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ग्राम पंचायत चुनाव प्रशासन के लिए बड़ी चुनौती
दातागंज
Updated Fri, 16 Oct 2015 11:21 PM IST
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जिला पंचायत और क्षेत्र पंचायत सदस्य पद के अब तक हुए चुनाव में जिस तरह की घटनाएं सामने आ रही हैं, वह ग्राम पंचायत चुनाव की चुनौतियां बयां कर रही हैं।
पंचायत चुनाव लोकतंत्र में सबसे नीचे की श्रेणी में आते हैं। कुछ वर्षों पहले तक क्षेत्र पंचायत सदस्य पद के लिए कोई महत्व नहीं दिया जाता था। इस बार पंचायत चुनाव में पहले जिला पंचायत और क्षेत्र पंचायत सदस्य पद के लिए चुनाव हो रहा है। चूंकि आरक्षण की व्यवस्था बदली है सो हर गांव में राजनीतिक समीकरण भी बदल गए हैं। इन चुनावों में कई स्थानों पर प्रभावशाली लोगों द्वारा दबंगई भी दिखाई गई है। कहीं पर प्रत्याशी को नामांकन से रोक दिया या फिर उसका पर्चा ही छीन लिया गया। इसके अलावा और भी हथकंडे अपनाते हुए कमजोर व्यक्ति को चुनावी समर में आने से रोक दिया गया। काबिलेगौर है कि क्षेत्र पंचायत सदस्य से ज्यादा महत्वपूर्ण होता प्रधानी का चुनाव। क्योंकि प्रधान पर गांव के विकास का जिम्मा होता है। उसी के मद में शासन से मिलने वाला अनुदान आता है।
इतिहास के पन्नों को पलटकर देखा जाए तो प्रधानी के चुनावों में रंजिश भी खूब सामने आती रही। इन चुनावों के बाद प्रधानी के चुनाव ही होने हैं। राजनीति से जुड़े लोगों का मानना है कि पंचायत चुनावों का जब आगाज ऐसा हुआ है, तो अंजाम कैसा होगा। प्रधानी का चुनाव प्रशासन के लिए किसी भी चुनौती से कम नहीं होगा। क्योंकि यह ऐसा चुनाव होता है जिसमें एक-दूसरे को मात देने के लिए लोग किसी भी हद तक चले जाते हैं।
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पंचायत चुनाव लोकतंत्र में सबसे नीचे की श्रेणी में आते हैं। कुछ वर्षों पहले तक क्षेत्र पंचायत सदस्य पद के लिए कोई महत्व नहीं दिया जाता था। इस बार पंचायत चुनाव में पहले जिला पंचायत और क्षेत्र पंचायत सदस्य पद के लिए चुनाव हो रहा है। चूंकि आरक्षण की व्यवस्था बदली है सो हर गांव में राजनीतिक समीकरण भी बदल गए हैं। इन चुनावों में कई स्थानों पर प्रभावशाली लोगों द्वारा दबंगई भी दिखाई गई है। कहीं पर प्रत्याशी को नामांकन से रोक दिया या फिर उसका पर्चा ही छीन लिया गया। इसके अलावा और भी हथकंडे अपनाते हुए कमजोर व्यक्ति को चुनावी समर में आने से रोक दिया गया। काबिलेगौर है कि क्षेत्र पंचायत सदस्य से ज्यादा महत्वपूर्ण होता प्रधानी का चुनाव। क्योंकि प्रधान पर गांव के विकास का जिम्मा होता है। उसी के मद में शासन से मिलने वाला अनुदान आता है।
इतिहास के पन्नों को पलटकर देखा जाए तो प्रधानी के चुनावों में रंजिश भी खूब सामने आती रही। इन चुनावों के बाद प्रधानी के चुनाव ही होने हैं। राजनीति से जुड़े लोगों का मानना है कि पंचायत चुनावों का जब आगाज ऐसा हुआ है, तो अंजाम कैसा होगा। प्रधानी का चुनाव प्रशासन के लिए किसी भी चुनौती से कम नहीं होगा। क्योंकि यह ऐसा चुनाव होता है जिसमें एक-दूसरे को मात देने के लिए लोग किसी भी हद तक चले जाते हैं।
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