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अब घरों में नहीं दिखाई देते चरखा
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शांति देवी।
- फोटो : BIJNOR
अब घरों में नहीं दिखाई देते चरखा
बिजनौर। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के देश में चरखा विलुप्त हो गया है। एक जमाने में हर घर में चरखा रहता था। चरखे से घर की बुजुर्ग महिलाएं सूत कातती थीं। इस सूत से दरी व कपड़े बनाए जाते थे पर ये सब पुरानी बात हो गई है।
एक जमाने में घर के एक कोने में चरखा दिखाई देता था। कोई घर ऐसा नहीं रहता था, जहां चरखे पर सूत महिला नहीं कातती हों। इसके अलावा गांधी आश्रम की दुकान की ओर से भी महिलाओं से सूत कतवाया जाता था। अब सब पुराने जमाने की बात हो गई है।
कस्बा झालू निवासी सोबीरी (80) कहती हैं कि वह खूब चरखे से सूत कातती थी। गांधी आश्रम की दुकान से भी सूत कतवाया जाता था। इसके बदले उन्हें पैसा मिलता था, पर अब कहीं सूत नहीं काता जाता।
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गांव झलरी निवासी 90 साल की बुजुर्ग शांति देवी का कहना है कि उन्होंने चरखा चलाकर खूब सूत काता है। अब चरखे कहीं दिखाई नहीं देते।
हत्थी से टांगते थे कंडील
महिलाएं बताती हैं कि घरों से चरखा खत्म होने के बाद चरखे को चलाने की हत्थी दीपावली पर छतों पर कंडील टांगने के काम आने लगी। हत्थी को लंबे बांस में रस्सी में बांधकर लोग कंडील टांगते थे। गंगा स्नान मेले में भी हत्थी से ही कंडील टंगे दिखार्द देते थे।
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बिजनौर। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के देश में चरखा विलुप्त हो गया है। एक जमाने में हर घर में चरखा रहता था। चरखे से घर की बुजुर्ग महिलाएं सूत कातती थीं। इस सूत से दरी व कपड़े बनाए जाते थे पर ये सब पुरानी बात हो गई है।
एक जमाने में घर के एक कोने में चरखा दिखाई देता था। कोई घर ऐसा नहीं रहता था, जहां चरखे पर सूत महिला नहीं कातती हों। इसके अलावा गांधी आश्रम की दुकान की ओर से भी महिलाओं से सूत कतवाया जाता था। अब सब पुराने जमाने की बात हो गई है।
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कस्बा झालू निवासी सोबीरी (80) कहती हैं कि वह खूब चरखे से सूत कातती थी। गांधी आश्रम की दुकान से भी सूत कतवाया जाता था। इसके बदले उन्हें पैसा मिलता था, पर अब कहीं सूत नहीं काता जाता।
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गांव झलरी निवासी 90 साल की बुजुर्ग शांति देवी का कहना है कि उन्होंने चरखा चलाकर खूब सूत काता है। अब चरखे कहीं दिखाई नहीं देते।
हत्थी से टांगते थे कंडील
महिलाएं बताती हैं कि घरों से चरखा खत्म होने के बाद चरखे को चलाने की हत्थी दीपावली पर छतों पर कंडील टांगने के काम आने लगी। हत्थी को लंबे बांस में रस्सी में बांधकर लोग कंडील टांगते थे। गंगा स्नान मेले में भी हत्थी से ही कंडील टंगे दिखार्द देते थे।

सौबीरी।- फोटो : BIJNOR