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ग्लैंडर्स के लिए संवेदनशील है बदायूं
बदायूं, ब्यूरो
Updated Wed, 01 Mar 2017 12:02 AM IST
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पशु चिकित्सकों, अश्व पालकों, भट्टा मालिकों को को दिया प्रशिक्षण
अश्व प्रजाति के घोड़ों और गधों में होने वाली ग्लैंडर्स बीमारी के प्रति जनजागरूकता के लिए पशुपालन विभाग की ओर से मंगलवार को विकास भवन सभागार में जिले के सभी पशु चिकित्सा अधिकारियों, पशुधन प्रसार अधिकारियों, प्रगतिशील अश्व पालकों और ईंट भट्ठा मालिकों को एक दिवसीय प्रशिक्षण दिया गया। इसमें विशेषज्ञों ने रामगंगा और गंगा, दोनो नदियों के होने की वजह से बदायूं जनपद को ग्लैंडर्स बीमारी के लिए संवेदनशील बताते हुए कहा कि यह जेनेटिक बीमारी है जो पशुओं से मनुष्यों में फैलती है इसलिए इसके प्रति जनजागरूकता बेहद जरूरी है। विशेषज्ञों ने इस बीमारी को जिले से खत्म करने के लिए एकजुटता से प्रयास करने पर जोर दिया। पशु चिकित्सा विभाग की ओर से बताया गया कि वर्ष 2013 से अब तक 361 सीरम के सैंपल हिसार स्थिति अश्व अनुसंधान सेंटर की प्रयोगशाला को भेजे जा चुके हैं। इनमें से 10 सैंपल में ग्लैंडर्स की पुष्टि हो चुकी है।
मुख्य पशु चिकित्सा अधिकारी डॉ. एके जादौन ने प्रशिक्षण के दौरान कहा कि ग्लैंडर्स के मामले में पशु स्वामी को सरकार की ओर से घोड़े के लिए 25 हजार और खच्चर एवं गधे के लिए 16 हजार रुपये का प्रावधान है। ब्रुक्स हॉस्पिटल बरेली से आए से आए डॉ. गोविंद उपाध्याय ने बताया कि घोड़ों, गधों और खच्चरों में नाक से पीला गाढ़ा श्राव बहने और शरीर में गाठें पड़ने पर ग्लैंडर्स की संभावना बढ़ जाती है। उन्होंने कहा कि खून के नमूने लेते समय पीपीई किट पहननी चाहिए, जिससे स्वयं को बीमारी से बचाया जा सके। मंडल के अपर निदेशक डॉ. जीएन सिंह कहा कि जनपद में सभी पशु चिकित्साधिकारी एवं उप पशु चिकित्साधिकारियों को निर्देश दिए है कि गांव गांव जाकर अश्व पालकों को प्रशिक्षण और अश्व बाहर न ले जाने के लिए प्रेरित करें।
प्रशिक्षण सीडीओ अच्छे लाल यादव की अध्यक्षता में हुआ। कादरचौक के पशु चिकित्साधिकारी डा. अमित कुमार ने जानकारी दी कि पॉजिटिव घोड़े को यूथेनाइज करने के लिए थायोपेंटल नामक दवाई प्रयोग करनी करनी चाहिए और 6 फिट गहरे गड्ढे में चूना और नमक डाल कर दबा दिया जाता है। प्रशिक्षण में ब्रुक्स हॉस्पिटल के मैनेजर ज्ञानेंद्र कुमार के अलावा सभी पशु चिकित्साधिकारी और उप चिकित्साधिकरी मौजूद रहे।
अश्व प्रजाति के घोड़ों और गधों में होने वाली ग्लैंडर्स बीमारी के प्रति जनजागरूकता के लिए पशुपालन विभाग की ओर से मंगलवार को विकास भवन सभागार में जिले के सभी पशु चिकित्सा अधिकारियों, पशुधन प्रसार अधिकारियों, प्रगतिशील अश्व पालकों और ईंट भट्ठा मालिकों को एक दिवसीय प्रशिक्षण दिया गया। इसमें विशेषज्ञों ने रामगंगा और गंगा, दोनो नदियों के होने की वजह से बदायूं जनपद को ग्लैंडर्स बीमारी के लिए संवेदनशील बताते हुए कहा कि यह जेनेटिक बीमारी है जो पशुओं से मनुष्यों में फैलती है इसलिए इसके प्रति जनजागरूकता बेहद जरूरी है। विशेषज्ञों ने इस बीमारी को जिले से खत्म करने के लिए एकजुटता से प्रयास करने पर जोर दिया। पशु चिकित्सा विभाग की ओर से बताया गया कि वर्ष 2013 से अब तक 361 सीरम के सैंपल हिसार स्थिति अश्व अनुसंधान सेंटर की प्रयोगशाला को भेजे जा चुके हैं। इनमें से 10 सैंपल में ग्लैंडर्स की पुष्टि हो चुकी है।
मुख्य पशु चिकित्सा अधिकारी डॉ. एके जादौन ने प्रशिक्षण के दौरान कहा कि ग्लैंडर्स के मामले में पशु स्वामी को सरकार की ओर से घोड़े के लिए 25 हजार और खच्चर एवं गधे के लिए 16 हजार रुपये का प्रावधान है। ब्रुक्स हॉस्पिटल बरेली से आए से आए डॉ. गोविंद उपाध्याय ने बताया कि घोड़ों, गधों और खच्चरों में नाक से पीला गाढ़ा श्राव बहने और शरीर में गाठें पड़ने पर ग्लैंडर्स की संभावना बढ़ जाती है। उन्होंने कहा कि खून के नमूने लेते समय पीपीई किट पहननी चाहिए, जिससे स्वयं को बीमारी से बचाया जा सके। मंडल के अपर निदेशक डॉ. जीएन सिंह कहा कि जनपद में सभी पशु चिकित्साधिकारी एवं उप पशु चिकित्साधिकारियों को निर्देश दिए है कि गांव गांव जाकर अश्व पालकों को प्रशिक्षण और अश्व बाहर न ले जाने के लिए प्रेरित करें।
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प्रशिक्षण सीडीओ अच्छे लाल यादव की अध्यक्षता में हुआ। कादरचौक के पशु चिकित्साधिकारी डा. अमित कुमार ने जानकारी दी कि पॉजिटिव घोड़े को यूथेनाइज करने के लिए थायोपेंटल नामक दवाई प्रयोग करनी करनी चाहिए और 6 फिट गहरे गड्ढे में चूना और नमक डाल कर दबा दिया जाता है। प्रशिक्षण में ब्रुक्स हॉस्पिटल के मैनेजर ज्ञानेंद्र कुमार के अलावा सभी पशु चिकित्साधिकारी और उप चिकित्साधिकरी मौजूद रहे।
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