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अब बिन झूला सूनी ही रहती है अमुवा की डाल
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प्रीती।
- फोटो : BIJNOR
अब बिन झूला सूनी ही रहती है अमुवा की डाल
नूरपुर। झूला तो पड़ गए अमुवा की डाल पे जी, ऐ जी कान्हा बिन राधा को झूला झुलावे अब कौन जी ...। सावन की मल्हारों और झूलों पर पींग के साथ मनाया जाने वाला महिलाओं का त्योहार हरियाली तीज बदलते समय के साथ फीका पड़ गया है। पहले जहां ग्रामीण क्षेत्रों में तीज से 15 दिन पहले गांव के बड़े पेड़ की डालों पर झूले पड़ जाते थे और शाम होते ही वहां महिलाओं की भीड़ एकत्र हो जाती थी, अब ऐसा कुछ नहीं होता। लेकिन अब पेड़ सूने पडे़ रहते हैं। शहरों में भी तीज के दिन तीज मेले का आयोजन कर किसी एक महिला को तीज क्वीन चुनने के बाद त्योहार पूरा हो जाता है।
श्रावण मास की शुक्ल पक्ष की तृतीया को हरियाली तीज का त्योहार मनाया जाता है। विवाहित महिलाएं इस त्योहार को बड़े शौक के साथ मनाती हैं। पूर्वी उत्तर प्रदेश में इस त्योहार को कजली तीज के रूप में मनाया जाता है। आस्था, उमंग, सौंदर्य और प्रेम का यह उत्सव शिव पार्वती के पुनर्मिलन के रूप में मनाया जाता है। सावन में चारों तरफ हरियाली होने के कारण इसे हरियाली तीज भी कहते हैं। सुहागिन महिलाओं के लिए तीज का व्रत काफी मायने रखता है, लेकिन बदलते समय के साथ इसका स्वरूप भी बदल गया है।
गांवों में अब पेड़ रहे न झूले
गांव हंसुपुरा निवासी कुंती देवी का कहना है कि पहले सावन का महीना शुरू होते ही हरियाली तीज की तैयारी शुरू हो जाती थी। तीज के 15 दिन पहले से गांव के बड़े पेड़ों की डाल पर झूले बांध दिए जाते थे। शाम होते ही वहां झूला झूलने के लिए महिलाओं की भीड़ एकत्र हो जाती थी। झूला बांधने में गांव के पुरुष महिलाओं की मदद करते थे, लेकिन बदलते समय के साथ न तो गांव में पेड़ रहे और न ही झूले। अब केवल तीज के दिन कुछ महिलाएं गांव के एक निश्चित स्थान पर एकत्र होकर तीज का त्योहार मना लेती हैं।
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बच्चों को बताएं त्योहारों का महत्व
एक निजी स्कूल में शिक्षिका रश्मि बंसल का कहना है कि त्योहार हमारी संस्कृति का हिस्सा हैं। प्रत्येक त्योहार को हमें उत्साह और उत्सव से मनाना चाहिए। अपने बच्चों को त्योहार का महत्व और उसे मनाने की परंपरा बतानी चाहिए। मोहल्ला गांधीनगर निवासी प्रीती का कहना है कि आधुनिक समाज में भले ही त्योहारों का स्वरूप बदल गया हो, लेकिन भारतीय समाज में त्योहारों से दूर हटकर जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती। भारतीय विश्व के किसी भी कोने में रहें वह अपने त्योहारों और संस्कृति से जुड़े रहते हैं।
उत्साह का संचार करती है तीज
कबीरनगर निवासी उजाला यादव का कहना है कि तीज उत्सव महिलाओं में उमंग और उत्साह का संचार करता है। यह कहना गलत होगा कि त्योहार फीका पड़ गया है। आज भी विवाहित महिलाओं के मायके न आने पर उसके मायके वाले ससुराल में सिंदारा भेजते हैं। शहीदनगर निवासी रेशु त्यागी का कहना है कि महिलाओं को बेसब्री से तीज के त्योहार का इंतजार रहता है। वह हमेशा तीज पर अपने मायके जाती हैं और हर्ष के साथ त्योहार मनाती हैं।
शिव पार्वती के मिलन का दिन है तीज
कहा जाता है कि इस दिन माता पार्वती सैकड़ों वर्षों की साधना के बाद भगवान शिव से मिली थीं। माता पार्वती ने भागवान शिव को पति के रूप में पाने के लिए 107 बार जन्म लिया, लेकिन फिर भी भगवान शिव उन्हें पति के रूप में प्राप्त न हो सके। 108 वीं बार के जन्म में घोर तपस्या के बाद श्रावण मास की शुक्ल पक्ष तृतीया को भगवान शिव ने उनका वरण किया। तभी से तीज के व्रत का प्रारंभ हुआ। माना जाता है कि तीज पर जो सुहागिन महिलाएं सोलह शृंगार कर शिव पार्वती की पूजा करती हैं उनका सुहाग अखंड रहता है और उन्हें सौभाग्य की प्राप्ति होती है। कुंवारी कन्याओं को व्रत रखने पर विवाह में आने वाली बाधाएं दूर होती हैं।
