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जिले में शून्य हुआ कपास का रकबा

Wed, 07 Oct 2020 11:45 PM IST
Meerut Bureau मेरठ ब्यूरो
Updated Wed, 07 Oct 2020 11:45 PM IST
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The area of cotton has reduced to zero in the district
जिले में शून्य हुआ कपास का रकबा
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बिजनौर। कपास की खेती जिले में इतिहास ही बनकर रह गई है। जिले में शायद ही कोई किसान हो जो कपास की खेती कर रहा हो। कपास की खेती अगर किसान फिर से शुरू करते हैं तो उनके पास आमदनी वाली फसल का एक नया विकल्प हो सकता है। लेकिन किसान इसकी ओर जागरूक नहीं हैं।
जिले में कभी कपास की खेती प्रमुखता से होती थी। हजारों बीघा जमीन में कपास की खेती होती थी। गन्ने का रकबा कपास से कम होता था। लेेकिन 80 का दशक आने से पहले ही जिले में कपास की खेती लगभग खत्म हो गई। आज जिले की युवा पीढ़ी के किसानों को तो यह पता भी नहीं है कि जिले में कभी कपास की खेती होती थी। जिले के किसान पूरी तरह आमदनी के लिए गन्ना, गेहूं, धान की फसल ही बो रहे हैं। जबकि कपास उन गिनी चुनी फसलों में से एक है जिसका केंद्र सरकार द्वारा न्यूनतम समर्थन मूल्य निर्धारित किया जाता है। गुजरात के के किसानों की मुख्य फसल अब जिले में खत्म हो गई है। इसकी एक मुख्य वजह सिंचाई के साधनों की बढ़ोतरी है। जिले में काफी बारिश होती है। कपास की फसल के लिए बारिश काल होती है। जबकि धान, गन्ने और गेहूं को बारिश फायदा पहुंचाती है। बारिश ज्यादा होने और साथ ही सिंचाई के साधन बढ़ने से किसानों ने भी इन फसलों की ओर रुख किया है। इन फसलों का रेट कुछ भी मिले, भुगतान भी लेट ही मिल,े लेकिन किसान कपास की ओर फिर से मुड़ने को तैयार नहीं हैं।
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सहफसली खेती अपना रहे किसान
जिले के किसान सहफसली खेती को अपना रहे हैं। सहफसली खेती, मछली उत्पादन के नए तरीकों को तो अपनाया लेकिन कपास की खेती में कोई हाथ डालने को अभी तैयार नहीं है। आत्मा परियोजना प्रभारी योगेंद्रपाल सिंह योगी का कहना है कि जिले में किसी किसान के कपास बोने के बारे में नहीं सुना है। कभी जिले में कपास की खेती होती थी, लेकिन अब ऐसा नहीं हो रहा है।
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