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भाई की लाश को कंधे पर रख निकल पड़ा
ब्यूरो/अमर उजाला, बिजनौर
Updated Tue, 08 May 2018 12:14 AM IST
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अपने भाई की लाश को कंधे पर रख जाता युवक।
- फोटो : अमर उजाला
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धामपुर मेंडाक्टरों को भगवान का दर्जा दिया जाता है, मगर धन को ही सब कुछ मानने वाले उत्तराखंड के एक डाक्टरों द्वारा पैसे न देने पर मरीज का शव ले जाने के लिए परिजनों को एंबुलेंस उपलब्ध नहीं कराई गई। सिस्टम से हारे धामपुर थाने के गांव जैतरा के पंकज को अपने मृत भाई के शव को कंधे पर लादकर अस्पताल से बाहर ले जाने को विवश होना पड़ा।
गांव जैतरा निवासी पंकज कुमार ने बताया कि वह फलो का ठेेला लगाकर परिवार पालता है है। उसका छोटा भाई सचिन उर्फ संजू एक हलवाई की दुकान पर मजदूरी करता था। तीन माह से सचिन के फेफड़ों में इंफेक्शन था। पंकज उसका उपचार नगर के कई डाक्टरों से कराया, मगर उसकी हालत और बिगड़ती चली गई। परिजनों ने उसको दून मेडिकल कालेज में भर्ती कराया। कई टेस्ट कराने को कहा। पंकज के पास पैसे न होने पर उसे निशुल्क टेस्ट कराने को लिख दिया गया, लेकिन आधार कार्ड न होने से डाक्टर द्वारा लिखित टेस्ट नहीं हो सके। जिस कारण उपचार के दौरान सचिन की चार दिन पहले तीन मई को मौत हो गई। अब पंकज के सामने मृतक भाई के शव को धामपुर लाने की थी।
दून मेडिकल की एंबुलेंस से अपने भाई का शव धामपुर पहुंचाने की उसने काफी गुहार लगाई। ऐसे में उससे पांच हजार जमा करने को कहा गया। पंकज गिड़गिड़ाया, मगर चिकित्सकों का दिल नहीं पसीजा। मेडिकल कालेज प्रशासन ने पंकज को उसके छोटे भाई की मृत्यु के कागज थमाते हुए शव को यहां से ले जाने का फरमान सुना दिया। उसने छोटे भाई के शव कंधे पर लाद लिया और अस्पताल से चल दिया। जब वह कुछ दूरी पर पहुंचा तो वहां से गुजर रहे मंगलामुखी ने इस मंजर को देखा। मंगलामुखी ने स्वयं आपस में चंदा एकत्र कर पंकज के भाई की लाश को धामपुर ले जाने के लिए एंबुलेंस उपलब्ध कराई और किराया देकर रवाना कर दिया। सोशल मीडिया पर खबर के वायरल होते ही मेडिकल कालेज प्रशासन ने हड़कंप मच गया। प्रदेश सरकार ने जांच के आदेेश भी दे दिए।
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गांव जैतरा निवासी पंकज कुमार ने बताया कि वह फलो का ठेेला लगाकर परिवार पालता है है। उसका छोटा भाई सचिन उर्फ संजू एक हलवाई की दुकान पर मजदूरी करता था। तीन माह से सचिन के फेफड़ों में इंफेक्शन था। पंकज उसका उपचार नगर के कई डाक्टरों से कराया, मगर उसकी हालत और बिगड़ती चली गई। परिजनों ने उसको दून मेडिकल कालेज में भर्ती कराया। कई टेस्ट कराने को कहा। पंकज के पास पैसे न होने पर उसे निशुल्क टेस्ट कराने को लिख दिया गया, लेकिन आधार कार्ड न होने से डाक्टर द्वारा लिखित टेस्ट नहीं हो सके। जिस कारण उपचार के दौरान सचिन की चार दिन पहले तीन मई को मौत हो गई। अब पंकज के सामने मृतक भाई के शव को धामपुर लाने की थी।
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दून मेडिकल की एंबुलेंस से अपने भाई का शव धामपुर पहुंचाने की उसने काफी गुहार लगाई। ऐसे में उससे पांच हजार जमा करने को कहा गया। पंकज गिड़गिड़ाया, मगर चिकित्सकों का दिल नहीं पसीजा। मेडिकल कालेज प्रशासन ने पंकज को उसके छोटे भाई की मृत्यु के कागज थमाते हुए शव को यहां से ले जाने का फरमान सुना दिया। उसने छोटे भाई के शव कंधे पर लाद लिया और अस्पताल से चल दिया। जब वह कुछ दूरी पर पहुंचा तो वहां से गुजर रहे मंगलामुखी ने इस मंजर को देखा। मंगलामुखी ने स्वयं आपस में चंदा एकत्र कर पंकज के भाई की लाश को धामपुर ले जाने के लिए एंबुलेंस उपलब्ध कराई और किराया देकर रवाना कर दिया। सोशल मीडिया पर खबर के वायरल होते ही मेडिकल कालेज प्रशासन ने हड़कंप मच गया। प्रदेश सरकार ने जांच के आदेेश भी दे दिए।
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