{"_id":"663bc22ea28d4988cd0990dc","slug":"tortoise-smugglers-sent-to-jail-wildlife-smugglers-will-be-kept-under-close-watch-bijnor-news-c-27-1-smrt1004-123399-2024-05-08","type":"story","status":"publish","title_hn":"Bijnor News: कछुआ तस्करों को भेजा जेल, वन्य जीव तस्करों पर होगी पैनी निगाह","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
Bijnor News: कछुआ तस्करों को भेजा जेल, वन्य जीव तस्करों पर होगी पैनी निगाह
विज्ञापन
नजीबाबाद में पकड़े गए कछुए। (फाइल फोटो)
मंगलवार को पुलिस टीम बाइक सवार दो तस्करों से बरामद किए थे 38 कछुए
दोनों आरोपी उत्तराखंड के हरिद्वार क्षेत्र में झुग्गी झोपड़ियों में रहने वाले खानाबदोश
नजीबाबाद और सीमावर्ती क्षेत्र से वन्य जीव तस्करों पर होगी विभाग की निगाह
संवाद न्यूज एजेंसी
नजीबाबाद/बिजनौर। वन्यजीव तस्करी से जुड़े 38 कछुए पकड़ने जाने के बाद वन विभाग सतर्क हो गया। बुधवार को पुलिस ने गिरफ्तार किए गए दोनों आरोपियों का पूछताछ के बाद चालान कर दिया। उत्तराखंड के हरिद्वार क्षेत्र में झुग्गी झोपड़ियों में खानाबदोश के रूप में रहते हैं। दाेनों से मिली जानकारी के बाद वन विभाग ने अब तस्करी से जुड़े सीमा क्षेत्र के तस्करों पर पैनी रखेगा।
तहसील के महावतपुर डैम के निकट सामाजिक वानिकी और पुलिस टीम ने हरिद्वार ले जाए जा रहे 38 कछुओं के साथ मंगलवार को दो युवकों को गिरफ्तार किया था। कछुए के साथ पकड़ने गए हरिद्वार निवासी हुकुमत और करीम को सीजेएम न्यायालय में पेश करने के बाद दोनों जेल भेज दिया गया। आरोपी नजीबाबाद सीमा समाप्त होने के बाद उत्तराखंड के हरिद्वार क्षेत्र में झुग्गी झोपड़ियों में खानाबदोश के रूप में रहते हैं। वन विभाग का अनुमान है कि पूर्व में भी कछुओं और अन्य वन्य जीवों की तस्करी से इनका संबंध रहा होगा।
वन विभाग के अधिकारियों को आरोपियों ने कछुओं को देहरादून के किसी व्यक्ति को बेचने की जानकारी दी। वन विभाग के सामने कछुआ, सांप सहित अन्य वन्य जीवों की तस्करी से जुड़े मामले सामने आने पर अब विभाग तस्करी से जुड़े लोगों पर पैनी निगाह रखेगा। सामाजिक वानिकी डिप्टी रेंजर हरगोविंद सिंह ने बताया कि विभाग के उच्चाधिकारियों के निर्देश पर समय-समय पर वन्य जीवों की तस्करी के मामलों में विशेष चेकिंग अभियान और कार्रवाई की जाती रही है।
विज्ञापन
वन्य जीव अंग और पैंगोलीन तस्करी मामले सुर्खियों में रहे
सामाजिक वानिकी की टीम ने करीब डेढ़ वर्ष पूर्व नगर के बाजार कल्लूगंज से एक पंसारी की दुकान पर छापा मारकर वन्य जीवों के विभिन्न अंग बरामद किए थे। तीन आरोपियों को भी गिरफ्तार किया था। उधर, सामाजिक वानिकी टीम ने करीब दो वर्ष पूर्व प्रतिबंधित वन्यजीव पैंगोलीन की तस्करी से जुड़े 14 लोगों को वन्य जीव सहित गिरफ्तार किया था।
-- -- -- -- -- -- -- -- -- -- -- -- -- -- -- -- -- -
कछुए गायब हुए तो प्रदूषित हो जाएंगी नदियां
-12 प्रजाति के कछुए गंगा में पाए जाते हैं
-02 प्रजाति के कछुए अति संकटग्रस्त घोषित
-02 प्रजाति संकटग्रस्त, तीन असुरक्षित हुई
-02 प्रजाति के कछुओं पर संकट निकट है
