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भगवान हमेशा अपने शरणागत की रक्षा अवश्य करते है
Updated Fri, 08 Sep 2017 11:59 PM IST
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बिल्सी। श्री राम कृष्ण समिति के तत्वावधान में माहेश्वरी धर्मशाला में चल रही श्री रामकथा के चौथे दिन अयोध्यादास रामायणी जी महाराज ने माता जानकी के चरण में जयंत के चोंच से किए गए प्रहार की कथा का वर्णन किया। उन्होंने यह भी कहा कि भगवान शरणागत की अवश्य रक्षा करते हैं।
उन्होंने कहा कि भगवान राम ने एक तिनके का तीर बनाकर जयंत को निशाना बनाया लेकिन वह तीर जयंत के पीछे ही रहा। जयंत शरण लेने के लिए विभिन्न स्थानों पर गया। मगर किसी ने उसकी रक्षा नहीं की। अंत में वह नारद मुनि के कहने पर भगवान राम की शरण में गया। इस पर श्रीराम ने उन्हें क्षमा कर दिया। उन्होंने कहा कि भगवान अपनी शरण में आए हुए प्राणि की सदैव रक्षा करते है।
उन्होंने सिंधु के निकट एक सुंदर पहाड़ का वर्णन भी किया। जिस पर श्री हनुमान जी ने कौतुक से भरे हुए कार्य कलाप किए। जिससे लंका के राजा रावण की नगरी में प्रवेश का मार्ग प्रशस्त हुआ। उन्होंने सेवा का महत्व समझाते हुए कहा कि आपको अपने निर्वाह की चिंता नहीं करनी चाहिए। आपके निर्वाह का प्रबंध पहले से किया हुआ है जिस परमात्मा ने जन्म दिया है उस पर आपका पालन करने की जिम्मेदारी है। सबके हित का भाव रखने से आपकी जो उन्नति होगी वह स्वार्थ का भाव रखने से नहीं होगी। इसलिए मानव को सावधानी के साथ कार्य करना चाहिए। उसे यह प्रयास करना चाहिए कि उससे किसी का अहित न होने पाएं। तभी उसका जीवन सफल हो सकेगा। इस मौके पर बनवारीलाल शर्मा, राजेश कुमार, रामरतन गोयल, मन्नूलाल सक्सेना, नरेंद्र गरल, डॉ.राजाबाबू वाष्र्णेय, लोकेश बाबू, आशीष वशिष्ठ, नीरज माहेश्वरी, मनोज वार्ष्णेय, सुवीन माहेश्वरी, संजीव वार्ष्णेय, दिनेश वार्ष्णेय आदि मौजूद रहे।
उन्होंने कहा कि भगवान राम ने एक तिनके का तीर बनाकर जयंत को निशाना बनाया लेकिन वह तीर जयंत के पीछे ही रहा। जयंत शरण लेने के लिए विभिन्न स्थानों पर गया। मगर किसी ने उसकी रक्षा नहीं की। अंत में वह नारद मुनि के कहने पर भगवान राम की शरण में गया। इस पर श्रीराम ने उन्हें क्षमा कर दिया। उन्होंने कहा कि भगवान अपनी शरण में आए हुए प्राणि की सदैव रक्षा करते है।
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उन्होंने सिंधु के निकट एक सुंदर पहाड़ का वर्णन भी किया। जिस पर श्री हनुमान जी ने कौतुक से भरे हुए कार्य कलाप किए। जिससे लंका के राजा रावण की नगरी में प्रवेश का मार्ग प्रशस्त हुआ। उन्होंने सेवा का महत्व समझाते हुए कहा कि आपको अपने निर्वाह की चिंता नहीं करनी चाहिए। आपके निर्वाह का प्रबंध पहले से किया हुआ है जिस परमात्मा ने जन्म दिया है उस पर आपका पालन करने की जिम्मेदारी है। सबके हित का भाव रखने से आपकी जो उन्नति होगी वह स्वार्थ का भाव रखने से नहीं होगी। इसलिए मानव को सावधानी के साथ कार्य करना चाहिए। उसे यह प्रयास करना चाहिए कि उससे किसी का अहित न होने पाएं। तभी उसका जीवन सफल हो सकेगा। इस मौके पर बनवारीलाल शर्मा, राजेश कुमार, रामरतन गोयल, मन्नूलाल सक्सेना, नरेंद्र गरल, डॉ.राजाबाबू वाष्र्णेय, लोकेश बाबू, आशीष वशिष्ठ, नीरज माहेश्वरी, मनोज वार्ष्णेय, सुवीन माहेश्वरी, संजीव वार्ष्णेय, दिनेश वार्ष्णेय आदि मौजूद रहे।
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