{"_id":"5e08f21e8ebc3e87dd3c8d82","slug":"a-man-has-become-a-female-guldar-bijnor-news-mrt461155044","type":"story","status":"publish","title_hn":"आदमखोर बन गई मादा गुलदार","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
आदमखोर बन गई मादा गुलदार
विज्ञापन
आदमखोर बन गई मादा गुलदार
बिजनौर। गांव असगरपुर व मोहंडिया में दो लोगों को मारने वाली गुलदार मादा है। दोनों घटनाओं को मादा गुलदार द्वारा मारने की बात ही सामने आ रही है। दोनों घटनाओं पर पदचिह्न एक जैसे मिले हैं। मादा गुलदार ने मालन नदी के किनारे के क्षेत्र को अपना ठिकाना बनाया है। वह मालन नदी के किनारे ही चल रही है। वहां पर शिकार की भरमार है। आगे मालन नदी गंगा में मिल जाती है। माना जा रहा है कि मादा गुलदार ने यही इलाका रहने के लिए चुन लिया है।
27 नवंबर को गुलदार ने पहला शिकार किया था। गांव चमरू नवादा निवासी समला देवी को गुलदार ने मार डाला था। इसके बाद दस दिसंबर को गुलदार ने सराय आलम निवासी चमन को मार डाला। यह गांव मालन नदी के किनारे है। इसके बाद गुलदार ने मालन नदी के किनारा ही पकड़ लिया है। 15 दिसंबर को गांव अकबरपुर चौगांवा निवासी रोहांश, 25 दिसंबर को गांव असगरपुर निवासी शानू व 26 दिसंबर को गांव बिचपड़ी निवासी शफीक को गांव मोहंडिया के जंगल में मारा था। ये सभी गांव मालन नदी के किनारे बसे हैं। मालन नदी के किनारे ही वन्यजीव रहना पसंद करते हैं। यहां पर शिकार भरपूर मात्रा में मौजूद रहता है। यह क्षेत्र खादर के हैं। यहां से थोड़ी दूर आगे ही मालन नदी गंगा में मिल जाती है। खादर में नीलगाय, बारहसिंगा, चीतल, खरगोश आदि की भरमार है। मालन नदी के बाद अगर गुलदार गंगा किनारे पहुंच गई तो वहां से उसका जाना मुश्किल है। वहां इंसानी गतिविधियां भी कम हैं। वन विभाग ने गुलदार की पहचान के लिए सेवानिवृत्त डीएफओ जीएस खुशारिया को बुलाया था। उन्होंने डीएफओ एम सेम्मारन के साथ असगरपुर व मोहंडिया में गुलदार के पदचिह्न की जांच की। जांच में प्रथम दृष्ट्या दोनों जगह के पदचिह्न एक जैसे मिले हैं। दोनों की बनावट के आधार पर वे मादा गुलदार के निकले। रिटायर्ड डीएफओ जीएस खुशारिया के अनुसार दोनों जगह गुलदार के पदचिह्न प्रथम दृष्टया एक से हैं। इनकी और गहराई से जांच की जाएगी।
लंबा होता है मादा गुलदार का पंजा
मादा गुलदार के पंजों की उंगलियां पतली होती हैं। इनका पंजा थोड़ा लंबा होता है। नर गुलदार के पंजे की उंगली मोटी और गोल होती हैं। इसका पंजा मादा गुलदार से ज्यादा चौड़ा होता है।
विज्ञापन
अभी अकेली है गुलदार
जहां भी मादा गुलदार ने शिकार किया या फिर जहां भी उसकी लोकेशन मिली, वहां पर शावकों के पंजों के कोई निशान नहीं मिले हैं। अभी तक मादा गुलदार अकेली ही घूम रही है। ऐसा हो सकता है कि वह गर्भवती हो।
चकरोड से ही तय करता है सफर
गुलदार हमेशा बने बनाए रास्ते पर ही चलता है। वह खेतों में केवल छिपने के लिए जाता है। एक जगह से दूसरी जगह जाने के लिए वह चकरोड का सहारा लेता है। गुलदार के पंजे नाजुक होते हैं। इसलिए वह चकरोड पर ही चलता है।