बिजनौर। पूरे विश्व में कछुओं की यूं तो 300 से ज्यादा प्रजाति मिलती हैं, लेकिन भारत में केवल 29 प्रजातियां ही हैं। इनमें भी उत्तर प्रदेश में कुल 15 प्रजाति के कछुए मिलते हैं। जिले में गंगा और अन्य नदियों की बात करें तो यहां पर सबसे ज्यादा 12 प्रजाति के कछुए मिलते हैं, लेकिन बढ़ते शिकार और तस्करी ने इनकी संख्या बहुत अधिक घटा दी है। इसका बड़ा कारण इनकी तस्करी होना है।
नदियों के लिए इसलिए जरूरी है कछुए
गंगा समेत तमाम नदियों की जैव विविधता ही उसके स्वच्छ होने का बड़ा कारण है। कछुए को गंगा का प्राकृतिक सफाईकर्मी भी कहा जाता है। चूंकि कछुआ सर्वाहारी होता है, इसलिए यह बीमार मछलियों, गंगा में सड़ने वाले जानवरों के शवों और अन्य दूषित चीजों को खा जाता है। इससे नदियों में गंदगी नहीं होती।
पिछले साल फरवरी में 32 कछुओं के साथ दो तस्कर पकड़े थे
पिछले वर्ष फरवरी माह के अंतिम सप्ताह में मंडावर पुलिस और वन विभाग की टीम ने चेकिंग के दौरान मुजफ्फरनगर जिले के रहने वाले दो आरोपियों को दुर्लभ प्रजाति के कछुओं के साथ गिरफ्तार किया था। इनके पास से पातल प्रजाति (सॉफ्ट शेल) के 32 कछुए बरामद हुए थे। यह प्रजाति असुरक्षित घोषित हो चुकी है। वहीं पैसों के लालच में लगातार इनका शिकार हो रहा है।
दवाई और सूप के लिए होती है तस्करी
वन विशेषज्ञ बताते हैं कि तस्कर कछुओं को पकड़कर इनकी तस्करी दिल्ली में करते हैं। वहां से इनकी तस्करी विदेशों में खासतौर पर चीन के लिए होती है। जानकार बताते हैं कि वहां कछुओं के मांस और शेल से दवाई बनाने का दावा किया जाता है। कुछ जगहों पर इनका सूप भी बनाया जाता है। इसी चक्कर में लगातार इनकी तस्करी बढ़ रही है।
तस्करी और पालन दोनों ही प्रतिबंधित
भारतीय प्रजाति के किसी भी कछुए को पालना पूरी तरह प्रतिबंधित है। इसकी तस्करी भी अपराध की श्रेणी में आता है। इसमें तीन से सात साल की सजा का प्रावधान है। - ज्ञान सिंह, एसडीओ, वन विभाग
विज्ञापन
दोनों आरोपी उत्तराखंड के हरिद्वार क्षेत्र में झुग्गी झोपड़ियों में रहने वाले खानाबदोश
नजीबाबाद और सीमावर्ती क्षेत्र से वन्य जीव तस्करों पर होगी विभाग की निगाह
संवाद न्यूज एजेंसी
नजीबाबाद/बिजनौर। वन्यजीव तस्करी से जुड़े 38 कछुए पकड़ने जाने के बाद वन विभाग सतर्क हो गया। बुधवार को पुलिस ने गिरफ्तार किए गए दोनों आरोपियों का पूछताछ के बाद चालान कर दिया। उत्तराखंड के हरिद्वार क्षेत्र में झुग्गी झोपड़ियों में खानाबदोश के रूप में रहते हैं। दाेनों से मिली जानकारी के बाद वन विभाग ने अब तस्करी से जुड़े सीमा क्षेत्र के तस्करों पर पैनी रखेगा।
तहसील के महावतपुर डैम के निकट सामाजिक वानिकी और पुलिस टीम ने हरिद्वार ले जाए जा रहे 38 कछुओं के साथ मंगलवार को दो युवकों को गिरफ्तार किया था। कछुए के साथ पकड़ने गए हरिद्वार निवासी हुकुमत और करीम को सीजेएम न्यायालय में पेश करने के बाद दोनों जेल भेज दिया गया। आरोपी नजीबाबाद सीमा समाप्त होने के बाद उत्तराखंड के हरिद्वार क्षेत्र में झुग्गी झोपड़ियों में खानाबदोश के रूप में रहते हैं। वन विभाग का अनुमान है कि पूर्व में भी कछुओं और अन्य वन्य जीवों की तस्करी से इनका संबंध रहा होगा।
विज्ञापन
