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खटारा कार ने दुष्यंत को दिए दोस्त, उनमें ढूंढी गजल

Wed, 29 Dec 2021 11:54 PM IST
Meerut Bureau मेरठ ब्यूरो
Updated Wed, 29 Dec 2021 11:54 PM IST
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Khatara car gave friends to Dushyant, found Ghazal in them
नजीबाबाद - साहित्यकार दुष्यंत कुमार। - फोटो : NAZIBABAD
खटारा कार ने दुष्यंत को दिए दोस्त, उनमें ढूंढी गजल
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एजाज अहमद
नजीबाबाद (बिजनौर)। यहां तो सिर्फ गूंगे और बहरे लोग बसते हैं, खुदा जाने यहां पर किस तरह जलसा हुआ होगा। हाथों में अंगारों को लिए सोच रहा था, कोई मुझे अंगारों की तासीर बताए। जैसे गागर में सागर भरने वाले उद्गार हर कोई व्यक्त नहीं कर सकता। हिंदी गजल के प्रणेता दुष्यंत कुमार ने अपनी काव्य रचनाओं में समाज के ऐसे ही दर्द को समेटा।
तहसील के गांव राजपुर नवादा में एक सितंबर 1933 को जमींदार परिवार में जन्मे दुष्यंत कुमार ने छोटी उम्र में ही अपनी साहित्यिक सोच को परदेशी उपनाम से लेखनी दी। दुष्यंत कुमार के रघुनाथपुर निवासी बाल सखा 89 वर्षीय सत्य कुमार त्यागी का कहना है कि युवावस्था से ही दुष्यंत कुमार ने नाट्य मंचों और काव्य के माध्यम से साहित्यिक अभिरुचि और समाज चिंतन की सोच से अपनी अलग पहचान बनाई।
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वयोवृद्घ सत्य कुमार त्यागी बताते हैं कि दुष्यंत कुमार हिंदी उर्दू के मिश्रित शब्दों का प्रयोग करते थे। उनकी भाषा और काव्य आम जनता के दिलों में आसानी से उतर जाता था। दुष्यंत कुमार के पास एक पुरानी कार थी। उनका कहना था कि इस कार ने उन्हें अनेक दोस्त दिए। मिस्त्री कार ठीक करते थे बातचीत के दौरान वह उनमें गजल ढूंढते थे।
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सिर्फ हंगामा करना मेरा मकसद नहीं, मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए..., एक चिंगारी कहीं से ढूंढ लाओ दोस्तों, इस दीये में तेल से भीगी हुई बाती तो है..., पक गई आदतें बातों से सर होंगी नहीं, कोई हंगामा करो ऐसे गुजर होंगी नहीं..., अब तो इस तालाब का पानी बदल दो ये कमल के फूल कुम्हलाने लगे हैं..., कल नुमाइश में मिला वो चीथड़े पहने हुए, मैंने पूछा नाम तो बोला हिंदुस्तान हूं... के माध्यम से दुष्यंत कुमार ने सामाजिक ढांचे की खामियों को उजागर किया। साहित्य प्रेमियों और साहित्यकार कमलेश्वर के सानिध्य में दुष्यंत स्मृति संस्थान का गठन और मध्यप्रदेश सरकार ने दुष्यंत त्यागी अवार्ड शुरू किया। 42 वर्ष की उम्र में साहित्य सृजन में डूबी प्रतिभा 30 दिसंबर 1975 को दुनिया से विदा हो गई।

दुष्यंत की रचनाएं सड़क से संसद तक गूंजतीं हैं, दुष्यंत की पंक्तियां मेरे गीत तुम्हारे पास सहारा पाने आएंगे, मेरे बाद तुम्हें मेरी याद दिलाने आएंगे..., आज भी उनकी याद को तरोताजा बना रहीं हैं। उनकी चर्चित रचनाओं में - हो गई है पीर पर्वत सी पिघलनी चाहिए, अब कोई गंगा हिमालय से निकलनी चाहिए, मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने से सही, हो कहीं भी आग लेकिन आग जलनी चाहिए... दिलों की धड़कन बनी। साए में धूप और सूर्य का स्वागत, आंगन में एक वृक्ष, छोटे-छोटे सवाल, रेडियो नाटक और मसीहा मर गया, खंड काव्य एक कंठ विषपायी, जलते हुए वन का बसंत और आवाज के घेरे में प्रमुख कृतियां हैं।
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