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स्योहारा रामलीला में बनते थे 70 फिट के पुतले

Tue, 08 Oct 2019 11:57 PM IST
Meerut Bureau मेरठ ब्यूरो
Updated Tue, 08 Oct 2019 11:57 PM IST
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The oldest Ram Leela in Sayohara district
स्योहारा की जनपद में सबसे पुरानी राम लीला
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स्योहारा। नगर में रामलीला का प्रदर्शन जनपद में सबसे पहले शुरू हुआ। शुरू के दिनों में रामलीला में रावण, मेघनाथ, कुम्भकर्ण, अहिरावण के पुतले 65 फिट से 70 फिट तक ऊंचे बनाए जाते थे और लंका दहन भी लंका बना कर किया जाता था।
सात दशक पहले दूर दूर के गांवों से हजारों लोग दशहरा मेले में बैलगाड़ियों से आया करते थे। रामलीला मंचन कराने के लिए स्टेट सिवहारा के कुंवर हरिराज सिंह द्वारा 1897 ई. में 30 बीघा भूमि रामलीला के नाम कर दी। इसी वर्ष से यहां साल में 15 दिन रामलीला खेली जाने लगी। 1898 में श्री रामलीला कमेटी के नाम से एक संस्था एक्ट 21 सन 1860 द्वारा रजिस्टर्ड कराई गई। संस्था का रजिस्ट्रेशन लखनऊ से कराया गया। रजिस्ट्रेशन नम्बर 555 था। जिन दिनों यहां रामलीला खेली जाती, उन दिनों यहां मेला भी लगता था। इसमें आसपास ही नहीं दूर दूर के गांवों से अपार भीड़ आती थी। उन दिनों यातायात का सुलभ साधन बैलगाड़ी हुआ करती थी। मेले में अंतिम चार दिनों में लंका दहन, कुम्भकर्ण वध, मेधनाथ वध, अंतिम दिन रावण वध होता था, बुराई के प्रतीक इनके पुतलों का दहन किया जाता था।
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एक परम्परा ये भी थी कि रावण दहन के बाद ग्रामीण महिलाएं अपने बच्चों को रावण के जले हुए पुतले के नीचे से निकलती थीं। माना जाता था कि इससे बच्चों को नजर, बीमारी से बचाव होता है। 1957 में रात्रि की रामलीला की भी शुरुआत की गई। अब मथुरा, वृंदावन, अलीगढ़ आदि से कलाकारों की कम्पनी आने लगी। वर्ष 1961 व 62 में कमेटी ने निर्णय किया कि स्थानीय लोगों द्वारा रामलीला का मंचन किया जाए।
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88 वर्षीय राजेश्वर प्रसाद कौशिक बताते हैं कि उस समय वे राम का पार्ट अदा करते थे। स्व. मुन्नी महाराज रावण, स्व. शिव प्रकाश शर्मा लक्ष्मण, मुरारीलाल वर्मा परशुराम तथा स्व. डा. लीला सिंह चौहान राजा दशरथ का पार्ट अदा करते थे। गांव सरकड़े के पंडित जी रामायण वाचक हुआ करते थे। कलाकार एक माह पहले से अपने पार्ट की तैयारी करते थे। 1963 में कमेटी की फूट के कारण स्थानीय लोगों द्वारा रामलीला में पार्ट अदा करना बंद हो गया। बाहर की कम्पनी द्वारा रामलीला का मंचन होने लगा। कुछ वर्ष बाद ही रात की रामलीला भी रामलीला मैदान में होने लगा, जो अब तक जारी है।

कौशिक जी बताते हैं कि धार्मिक रुचि का स्थान आडंबर ने ले लिया। पहले समर्पण था जो स्वार्थ में बदल गया। जन सहयोग लेना बंद हुआ या मिलना बंद हुआ। तब रामलीला आस्था थी, धीरे धीरे ये मनोरंजन हो गई। वे बताते हैं कि तब कलाकार मंच पर पूर्ण निष्ठा के साथ रहते थे। तामसिक भोजन भी नहीं करते थे। वर्ष 1963 से मोहल्ला चंचलपुरियान में भी चुन्नी पहलवान के सौजन्य से रामलीला का प्रदर्शन शुरू हुआ। जो चुन्नी पहलवान की मृत्यु के बाद, जगह की कमी के कारण बंद हो गई। इस के बाद नगर में शिवजी मार्केट, रियासत आदि में भी रामलीला का प्रदर्शन होने लगा। जो आज भी जारी है।
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