वन विभाग के अधिकारियों को आरोपियों ने कछुओं को देहरादून के किसी व्यक्ति को बेचने की जानकारी दी। वन विभाग के सामने कछुआ, सांप सहित अन्य वन्य जीवों की तस्करी से जुड़े मामले सामने आने पर अब विभाग तस्करी से जुड़े लोगों पर पैनी निगाह रखेगा। सामाजिक वानिकी डिप्टी रेंजर हरगोविंद सिंह ने बताया कि विभाग के उच्चाधिकारियों के निर्देश पर समय-समय पर वन्य जीवों की तस्करी के मामलों में विशेष चेकिंग अभियान और कार्रवाई की जाती रही है।
विज्ञापन
वन्य जीव अंग और पैंगोलीन तस्करी मामले सुर्खियों में रहे
सामाजिक वानिकी की टीम ने करीब डेढ़ वर्ष पूर्व नगर के बाजार कल्लूगंज से एक पंसारी की दुकान पर छापा मारकर वन्य जीवों के विभिन्न अंग बरामद किए थे। तीन आरोपियों को भी गिरफ्तार किया था। उधर, सामाजिक वानिकी टीम ने करीब दो वर्ष पूर्व प्रतिबंधित वन्यजीव पैंगोलीन की तस्करी से जुड़े 14 लोगों को वन्य जीव सहित गिरफ्तार किया था।
कछुए गायब हुए तो प्रदूषित हो जाएंगी नदियां
-12 प्रजाति के कछुए गंगा में पाए जाते हैं
-02 प्रजाति के कछुए अति संकटग्रस्त घोषित
-02 प्रजाति संकटग्रस्त, तीन असुरक्षित हुई
-02 प्रजाति के कछुओं पर संकट निकट है
बिजनौर। पूरे विश्व में कछुओं की यूं तो 300 से ज्यादा प्रजाति मिलती हैं, लेकिन भारत में केवल 29 प्रजातियां ही हैं। इनमें भी उत्तर प्रदेश में कुल 15 प्रजाति के कछुए मिलते हैं। जिले में गंगा और अन्य नदियों की बात करें तो यहां पर सबसे ज्यादा 12 प्रजाति के कछुए मिलते हैं, लेकिन बढ़ते शिकार और तस्करी ने इनकी संख्या बहुत अधिक घटा दी है। इसका बड़ा कारण इनकी तस्करी होना है।
नदियों के लिए इसलिए जरूरी है कछुए
गंगा समेत तमाम नदियों की जैव विविधता ही उसके स्वच्छ होने का बड़ा कारण है। कछुए को गंगा का प्राकृतिक सफाईकर्मी भी कहा जाता है। चूंकि कछुआ सर्वाहारी होता है, इसलिए यह बीमार मछलियों, गंगा में सड़ने वाले जानवरों के शवों और अन्य दूषित चीजों को खा जाता है। इससे नदियों में गंदगी नहीं होती।
पिछले साल फरवरी में 32 कछुओं के साथ दो तस्कर पकड़े थे
पिछले वर्ष फरवरी माह के अंतिम सप्ताह में मंडावर पुलिस और वन विभाग की टीम ने चेकिंग के दौरान मुजफ्फरनगर जिले के रहने वाले दो आरोपियों को दुर्लभ प्रजाति के कछुओं के साथ गिरफ्तार किया था। इनके पास से पातल प्रजाति (सॉफ्ट शेल) के 32 कछुए बरामद हुए थे। यह प्रजाति असुरक्षित घोषित हो चुकी है। वहीं पैसों के लालच में लगातार इनका शिकार हो रहा है।
दवाई और सूप के लिए होती है तस्करी
वन विशेषज्ञ बताते हैं कि तस्कर कछुओं को पकड़कर इनकी तस्करी दिल्ली में करते हैं। वहां से इनकी तस्करी विदेशों में खासतौर पर चीन के लिए होती है। जानकार बताते हैं कि वहां कछुओं के मांस और शेल से दवाई बनाने का दावा किया जाता है। कुछ जगहों पर इनका सूप भी बनाया जाता है। इसी चक्कर में लगातार इनकी तस्करी बढ़ रही है।
तस्करी और पालन दोनों ही प्रतिबंधित
भारतीय प्रजाति के किसी भी कछुए को पालना पूरी तरह प्रतिबंधित है। इसकी तस्करी भी अपराध की श्रेणी में आता है। इसमें तीन से सात साल की सजा का प्रावधान है। - ज्ञान सिंह, एसडीओ, वन विभाग