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Bijnor News: कण्व आश्रम-विदुरकुटी और किला पारसनाथ की बदलेगी सूरत
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- तीनों धार्मिक स्थलों के लिए पांच करोड़ का बजट शासन ने किया जारी
- विदुरकुटी के विकास पर खर्च किए जाएंगे तीन करोड़
संवाद न्यूज एजेंसी
बिजनौर। जिले की धरा का प्राचीन संस्कृति से गहरा नाता रहा है। जनपद में अलग-अलग जगहों पर पौराणिक और ऐतिहासिक स्थलों की मौजूदगी में यह तस्वीर साफ करने के लिए काफी है। बिजनौर की धरती का जिक्र रामायणकाल में उतरापथ के तौर पर किया गया। किला मोरध्वज और विदुरकुटी महाभारत काल से जोड़ देती हैं।
शासन ने जिले के पौराणिक स्थलों को लेकर गंभीरता जताई है। विदुरकुटी, किला पारसनाथ और कण्व आश्रम की सूरत बदलने जा रही है। इन तीनों जगहों पर विकास कार्य कराने और संवारने के लिए पांच करोड़ का बजट जारी कर दिया गया है। तीन करोड़ की लागत से विदुरकुटी और एक एक करोड़ की लागत से कण्व आश्रम तथा किला पारसनाथ में विकास कार्य कराएं जाएंगे।
- इसलिए खास है विदुरकुटी
महाभारत के वक्त महात्मा विदुर हस्तिनापुर राज्यसभा में अनदेखी के चलते विदुरकुटी आ गए थे। जोकि विदुरकुटी में रहने लगे। दुर्याेधन का छप्पन भोग त्यागने के बाद श्रीकृष्ण ने विदुरकुटी में आकर बथुए का साग खाया था। तभी से विदुरकुटी के आसपास बथुआ सालभर हरा भरा रहता है।
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- एक नजर में अन्य स्थलों की झलक
मेनका ताल : अभिज्ञान शाकुंतलम में जिक्र है कि मालन के तट पर कण्व आश्रम है। मंडावर के गांव मोहंडिया वाली जगह पर ही पहली बार दुष्यंत और शकुंतला का मिलन हुआ था। इसलिए पहले यह बस्ती मोहदिया कहलाती थी, यहां आज भी शकुंतला की मां मेनका के नाम पर एक ताल है। इसी ताल में शकुंतला की अंगूठी गिरी थी।
मां गलखा मंदिर : गंगा किनारे कुंदनपुर टीप के पास गलखा देवी मंदिर है। बताया जाता है कि इसी मंदिर से भगवान कृष्ण रुक्मणी का हरण करके ले गए थे। लोग कहते हैं कि पुराणों में जिस कुंडीनपुर का जिक्र आता है, वह अब का कुंदनपुर गांव है। रुक्मणी कुंडीनपुर की ही रहने वालीं थीं, इस स्थान के पास खुदाई में कुषाण काल की तीन मोहरें मिली थीं। इसी गलखा क्षेत्र को भीष्म के राज्य के साथ भी जोड़ा जाता है।
जामा मस्जिद मंडावर : मंडावर में शमशुद्दीन इल्तुतमिश द्वारा बनवाई गई मस्जिद है। जोकि 822 साल पुरानी है। यह स्थापत्य कला का बेजोड़ उदाहरण है। मंडावर में प्रसिद्ध चीनी यात्री ह्वनेसांग छह महीने रहा था। प्राचीन काल में मंडावर को मतीपुरा भी कहा जाता था।
गुरुद्वारा बाग साहिब : हल्दौर में गुरु नानक देव ने पांच सौ साल पहले पहुंचकर धर्म प्रचार किया था। उस वक्त हल्दौर के राजा कमल नारायण राणा ने गुरु नानक देव की वाणी सुनी थी, प्रभावित होकर एक बड़ा बाग गुरुद्वारे को दान कर दिया था। गुरु नानक बाग साहिब में देश विदेश से लोग आते हैं।
सीता बनी : चांदपुर क्षेत्र के नारनौर के पास बना एक मठ सीताबनी के नाम से जाना जाता है। कहते हैं कि माता सीता इसी जगह पर धरती में समाईं थीं। इस मठ के आसपास एक विशेष घास पाई जाती है जोकि इस क्षेत्र के अलावा कहीं नहीं दिखती। यहां एक यज्ञकुंड और मठ की संरचना ही बनी हुई है।
किला मोरध्वज : महाभारत समाप्त होने के बाद भगवान श्रीकृष्ण ने अपने भक्त मोरध्वज की परीक्षा इसी स्थान पर पहुंचकर ली थी। ऋषि के वेष में आए श्रीकृष्ण के शेर के आगे राजा मोरध्वज ने बेटे का सिर काटकर डाल दिया था। राजा मोरध्वज का किला इसी गांव में हुआ करता था, जिसके अवशेष आज भी जगह जगह बिखरे पड़े हैं। गढ़वाल विश्वविद्यालय में इस स्थान से मिली तमाम मूर्तियां और धरोहर सुरक्षित रखी हैं। यहां पर मोरध्वजेश्वर के नाम से शिवमंदिर है।
सभी धरोहरों को संजोया जाएगा : सीडीओ
सीडीओ पूर्ण बोहरा ने बताया कि जिले की सभी ऐतिहासिक, पौराणिक और सांस्कृतिक धरोहरों को विकसित किया जाएगा। अभी तीन के लिए बजट आया है, बाकी के लिए बजट मांगा गया है। 16 धरोहरों की सूची तैयार कर ली गई है।