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नूरपुर। झूला तो पड़ गए अमुवा की डाल पे जी, ऐ जी कान्हा बिन राधा को झूला झुलावे अब कौन जी ...। सावन की मल्हारों और झूलों पर पींग के साथ मनाया जाने वाला महिलाओं का त्योहार हरियाली तीज बदलते समय के साथ फीका पड़ गया है। पहले जहां ग्रामीण क्षेत्रों में तीज से 15 दिन पहले गांव के बड़े पेड़ की डालों पर झूले पड़ जाते थे और शाम होते ही वहां महिलाओं की भीड़ एकत्र हो जाती थी, अब ऐसा कुछ नहीं होता। लेकिन अब पेड़ सूने पडे़ रहते हैं। शहरों में भी तीज के दिन तीज मेले का आयोजन कर किसी एक महिला को तीज क्वीन चुनने के बाद त्योहार पूरा हो जाता है।
श्रावण मास की शुक्ल पक्ष की तृतीया को हरियाली तीज का त्योहार मनाया जाता है। विवाहित महिलाएं इस त्योहार को बड़े शौक के साथ मनाती हैं। पूर्वी उत्तर प्रदेश में इस त्योहार को कजली तीज के रूप में मनाया जाता है। आस्था, उमंग, सौंदर्य और प्रेम का यह उत्सव शिव पार्वती के पुनर्मिलन के रूप में मनाया जाता है। सावन में चारों तरफ हरियाली होने के कारण इसे हरियाली तीज भी कहते हैं। सुहागिन महिलाओं के लिए तीज का व्रत काफी मायने रखता है, लेकिन बदलते समय के साथ इसका स्वरूप भी बदल गया है।
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गांवों में अब पेड़ रहे न झूले
गांव हंसुपुरा निवासी कुंती देवी का कहना है कि पहले सावन का महीना शुरू होते ही हरियाली तीज की तैयारी शुरू हो जाती थी। तीज के 15 दिन पहले से गांव के बड़े पेड़ों की डाल पर झूले बांध दिए जाते थे। शाम होते ही वहां झूला झूलने के लिए महिलाओं की भीड़ एकत्र हो जाती थी। झूला बांधने में गांव के पुरुष महिलाओं की मदद करते थे, लेकिन बदलते समय के साथ न तो गांव में पेड़ रहे और न ही झूले। अब केवल तीज के दिन कुछ महिलाएं गांव के एक निश्चित स्थान पर एकत्र होकर तीज का त्योहार मना लेती हैं।
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बच्चों को बताएं त्योहारों का महत्व
एक निजी स्कूल में शिक्षिका रश्मि बंसल का कहना है कि त्योहार हमारी संस्कृति का हिस्सा हैं। प्रत्येक त्योहार को हमें उत्साह और उत्सव से मनाना चाहिए। अपने बच्चों को त्योहार का महत्व और उसे मनाने की परंपरा बतानी चाहिए। मोहल्ला गांधीनगर निवासी प्रीती का कहना है कि आधुनिक समाज में भले ही त्योहारों का स्वरूप बदल गया हो, लेकिन भारतीय समाज में त्योहारों से दूर हटकर जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती। भारतीय विश्व के किसी भी कोने में रहें वह अपने त्योहारों और संस्कृति से जुड़े रहते हैं।
उत्साह का संचार करती है तीज
कबीरनगर निवासी उजाला यादव का कहना है कि तीज उत्सव महिलाओं में उमंग और उत्साह का संचार करता है। यह कहना गलत होगा कि त्योहार फीका पड़ गया है। आज भी विवाहित महिलाओं के मायके न आने पर उसके मायके वाले ससुराल में सिंदारा भेजते हैं। शहीदनगर निवासी रेशु त्यागी का कहना है कि महिलाओं को बेसब्री से तीज के त्योहार का इंतजार रहता है। वह हमेशा तीज पर अपने मायके जाती हैं और हर्ष के साथ त्योहार मनाती हैं।
शिव पार्वती के मिलन का दिन है तीज
कहा जाता है कि इस दिन माता पार्वती सैकड़ों वर्षों की साधना के बाद भगवान शिव से मिली थीं। माता पार्वती ने भागवान शिव को पति के रूप में पाने के लिए 107 बार जन्म लिया, लेकिन फिर भी भगवान शिव उन्हें पति के रूप में प्राप्त न हो सके। 108 वीं बार के जन्म में घोर तपस्या के बाद श्रावण मास की शुक्ल पक्ष तृतीया को भगवान शिव ने उनका वरण किया। तभी से तीज के व्रत का प्रारंभ हुआ। माना जाता है कि तीज पर जो सुहागिन महिलाएं सोलह शृंगार कर शिव पार्वती की पूजा करती हैं उनका सुहाग अखंड रहता है और उन्हें सौभाग्य की प्राप्ति होती है। कुंवारी कन्याओं को व्रत रखने पर विवाह में आने वाली बाधाएं दूर होती हैं।

रश्मि बंसल।- फोटो : BIJNOR

रेशू त्यागी।- फोटो : BIJNOR

उजाला यादव।- फोटो : BIJNOR