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आवाज से पक्षी को पहचान लेते हैं आशीष, युदिश और अंकित
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आवाज से पक्षी को पहचान लेते हैं आशीष, युदिश और अंकित
बिजनौर। कोरोना काल में स्कूल बंद होने पर बच्चों ने या तो ऑनलाइन पढ़ाई की है या फिर शरारतें करके अपने परिजनों को परेशान किया है। लेकिन कुछ बच्चे ऐसे भी हैं जिन्हें ऐसी परिस्थिति के सदुपयोग का मौका मिल गया। इन बच्चों ने हैदरपुर वेटलैंड में जाकर बर्ड वॉचिंग की। ये 125 से 150 पक्षियों तक की पहचान कर लेते हैं।
पिछले साल मार्च में लॉकडाउन लग गया था। तब काफी समय तक ऑनलाइन पढ़ाई भी शुरू नहीं हुई थी। बच्चों ने अपने आप ही पढ़ाई की थी। आर्ट ऑफ लिविंग से जुड़े आशीष लोया ने तब बच्चों के लिए सिंचाई विभाग की कॉलोनी में बाल चेतना शिविर लगाया था। वहां उन्होंने बच्चों को बर्ड वॉचिंग के लिए प्रेरित किया। कई बच्चे उनसे जुड़ गए। परिवारवालों ने भी इंकार नहीं किया। बच्चे वेटलैंड में जाकर पक्षियों की पहचान करने लगे।
बच्चों ने पक्षियों की पहचान के अलावा उनकी विशेषताएं भी जानीं। कुछ ने स्कूल खुलने पर वर्ड वाचिंग छोड़ दी। लेकिन 12 साल का अंकित और 13 साल का युदिश लगातार वेटलैंड जाते रहे। अब ये बर्ड वॉचिंग में इतने उस्ताद हो गए हैं कि कई पक्षियों को तो उनकी चहचहाने की आवाज से ही पहचान लेते हैं। अंकित और युदिश 125 से 150 तक पक्षियों की पहचान कर लेते हैं। इन्हें गाइड करने का कार्य आईटीआई उत्तीर्ण आशीष गुर्जर करता है। आशीष भी लगभग इतने ही पक्षियों की पहचान कर लेता है। बर्ड वॉचर आशीष लोया के अनुसार उनकी वजह से दूसरे बच्चे भी पर्यावरण से जुड़ेंगे। अगर कोई पर्यावरण से जुड़ता है तो वह फिर दूसरों को भी पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने नहीं देता है।
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आशीष गुर्जर ने खोजी पक्षियों की बस्ती
बर्ड वॉचिंग में आशीष गुर्जर के नाम से एक उपलब्धि भी जुड़ी है। वह वेटलैंड के पास के गांव कासमपुर खोला का रहने वाला है और वेटलैंड के भौगोलिक क्षेत्र की पहले से भी जानकारी थी। उसने बर्ड वॉचिंग करते हुए ब्लू टेल्ड बी ईटर पक्षी की एक बस्ती खोजी थी। यह प्रवासी पक्षी मधुमक्खी खाता है और मिट्टी के टीलों में छेद करके उसमें घर बनाकर रहता है। उसने वन विभाग को फोन किया तो विभाग ने तुरंत एक्शन लेकर उस टीले के आसपास खुदाई कराई ताकि वे उस जगह नुकसान न पहुंचा सकें। इस पक्षी की बस्ती को देखने के लिए सहारनपुर कमिश्नर भी आए थे।
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बिजनौर। कोरोना काल में स्कूल बंद होने पर बच्चों ने या तो ऑनलाइन पढ़ाई की है या फिर शरारतें करके अपने परिजनों को परेशान किया है। लेकिन कुछ बच्चे ऐसे भी हैं जिन्हें ऐसी परिस्थिति के सदुपयोग का मौका मिल गया। इन बच्चों ने हैदरपुर वेटलैंड में जाकर बर्ड वॉचिंग की। ये 125 से 150 पक्षियों तक की पहचान कर लेते हैं।
पिछले साल मार्च में लॉकडाउन लग गया था। तब काफी समय तक ऑनलाइन पढ़ाई भी शुरू नहीं हुई थी। बच्चों ने अपने आप ही पढ़ाई की थी। आर्ट ऑफ लिविंग से जुड़े आशीष लोया ने तब बच्चों के लिए सिंचाई विभाग की कॉलोनी में बाल चेतना शिविर लगाया था। वहां उन्होंने बच्चों को बर्ड वॉचिंग के लिए प्रेरित किया। कई बच्चे उनसे जुड़ गए। परिवारवालों ने भी इंकार नहीं किया। बच्चे वेटलैंड में जाकर पक्षियों की पहचान करने लगे।
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बच्चों ने पक्षियों की पहचान के अलावा उनकी विशेषताएं भी जानीं। कुछ ने स्कूल खुलने पर वर्ड वाचिंग छोड़ दी। लेकिन 12 साल का अंकित और 13 साल का युदिश लगातार वेटलैंड जाते रहे। अब ये बर्ड वॉचिंग में इतने उस्ताद हो गए हैं कि कई पक्षियों को तो उनकी चहचहाने की आवाज से ही पहचान लेते हैं। अंकित और युदिश 125 से 150 तक पक्षियों की पहचान कर लेते हैं। इन्हें गाइड करने का कार्य आईटीआई उत्तीर्ण आशीष गुर्जर करता है। आशीष भी लगभग इतने ही पक्षियों की पहचान कर लेता है। बर्ड वॉचर आशीष लोया के अनुसार उनकी वजह से दूसरे बच्चे भी पर्यावरण से जुड़ेंगे। अगर कोई पर्यावरण से जुड़ता है तो वह फिर दूसरों को भी पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने नहीं देता है।
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आशीष गुर्जर ने खोजी पक्षियों की बस्ती
बर्ड वॉचिंग में आशीष गुर्जर के नाम से एक उपलब्धि भी जुड़ी है। वह वेटलैंड के पास के गांव कासमपुर खोला का रहने वाला है और वेटलैंड के भौगोलिक क्षेत्र की पहले से भी जानकारी थी। उसने बर्ड वॉचिंग करते हुए ब्लू टेल्ड बी ईटर पक्षी की एक बस्ती खोजी थी। यह प्रवासी पक्षी मधुमक्खी खाता है और मिट्टी के टीलों में छेद करके उसमें घर बनाकर रहता है। उसने वन विभाग को फोन किया तो विभाग ने तुरंत एक्शन लेकर उस टीले के आसपास खुदाई कराई ताकि वे उस जगह नुकसान न पहुंचा सकें। इस पक्षी की बस्ती को देखने के लिए सहारनपुर कमिश्नर भी आए थे।