ढाबे पर गुजरा बचपन, अब क्रिकेट में दिखा रहे हुनर, दर्जनों ट्रॉफी अपने नाम कर चुके हैं बिजनौर के दिव्यांग गुरुदेव
- जयपुर में संपन्न हुई क्रिकेट प्रतियोगिता में बतौर ऑल राउंडर किया शानदार प्रदर्शन
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उत्तर प्रदेश के बिजनौर में ढाबे पर बचपन गुजारने वाला दिव्यांग गुरुदेव क्रिकेट की दुनिया में चमकने लगा है। जयपुर में जनवरी के अंतिम सप्ताह में बतौर ऑलराउंडर नजीबाबाद के गुरुदेव ने अपने हुनर से क्रिकेट प्रेमियों का दिल जीत लिया।
नजीबाबाद तहसील के गांव चमरिया निवासी दिव्यांग गुरुदेव प्रदेश और भारतीय दिव्यांग जनों की क्रिकेट टीम का सदस्य है। बोर्ड ऑफ डिसएबल क्रिकेट एसोसिएशन ने गुरुदेव को पहले प्रदेश स्तर की टीम में और करीब एक वर्ष पूर्व भारतीय टीम में बतौर गेंदबाज शामिल किया है।
बीडीसीए क्रिकेट बोर्ड ने गुरुदेव के साथ प्रदेश स्तर की टीम में अलीगढ़ के पुष्पेंद्र और मेरठ के राकेश को बतौर कैप्टन भारतीय दिव्यांगजनों की क्रिकेट टीम में शामिल किया था। गुरुदेव क्रिकेट में एक के बाद एक कामयाबी के साथ दर्जनों ट्रॉफी अपनी झोली में कर चुका है।
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बरेली में आयोजित पृथ्वी कप 2019 में टीम को मिली ट्रॉफी गुरुदेव और टीम के सामूहिक के हुनर की कहानी बयां करती है। जयपुर में एक सप्ताह पूर्व संपन्न हुई क्रिकेट प्रतियोगिता में हालांकि राजस्थान की टीम विजयी रही, लेकिन उत्तर प्रदेश की टीम से दिव्यांग गुरुदेव ने बतौर ऑलराउंडर सभी का दिल जीत लिया। गुरुदेव ने दो विकेट हासिल किए। लंबे समय तक क्रीज पर जमे रहे और फील्डिंग में भी फुर्ती दिखाई।
भागूवाला के गांव चमरिया का 17 वर्षीय दिव्यांग गुरुदेव राजकीय इंटर कॉलेज काशीरामपुर का कक्षा 10 का विद्यार्थी है। पिता इंद्रू गोपाल का कई वर्ष पूर्व बीमारी में निधन हो गया। मां सविता ने अपनी बिटिया के साथ ढाबा चलाकर परिवार का पेट पाला।
सविता को दृढ़ विश्वास है कि उनका लाडला गुरुदेव राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपने प्रदर्शन से देश और क्षेत्र का नाम रोशन करेगा। वर्तमान में वह मुरादाबाद में क्रिकेट अभ्यास में व्यस्त है। गुरुदेव को बस इंतजार है तो भारतीय टीम के साथ मैदान में उतरने का ताकि वह अपनी गेंदबाजी, बल्लेबाजी और फील्डिंग के साथ टीम को जीत दिला सके।
बचपन में बाएं हाथ में लगी थी गंभीर चोट
बचपन में पेड़ से गिरने से गुरुदेव का बायां हाथ कलाई से टूट गया था। उसे बचपन से ही क्रिकेट का शौक था। गुरुदेव ने आर्थिक रूप से कमजोर परिवार का सहारा बनते हुए क्रिकेट से रुचि बरकरार रखी। अभ्यास, लगन और धैर्य के सहारे गुरुदेव ने दिव्यांगों की टीम तक पहुंचने का सफर तय किया।
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