) कहा जाता है, जिसके लिए शिखर सम्मेलन में नई योजनाओं को मंजूरी मिलने की उम्मीद है।
ये भी पढ़ें: मध्य एशिया में नए आर्थिक रास्तों की तलाश: पीएम मोदी की यूरेशियाई कूटनीति, बड़ा मंच बनेगा शंघाई सहयोग संगठन
3. मानव संसाधन और क्षेत्रफल
बड़ी आबादी: इस पूरे ब्लॉक में दुनिया की लगभग 3.4 अरब से अधिक की आबादी रहती है, जो कि दुनिया का लगभग 40 फीसदी हिस्सा है।
विशाल भूभाग: इन 10 सदस्य देशों का संयुक्त भौगोलिक क्षेत्र यूरेशिया के एक बड़े हिस्से को कवर करता है, जो कुल मिलाकर लगभग 3.6 करोड़ वर्ग किलोमीटर में फैला है।
एससीओ में शामिल स्थायी सदस्य और पर्यवेक्षक देश।
- फोटो : अमर उजाला
एससीओ सम्मेलन में इस बार किन मुद्दों पर रहेगा जोर?
प्रमुख संघर्षों पर चर्चा तय: चूंकि, एससीओ के दो मुख्य सदस्य देश रूस और ईरान मौजूदा समय में संघर्षों में शामिल हैं, इसलिए इन संघर्षों और इनके वैश्विक प्रभावों पर बातचीत प्रमुखता से की जाएगी।अमेरिकी प्रतिबंधों का सामना: अमेरिकी प्रशासन की ओर से ईरान के व्यापारिक साझेदारों पर अलग-अलग क्षेत्रों (जैसे सोना, प्रौद्योगिकी, डिजिटल संपत्ति, विमानन और समुद्री परिवहन) में लगाए गए प्रतिबंधों से निपटने पर भी सदस्य देश विस्तार से चर्चा करेंगे।
क्षेत्रीय सुरक्षा और आतंकवाद: इस शिखर सम्मेलन में एससीओ के क्षेत्रीय आतंकवाद विरोधी संरचना (रैट्स) के तहत सुरक्षा योजनाओं को औपचारिक मंजूरी दी जाएगी। साथ ही सदस्य देश एक बार फिर आतंकवाद, अलगाववाद और चरमपंथ से मुक्त क्षेत्र बनाने की प्रतिबद्धता दोहराएंगे।
अफगानिस्तान मुद्दा: क्षेत्र में आतंकवाद, नशीले पदार्थों की तस्करी और सीमा पार सुरक्षा से जुड़े खतरों के कारण अफगानिस्तान हमेशा की तरह चर्चा का मुख्य केंद्र रहेगा।
प्रस्तावित एससीओ विकास बैंक: सदस्य देशों के बीच व्यापारिक लेन-देन को आसान बनाने के लिए प्रस्तावित विकास बैंक की संरचना और उसके संचालन के तौर-तरीकों पर चर्चा आगे बढ़ाई जाएगी।
परिवहन गलियारों पर बात: सेंट पीटर्सबर्ग (रूस) को मुंबई (भारत) से जोड़ने वाले इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर के निर्माण पर बातचीत होगी, जो ईरान और फारस की खाड़ी के माध्यम से कनेक्टिविटी प्रदान करेगा।
इसके अलावा यूरेशिया में माल ढुलाई को बढ़ावा देने के लिए सिल्क रोड स्टेशन्स के नेटवर्क को स्थापित करने की दिशा में प्रगति पर चर्चा होगी।
परिवहन गलियारों पर बात: सेंट पीटर्सबर्ग (रूस) को मुंबई (भारत) से जोड़ने वाले इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर के निर्माण पर बातचीत होगी, जो ईरान और फारस की खाड़ी के माध्यम से कनेक्टिविटी प्रदान करेगा।
इसके अलावा यूरेशिया में माल ढुलाई को बढ़ावा देने के लिए सिल्क रोड स्टेशन्स के नेटवर्क को स्थापित करने की दिशा में प्रगति पर चर्चा होगी।
एससीओ के तीन सबसे शक्तिशाली सदस्य देश।
- फोटो : अमर उजाला
भारत के लिए क्यों बेहद अहम बन गया है इस साल का एससीओ सम्मेलन?
