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‘भाव नमन हृदय से ऐसे सरस्वती सुत दुष्यंत को’
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‘भाव नमन हृदय से ऐसे सरस्वती सुत दुष्यंत को’
बिजनौर। हिंदी गजलकार दुष्यंत कुमार त्यागी की जयंती के अवसर पर संस्कार भारती की ओर से काव्य एवं विचार गोष्ठी का आयोजन किया गया। जिसकी अध्यक्षता सुमन चौधरी सुमन और संचालन रचना शास्त्री ने किया
ऑनलाइन हुई इस गोष्ठी का शुभारंभ संस्कार भारती के जिला संयोजक दीप अंजुम की सरस्वती वंदना से हुआ। देहरादून से कवि सतेंद्र शर्मा तरंग ने कहा- लेखनी से अपनी साए में धूप खिलाते थे। सूरते हाल हर हाल में बदलना चाहते थे। गीत उनके युगों तक इंकलाब गाएंगे, दुष्यंत सदियों तक जन-जन को जगाएंगे। कवयित्री रंजना हरित ने वर्तमान स्थिति पर तंज किया- हाथों से छूट गए पैन हमारे, लिखने लगे जब उंगली के सहारे। धामपुर से सुचि शर्मा ने कहा- नमन स्मरण वंदन मेरा काव्य उपवन के बसंत को, भाव नमन हृदय से ऐसे सरस्वती सुत दुष्यंत को। नजीबाबाद से नीमा शर्मा हंसमुख ने प्रेम गीत सुनाया वहीं मोंटू राजपूत ने माता-पिता की स्मृति में भावुक रचना पढ़ी। दीप अंजुम ने दुष्यंत की जमीन में एक गजल पढ़ी- पढ़ेंगे डूब कर तुझको कभी फुरसत के लम्हों में, किताबें जीस्त का जो भी वरक मोड़ा हुआ होगा। कवयित्री रचना शास्त्री ने कहा- अपनी तकदीर बना लेती हूं, तेरी तस्वीर बना लेती हूं, रांझा तुझको बनाती हुं जब, खुद को भी हीर बना लेती हूं।
गोष्ठी की अध्यक्षता कर रहीं सुमन चौधरी सुमन ने पढ़ा- दुष्यंत हमारी विरासत हैं, उन्हें कैसे भूलें हम, जन्म लेकर पावन किया? जिस माटी को उसे शत -शत नमन। विचार गोष्ठी में वक्ताओं ने जोर दिया कि बिजनौर में जन्मे दुष्यंत की कविताएं सड़कों से संसद तक आज भी गूंज रही हैं, लेकिन यह जिले का दुर्भाग्य है कि उनकी स्मृति को बिजनौर द्वारा नहीं सहेजा गया है। प्रशासन को इस ओर ध्यान देना चाहिए और उनके नाम से कोई स्मारक, पुस्तकालय आदि स्थापित किया जाना चाहिए। इनके अतिरिक्त गोष्ठी में ममता शर्मा नूरपुर, त्रिलोक शर्मा तिलक, अंकित राना आदि ने विचार रखे।
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बिजनौर। हिंदी गजलकार दुष्यंत कुमार त्यागी की जयंती के अवसर पर संस्कार भारती की ओर से काव्य एवं विचार गोष्ठी का आयोजन किया गया। जिसकी अध्यक्षता सुमन चौधरी सुमन और संचालन रचना शास्त्री ने किया
ऑनलाइन हुई इस गोष्ठी का शुभारंभ संस्कार भारती के जिला संयोजक दीप अंजुम की सरस्वती वंदना से हुआ। देहरादून से कवि सतेंद्र शर्मा तरंग ने कहा- लेखनी से अपनी साए में धूप खिलाते थे। सूरते हाल हर हाल में बदलना चाहते थे। गीत उनके युगों तक इंकलाब गाएंगे, दुष्यंत सदियों तक जन-जन को जगाएंगे। कवयित्री रंजना हरित ने वर्तमान स्थिति पर तंज किया- हाथों से छूट गए पैन हमारे, लिखने लगे जब उंगली के सहारे। धामपुर से सुचि शर्मा ने कहा- नमन स्मरण वंदन मेरा काव्य उपवन के बसंत को, भाव नमन हृदय से ऐसे सरस्वती सुत दुष्यंत को। नजीबाबाद से नीमा शर्मा हंसमुख ने प्रेम गीत सुनाया वहीं मोंटू राजपूत ने माता-पिता की स्मृति में भावुक रचना पढ़ी। दीप अंजुम ने दुष्यंत की जमीन में एक गजल पढ़ी- पढ़ेंगे डूब कर तुझको कभी फुरसत के लम्हों में, किताबें जीस्त का जो भी वरक मोड़ा हुआ होगा। कवयित्री रचना शास्त्री ने कहा- अपनी तकदीर बना लेती हूं, तेरी तस्वीर बना लेती हूं, रांझा तुझको बनाती हुं जब, खुद को भी हीर बना लेती हूं।
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गोष्ठी की अध्यक्षता कर रहीं सुमन चौधरी सुमन ने पढ़ा- दुष्यंत हमारी विरासत हैं, उन्हें कैसे भूलें हम, जन्म लेकर पावन किया? जिस माटी को उसे शत -शत नमन। विचार गोष्ठी में वक्ताओं ने जोर दिया कि बिजनौर में जन्मे दुष्यंत की कविताएं सड़कों से संसद तक आज भी गूंज रही हैं, लेकिन यह जिले का दुर्भाग्य है कि उनकी स्मृति को बिजनौर द्वारा नहीं सहेजा गया है। प्रशासन को इस ओर ध्यान देना चाहिए और उनके नाम से कोई स्मारक, पुस्तकालय आदि स्थापित किया जाना चाहिए। इनके अतिरिक्त गोष्ठी में ममता शर्मा नूरपुर, त्रिलोक शर्मा तिलक, अंकित राना आदि ने विचार रखे।
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