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- विदुरकुटी के विकास पर खर्च किए जाएंगे तीन करोड़
संवाद न्यूज एजेंसी
बिजनौर। जिले की धरा का प्राचीन संस्कृति से गहरा नाता रहा है। जनपद में अलग-अलग जगहों पर पौराणिक और ऐतिहासिक स्थलों की मौजूदगी में यह तस्वीर साफ करने के लिए काफी है। बिजनौर की धरती का जिक्र रामायणकाल में उतरापथ के तौर पर किया गया। किला मोरध्वज और विदुरकुटी महाभारत काल से जोड़ देती हैं।
शासन ने जिले के पौराणिक स्थलों को लेकर गंभीरता जताई है। विदुरकुटी, किला पारसनाथ और कण्व आश्रम की सूरत बदलने जा रही है। इन तीनों जगहों पर विकास कार्य कराने और संवारने के लिए पांच करोड़ का बजट जारी कर दिया गया है। तीन करोड़ की लागत से विदुरकुटी और एक एक करोड़ की लागत से कण्व आश्रम तथा किला पारसनाथ में विकास कार्य कराएं जाएंगे।
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- इसलिए खास है विदुरकुटी
महाभारत के वक्त महात्मा विदुर हस्तिनापुर राज्यसभा में अनदेखी के चलते विदुरकुटी आ गए थे। जोकि विदुरकुटी में रहने लगे। दुर्याेधन का छप्पन भोग त्यागने के बाद श्रीकृष्ण ने विदुरकुटी में आकर बथुए का साग खाया था। तभी से विदुरकुटी के आसपास बथुआ सालभर हरा भरा रहता है।
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- एक नजर में अन्य स्थलों की झलक
मेनका ताल : अभिज्ञान शाकुंतलम में जिक्र है कि मालन के तट पर कण्व आश्रम है। मंडावर के गांव मोहंडिया वाली जगह पर ही पहली बार दुष्यंत और शकुंतला का मिलन हुआ था। इसलिए पहले यह बस्ती मोहदिया कहलाती थी, यहां आज भी शकुंतला की मां मेनका के नाम पर एक ताल है। इसी ताल में शकुंतला की अंगूठी गिरी थी।
मां गलखा मंदिर : गंगा किनारे कुंदनपुर टीप के पास गलखा देवी मंदिर है। बताया जाता है कि इसी मंदिर से भगवान कृष्ण रुक्मणी का हरण करके ले गए थे। लोग कहते हैं कि पुराणों में जिस कुंडीनपुर का जिक्र आता है, वह अब का कुंदनपुर गांव है। रुक्मणी कुंडीनपुर की ही रहने वालीं थीं, इस स्थान के पास खुदाई में कुषाण काल की तीन मोहरें मिली थीं। इसी गलखा क्षेत्र को भीष्म के राज्य के साथ भी जोड़ा जाता है।
जामा मस्जिद मंडावर : मंडावर में शमशुद्दीन इल्तुतमिश द्वारा बनवाई गई मस्जिद है। जोकि 822 साल पुरानी है। यह स्थापत्य कला का बेजोड़ उदाहरण है। मंडावर में प्रसिद्ध चीनी यात्री ह्वनेसांग छह महीने रहा था। प्राचीन काल में मंडावर को मतीपुरा भी कहा जाता था।
गुरुद्वारा बाग साहिब : हल्दौर में गुरु नानक देव ने पांच सौ साल पहले पहुंचकर धर्म प्रचार किया था। उस वक्त हल्दौर के राजा कमल नारायण राणा ने गुरु नानक देव की वाणी सुनी थी, प्रभावित होकर एक बड़ा बाग गुरुद्वारे को दान कर दिया था। गुरु नानक बाग साहिब में देश विदेश से लोग आते हैं।
सीता बनी : चांदपुर क्षेत्र के नारनौर के पास बना एक मठ सीताबनी के नाम से जाना जाता है। कहते हैं कि माता सीता इसी जगह पर धरती में समाईं थीं। इस मठ के आसपास एक विशेष घास पाई जाती है जोकि इस क्षेत्र के अलावा कहीं नहीं दिखती। यहां एक यज्ञकुंड और मठ की संरचना ही बनी हुई है।
किला मोरध्वज : महाभारत समाप्त होने के बाद भगवान श्रीकृष्ण ने अपने भक्त मोरध्वज की परीक्षा इसी स्थान पर पहुंचकर ली थी। ऋषि के वेष में आए श्रीकृष्ण के शेर के आगे राजा मोरध्वज ने बेटे का सिर काटकर डाल दिया था। राजा मोरध्वज का किला इसी गांव में हुआ करता था, जिसके अवशेष आज भी जगह जगह बिखरे पड़े हैं। गढ़वाल विश्वविद्यालय में इस स्थान से मिली तमाम मूर्तियां और धरोहर सुरक्षित रखी हैं। यहां पर मोरध्वजेश्वर के नाम से शिवमंदिर है।
सभी धरोहरों को संजोया जाएगा : सीडीओ
सीडीओ पूर्ण बोहरा ने बताया कि जिले की सभी ऐतिहासिक, पौराणिक और सांस्कृतिक धरोहरों को विकसित किया जाएगा। अभी तीन के लिए बजट आया है, बाकी के लिए बजट मांगा गया है। 16 धरोहरों की सूची तैयार कर ली गई है।