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शिक्षा में गुणवत्ता के सुधार पर हो फोकस

Thu, 04 Feb 2016 07:37 PM IST
बदायूं
बदायूं Updated Thu, 04 Feb 2016 07:37 PM IST
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Quality in education The focus is on improving

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तमाम प्रयास के बावजूद परिषदीय स्कूलों में बेहतर शिक्षण कार्य नहीं हो पा रहा है। इसके पीछे शिक्षकों और अभिभावकों का रुचि न लेना है। बेसिक शिक्षा की बदहाली भी किसी से छिपी नहीं। हाईकोर्ट तक इस पर टिप्पणी कर चुका है। हाईकोर्ट के उस आदेश पर अमल किया जाए, जिसमें अधिकारियों के बच्चों को परिषदीय स्कूलों में ही पढ़ाया जाएगा, तो हो सकता है शिक्षा के स्तर में सुधार आ जाए।
जिले में 1,802 प्राथमिक विद्यालय और 656 उच्च प्राथमिक विद्यालयों के साथ 18 कस्तूरबा गांधी आवासीय बालिका विद्यालयों का संचालन हो रहा है। वहीं बेसिक व माध्यमिक से सहायता प्राप्त विद्यालय 71 और अनुदानित मदरसों की संख्या दो है। अभी हाल में भर्ती हुए 72,825 सहायक अध्यापकों और 10 हजार विज्ञान एवं गणित शिक्षकों की वजह से विद्यालयों में शिक्षकों की भी कमी नहीं है। ऐसे में अब केवल गुणवत्तापरक शिक्षा पर ध्यान देने की जरूरत है। जिले के करीब 2,500 स्कूल कॉलेजों में साढ़े तीन लाख से ज्यादा बच्चे पढ़ाई कर रहे हैं। अभिभावकों से लेकर शिक्षाविदों तक अब स्कूल कॉलेजों के भौतिक सुधार से ज्यादा शिक्षण कार्य में सुधार की आवश्यकता महसूस की जा रही है। आगामी बजट में शिक्षा की व्यवस्था को सुधारने के लिए कितना बजट आवंटित किया जाएगा। इसका इंतजार लोगों को है।
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आगामी सत्र में शुरू हो जाएंगे तीनों माडर्न स्कूल
बदायूं। जिले में दो परिषदीय स्कूलों में इंग्लिश माध्यम से शिक्षा दी जा रही है, लेकिन जिस उद्देश्य से मॉडल स्कूलों का संचालन शुरू किया गया। यह मॉडल स्कूल उस अपेक्षा पर कहीं ठहरते नजर नहीं आ रहे हैं। वहीं माध्यमिक शिक्षा के तहत खोले जाने वाले तीन मॉडल स्कूलों का निर्माण कार्य लगभग पूरा हो चुका है। अधिकारियों के मुताबिक शैक्षणिक सत्र 2016-17 में उनमें शिक्षण कार्य शुरू हो जाएगा।
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कस्तूरबा आवासीय स्कूलों को सुविधाओं की आस
बदायूं। जिले के विभिन्न ब्लाकों में संचालित हो 18 कस्तूरबा गांधी आवासीय बालिका विद्यालयों में बदहाल दशा किसी से छुपी नहीं है। ये स्कूल आवासीय होने की वजह से छात्राओं को अपना सारा समय वहीं गुजारना पड़ता है, जबकि कई स्कूलों में शीशे टूटे रहते हैं। तो कई छात्राओं को रजाई और कंबल सही से मुहैया नहीं हो पाते हैं। इसमें प्रशासन से लेकर वार्डेन तक सभी की लापरवाही उजागर होती है।
राजकीय इंटर कॉलेजों को बेहतर शिक्षण की दरकार
बदायूं। माध्यमिक शिक्षा परिषद की ओर से जिले में संचालित हो रहे 19 राजकीय कॉलेजों, 41 सहायता प्राप्त विद्यालयों और 167 वित्तविहीन विद्यालय संचालित हो रहे हैं। इनमें से पुराने कॉलेजों से नए कॉलेजों में भी मरम्मत कराए जाने की जरूरत है। साथ ही कॉलेजों के आसपास सही ढंग से बाउंड्रीवाल खिंचवाने और कॉलेज भवनों का स्ट्रक्चर सुधारने की जरूरत है। इससे पहले इन कॉलेजों में सही ढंग से समय से कक्षाएं संचालित कराने और ईमानदारी के साथ शिक्षण कार्य कराने की जरूरत है, जिससे राजकीय कॉलेजों को पुराना सम्मान मिल सके।
शिक्षकों से न कराया जाए एमडीएम वितरण
बदायूं। परिषदीय और सहायता प्राप्त स्कूलों में वितरित होने वाला मिड डे मील का वितरण शिक्षकों से न कराया जाए। इससे शिक्षा के स्तर में सुधार होने की प्रबल उम्मीद है। एमडीएम की जिम्मेदारी होने से शिक्षण कार्य प्रभावित होता है। इसका वितरण एनजीओ से कराया जाए। यह मांग प्राथमिक शिक्षक संघ और जूनियर स्कूल शिक्षक संघ के माध्यम से की जा चुकी है। नए बजट से इस संबंध में कोई आदेश आने की उम्मीद शिक्षकों को है।
आरटीआई के अंतर्गत लाई जाए शिक्षा गुणवत्ता
बदायूं। राजकीय डिग्री कॉलेज के राजनीतिक विज्ञान प्रवक्ता डॉ. राकेश जायसवाल के मुताबिक शिक्षा की गुणवत्ता तय करके उसे आरटीआई के अंतर्गत लाया। उसके बाद स्कूल और कॉलेजों में पढ़ाने वाले शिक्षकों का ब्यौरा मांगा जाए। सेल्फ फायनेंस कॉलेजों का सत्यापन किया जाए और मौके पर पढ़ा रहे शिक्षकों से मिलान किया जाए। इससे स्कूल कॉलेजों में अनट्रेंड लोग शिक्षण कार्य नहीं कर सकेंगे। इससे शिक्षा का स्तर सुधर सकता है।

शिक्षा से राजनीति दूर करके हो शिक्षण कार्य  
शिक्षा से राजनीति को दूर करके दूरदराज पड़े शिक्षकों का उनके मूल जिले और ब्लाकों में तैनाती दी जाए, जिससे वे पूरे मनोयोग से शिक्षण कार्य कर सकें। अवकाश कराने को लेकर शिक्षक संगठनों की मांगे गलत हैं। स्थानीय स्तर के जनप्रतिनिधियों जैसे ग्राम प्रधान और वार्ड मेंबरों को स्कूल का निरीक्षण करने की शक्ति दी जाए। साथ ही उनसे निरीक्षण आख्या बीएसए दफ्तर या अन्य दफ्तरों में मांगी जाए। इन बिंदुओं पर अमल करके शिक्षा का स्तर काफी हद तक सुधारा जा सकता है।
संजय मिश्र, शिक्षक विधायक
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