किर्गिस्तान की राजधानी बिश्केक में आयोजित हो रहा यह शिखर सम्मेलन भारत के लिए राजनयिक और रणनीतिक रूप से बेहद अहम हो गया है।1. आगामी ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की जमीन होगी तैयार
यह बैठक नई दिल्ली में होने वाले आगामी ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के लिए एक अहम मंच तैयार करेगी। पीएम मोदी इस मौके का इस्तेमाल ब्रिक्स के संयुक्त घोषणापत्र पर आम सहमति बनाने के लिए करेंगे, क्योंकि मौजूदा समय में ईरान और संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) के बीच जारी मतभेदों के कारण इस घोषणापत्र पर सहमति रुकी हुई है। पीएम मोदी ईरान को आगामी ब्रिक्स बैठक में थोड़ा लचीला रुख अपनाने के लिए प्रेरित कर सकते हैं।
2. ईरान के राष्ट्रपति से पहली मुलाकात होगी
अमेरिका-ईरान युद्ध शुरू होने के बाद पीएम मोदी की ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान से यह पहली आमने-सामने की मुलाकात होगी। भारत के लिए ईरान के बंदरगाहों के रास्ते पश्चिम एशिया तक कनेक्टिविटी बनाना बेहद अहम रणनीतिक मकसद है। ऐसे में होर्मुज जलडमरूमध्य की नाकेबंदी से भारत के हितों को होने वाले नुकसान पर दोनों नेताओं के बीच गंभीर चर्चा होने की उम्मीद है।
ये भी पढ़ें: किर्गिस्तान दौरा लाइव: PM मोदी ने ईरान के राष्ट्रपति पेजेशकियन से की द्विपक्षीय बैठक, कई मुद्दों पर हुई चर्चा
3. यूएन सुरक्षा परिषद की गैर-स्थायी सीट के लिए ताजिकिस्तान से बातचीत
जून 2027 में होने वाले संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (यूएनएससी) की गैर-स्थायी सीट के चुनाव में एशियाई ब्लॉक से भारत और ताजिकिस्तान दोनों ही दावेदार हैं। पीएम मोदी इस सम्मेलन का इस्तेमाल ताजिकिस्तान को अपनी उम्मीदवारी एक वर्ष के लिए टालने के लिए मनाने में कर सकते हैं। इससे पहले भारत ने 2009 में कजाखस्तान को भी अपनी उम्मीदवारी वापस लेने के लिए सफलतापूर्वक राजी किया था।
4. लंबित भारत-मध्य एशिया शिखर सम्मेलन की राह खोलना
भारत काफी समय से मध्य एशियाई देशों के साथ अपने रणनीतिक संबंधों को नए सिरे से स्थापित करने का प्रयास कर रहा है। पीएम मोदी इस शिखर सम्मेलन के दौरान 'भारत-मध्य एशिया शिखर सम्मेलन' के लिए एक निश्चित तारीख तय करने की उम्मीद कर रहे हैं, जो पहले कई बार टाली जा चुकी है।
जून 2027 में होने वाले संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (यूएनएससी) की गैर-स्थायी सीट के चुनाव में एशियाई ब्लॉक से भारत और ताजिकिस्तान दोनों ही दावेदार हैं। पीएम मोदी इस सम्मेलन का इस्तेमाल ताजिकिस्तान को अपनी उम्मीदवारी एक वर्ष के लिए टालने के लिए मनाने में कर सकते हैं। इससे पहले भारत ने 2009 में कजाखस्तान को भी अपनी उम्मीदवारी वापस लेने के लिए सफलतापूर्वक राजी किया था।
4. लंबित भारत-मध्य एशिया शिखर सम्मेलन की राह खोलना
भारत काफी समय से मध्य एशियाई देशों के साथ अपने रणनीतिक संबंधों को नए सिरे से स्थापित करने का प्रयास कर रहा है। पीएम मोदी इस शिखर सम्मेलन के दौरान 'भारत-मध्य एशिया शिखर सम्मेलन' के लिए एक निश्चित तारीख तय करने की उम्मीद कर रहे हैं, जो पहले कई बार टाली जा चुकी है।
5. भारत-चीन संबंधों में सुधार का मौका
भारत-चीन सीमा पर जारी ढांचागत तनाव के बीच चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ द्विपक्षीय बातचीत करने और संबंधों को गहराई देने के लिए एससीओ भारत के लिए एक अहम राजनयिक मंच साबित हो रहा है।
6. भारत का SECURE विजन और क्षेत्रीय सुरक्षा
भारत इस क्षेत्र को आतंकवाद, अलगाववाद और चरमपंथ से मुक्त बनाने के लिए प्रतिबद्ध है। इसके लिए भारत अपने SECURE दृष्टिकोण यानी सुरक्षा (Security), आर्थिक सहयोग (Economy), कनेक्टिविटी (Connectivity), एकता (Unity), और संप्रभुता-क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान (Respect for Sovereignty and Territorial Integrity) को इस बैठक में मजबूती से सामने रखेगा।
भारत-चीन सीमा पर जारी ढांचागत तनाव के बीच चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ द्विपक्षीय बातचीत करने और संबंधों को गहराई देने के लिए एससीओ भारत के लिए एक अहम राजनयिक मंच साबित हो रहा है।
6. भारत का SECURE विजन और क्षेत्रीय सुरक्षा
भारत इस क्षेत्र को आतंकवाद, अलगाववाद और चरमपंथ से मुक्त बनाने के लिए प्रतिबद्ध है। इसके लिए भारत अपने SECURE दृष्टिकोण यानी सुरक्षा (Security), आर्थिक सहयोग (Economy), कनेक्टिविटी (Connectivity), एकता (Unity), और संप्रभुता-क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान (Respect for Sovereignty and Territorial Integrity) को इस बैठक में मजबूती से सामने रखेगा।