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Budaun News: गोविंद-आशा दोहरे हत्याकांड में चारों आरोपी बरी, फांसी की सजा रद्द

Mon, 28 Sep 2026 01:44 AM IST
Bareily Bureau बरेली ब्यूरो
Updated Mon, 28 Sep 2026 01:44 AM IST
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All four accused acquitted in Govind-Asha double murder case; death sentences overturned.
बदायूं। बदायूं के बहुचर्चित गोविंद-आशा दोहरे हत्याकांड में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सत्र न्यायालय के मृत्युदंड के फैसले को पलटते हुए चारों आरोपियों को बरी कर दिया। अदालत ने माना कि अभियोजन पक्ष आरोपियों के खिलाफ मामला संदेह से परे साबित नहीं कर सका। विवेचना और साक्ष्य में सामने आई खामियों के आधार पर अदालत ने विजयपाल, किशनलाल, रामवीर और जलधारा को दोषमुक्त करते हुए, किसी अन्य मामले में निरुद्ध न होने की स्थिति में तत्काल जेल से रिहा करने का आदेश दिया। यह फैसला न्यायधीश अतुल श्रीधरन और न्यायमूर्ति अचल सचदेव की खंडपीठ ने अभियुक्तों की अपील तथा मृत्युदंड की पुष्टि के लिए भेजे गए डेथ रेफरेंस पर सुनवाई के बाद दिया।
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यह दोहरा हत्याकांड वजीरगंज थाना क्षेत्र के उरैना गांव में 14 मई 2017 में हुआ था। इसमें प्रेमी-युगल आशा और गोविंद की प्रेमिका के घर में ही धारदार और भारी हथियारों से प्रहार कर हत्या कर दी गई थी। गोविंद के पिता पप्पू की तहरीर पर विजयपाल, किशनलाल, रामवीर और जलधारा समेत अन्य के खिलाफ हत्या और बलवा समेत संबंधित धाराओं में रिपोर्ट दर्ज कराई थी
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अभियोजन ने घटना को प्रेम-प्रसंग से जुड़ा बताया था। इस मामले में सत्र न्यायालय की ओर से 22 सितंबर 2022 को चारों आरोपियों को दोषी ठहराते हुए मृत्युदंड और प्रत्येक पर 50-50 हजार का अर्थदंड भी लगाया था। इसके बाद मृत्युदंड की पुष्टि के लिए मामला हाईकोर्ट पहुंचा था।
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चश्मदीद ही अदालत में मुकर गई
हाईकोर्ट ने पत्रावली पर मौजूद साक्ष्यों और गवाहों के बयानों की समीक्षा में पाया कि अभियोजन का मामला मुख्य रूप से परिस्थितिजन्य साक्ष्यों (किसी मुख्य तथ्य को सीधे तौर पर सिद्ध नहीं करना) पर टिका था। जिस रेशमा को घटना का चश्मदीद गवाह बताया गया था, वह अदालत में अपने बयान से मुकर गई।
जिरह के दौरान उसने कहा कि उसने घटना को अपनी आंखों से नहीं देखा था। अदालत ने यह भी गौर किया कि उसका बयान घटना के करीब दो महीने बाद दर्ज किया गया, लेकिन इतनी देरी का संतोषजनक कारण विवेचना में सामने नहीं दर्शाया गया था। इसके साथ ही अदालत ने विवेचना पर भी सवाल उठाए।
घटना पूर्वाह्न करीब 11 बजे होना बताई गई थी। घटनास्थल के आसपास लोग रहते थे, लेकिन पुलिस ने मौके के आसपास रहने वाले पड़ोसियों के बयान दर्ज नहीं किए। हाईकोर्ट ने इसे अभियोजन के मामले की विश्वसनीयता पर असर डालने वाली महत्वपूर्ण कमी माना। वहीं, अभियोजन ने कथित आलाकत्ल के रूप में कुल्हाड़ी और गड़ासा बरामद किए जाने का दावा किया था, लेकिन बरामदगी के समय तैयार किए गए फर्द के गवाहों को अदालत में परीक्षित नहीं कराया गया। इससे कथित बरामदगी की विश्वसनीयता पर भी अदालत ने सवाल खड़े किए।


संदेह कितना भी गहरा हो, वह प्रमाणित साक्ष्य का विकल्प नहीं हो सकता
हाईकोर्ट ने साक्ष्य अधिनियम की धारा 106 के संबंध में भी स्पष्ट किया कि घटना के समय मकान के दरवाजे खुले थे। वहां किसी के आने-जाने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता। आरोपी घटनास्थल से गिरफ्तार भी नहीं हुए थे। ऐसे में केवल मकान के भीतर शव मिलने के आधार पर हत्या का दोष आरोपियों पर नहीं डाला जा सकता। अदालत ने कहा कि अभियोजन को अपना मामला स्वयं ठोस साक्ष्यों से साबित करना होता है। संदेह कितना भी गहरा हो, वह प्रमाणित साक्ष्य का विकल्प नहीं हो सकता। इन परिस्थितियों में हाईकोर्ट ने सत्र न्यायालय का फैसला निरस्त करते हुए चारों आरोपियों को दोषमुक्त कर दिया और अन्य मामले में निरुद्ध न होने पर उनकी तत्काल रिहाई के निर्देश दिए।
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