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लॉकडाउन में बदलने लगी तालाब-चकरोडों की सूरत, ऊसर जमीन भी उगलेगी सोना

Amarujala Local Bureau अमर उजाला लोकल ब्यूरो
Updated Fri, 15 May 2020 04:14 PM IST
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changing in ponds
उझानी (बदायूं)। अब किसी गरीब किसान का खेत न तो उबड़खाबड़ दिखेगा और न ही ऊसर (बंजर) खेतों में फसल उगाने में कोई दिक्कत होगी। मनरेगा के तहत सरकार ने प्रवासी मजदूरों को जो काम सौंपा है, उनमें खेतों के समतलीकरण के अलावा जल संरक्षण के संसाधनों को बेहतर बनाना शामिल है। जल संरक्षण के साधनों में तालाब-पोखर और भैंसोर की खुदाई के अलावा चकरोड भी सुधरने लग गए हैं। संपर्क मार्गों को चकाचक करने की कवायद के बीच ग्राम पंचायतों ने अपने-अपने इलाके की सूरत बदलने को कदम आगे बढ़ा दिए हैं। लॉकडाउन में गांव और उसके आसपास इलाके के विकास के लिए इन दिन करीब 80 फीसदी ग्राम पंचायतों में नरेगा मजूदरों के जरिए काम पिछले सप्ताह से रफ्तार पकड़ चुका है।
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सरकार की प्राथमिकता में शामिल कार्यों को आगे बढ़ाते हुए अधिकतर ग्राम पंचायतों ने तालाब और पोखरों की खुदाई शुरू करा दी है। तालाबों की खुदाई के साथ ही बरसात के दिनों में पानी का प्रवाह उनके चारों ओर से निकलकर खेतों तक नहीं पहुंचे, इसलिए चकरोड भी बनाए जा रहे हैं। सिकंदाबाद ग्राम पंचायत में बृहस्पतिवार को भी तालाब की खुदाई और गरीब किसानों के खेतों के समतलीकरण का कार्य जारी रहा। तेहरा में जल संरक्षण के संसाधनों को दुरस्त करने का काम रफ्तार पकड़ चुका है। देवरमई के प्रधान अहवरन सिंह ने बताया कि एक सप्ताह में करीब 30 फीसदी तक कार्य पूरा हो चुका है। इसमें सबसे अच्छी बात तो यह है कि प्रवासी मजदूरों को रोजगार मिलने के साथ गरीब किसानों के लिए अपने खेत समतल कराने में कोई खर्च नहीं उठना पड़ रहा है। ऊसर जमीन को उपजाऊ बनाने के लिए खेत की खुदाई की साथ चीका मिट्टी का मिश्रण मिलाया जाता है, वह भी नरेगा के मजदूरों के जरिए कराया जा रहा है। बता दें कि ब्लॉक क्षेत्र में 76 ग्राम पंचायतें हैं। अधिकतर ग्राम पंचायतों के इलाके में ऊसर जमीन का रकबा शामिल है। ग्रामीणों की मानें तो ऊसर जमीन को उपयोग में लाने के बाद फसलों से पैदावार भी बढेगी।
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क्वारंटीन अवधि पूरी कर चुके प्रवासी मजदूर ही कर रहे हैं काम उझानी। नरेगा के तहत उन्हीं प्रवासी मजूदरों को जॉब कार्ड बनाकर काम पर लिया जा रहा है जो लॉकडाउन शुरू होने के बाद पहली खेप में ही घर लौट चुके हैं। ऐसे प्रवासी मजदूर 21 दिन की क्वारंटीन अवधि को पूरा कर चुके हैं। जिन प्रवासी मजूदरों की अभी तक क्वारंटीन अवधि पूरी नहीं हो पाई है, उन्हें काम पर नहीं लगाया जा सकता। इसके पीछे प्रधानों को तर्क है कि तालाब की खुदाई और संपर्क मार्गों की मरम्मत के समय दर्जनों की संख्या में मजदूर काम करते हैं, ऐसे में बाहर से लौटे प्रवासी मजदूरों में कोरोना संक्रमण की स्थिति पूरी तरह साफ होने तक किसी और को जोखिम में नहीं डाला जा सकता।
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