मादा गुलदार के हैं निशान
डीएफओ डा.एम सेम्मारन के मुताबिक मोहंडिया व असगरपुर के पास मिले पंजे के निशान मादा गुलदार के हैं। गुलदार को पकड़ने के लिए पिंजरा लगाया जा रहा है। गांववाले गुुलदार के पकड़े जाने तक सावधान होकर काम करें।
विज्ञापन
बिजनौर। गांव असगरपुर व मोहंडिया में दो लोगों को मारने वाली गुलदार मादा है। दोनों घटनाओं को मादा गुलदार द्वारा मारने की बात ही सामने आ रही है। दोनों घटनाओं पर पदचिह्न एक जैसे मिले हैं। मादा गुलदार ने मालन नदी के किनारे के क्षेत्र को अपना ठिकाना बनाया है। वह मालन नदी के किनारे ही चल रही है। वहां पर शिकार की भरमार है। आगे मालन नदी गंगा में मिल जाती है। माना जा रहा है कि मादा गुलदार ने यही इलाका रहने के लिए चुन लिया है।
27 नवंबर को गुलदार ने पहला शिकार किया था। गांव चमरू नवादा निवासी समला देवी को गुलदार ने मार डाला था। इसके बाद दस दिसंबर को गुलदार ने सराय आलम निवासी चमन को मार डाला। यह गांव मालन नदी के किनारे है। इसके बाद गुलदार ने मालन नदी के किनारा ही पकड़ लिया है। 15 दिसंबर को गांव अकबरपुर चौगांवा निवासी रोहांश, 25 दिसंबर को गांव असगरपुर निवासी शानू व 26 दिसंबर को गांव बिचपड़ी निवासी शफीक को गांव मोहंडिया के जंगल में मारा था। ये सभी गांव मालन नदी के किनारे बसे हैं। मालन नदी के किनारे ही वन्यजीव रहना पसंद करते हैं। यहां पर शिकार भरपूर मात्रा में मौजूद रहता है। यह क्षेत्र खादर के हैं। यहां से थोड़ी दूर आगे ही मालन नदी गंगा में मिल जाती है। खादर में नीलगाय, बारहसिंगा, चीतल, खरगोश आदि की भरमार है। मालन नदी के बाद अगर गुलदार गंगा किनारे पहुंच गई तो वहां से उसका जाना मुश्किल है। वहां इंसानी गतिविधियां भी कम हैं। वन विभाग ने गुलदार की पहचान के लिए सेवानिवृत्त डीएफओ जीएस खुशारिया को बुलाया था। उन्होंने डीएफओ एम सेम्मारन के साथ असगरपुर व मोहंडिया में गुलदार के पदचिह्न की जांच की। जांच में प्रथम दृष्ट्या दोनों जगह के पदचिह्न एक जैसे मिले हैं। दोनों की बनावट के आधार पर वे मादा गुलदार के निकले। रिटायर्ड डीएफओ जीएस खुशारिया के अनुसार दोनों जगह गुलदार के पदचिह्न प्रथम दृष्टया एक से हैं। इनकी और गहराई से जांच की जाएगी।
विज्ञापन
लंबा होता है मादा गुलदार का पंजा
मादा गुलदार के पंजों की उंगलियां पतली होती हैं। इनका पंजा थोड़ा लंबा होता है। नर गुलदार के पंजे की उंगली मोटी और गोल होती हैं। इसका पंजा मादा गुलदार से ज्यादा चौड़ा होता है।
विज्ञापन
अभी अकेली है गुलदार
जहां भी मादा गुलदार ने शिकार किया या फिर जहां भी उसकी लोकेशन मिली, वहां पर शावकों के पंजों के कोई निशान नहीं मिले हैं। अभी तक मादा गुलदार अकेली ही घूम रही है। ऐसा हो सकता है कि वह गर्भवती हो।
चकरोड से ही तय करता है सफर
गुलदार हमेशा बने बनाए रास्ते पर ही चलता है। वह खेतों में केवल छिपने के लिए जाता है। एक जगह से दूसरी जगह जाने के लिए वह चकरोड का सहारा लेता है। गुलदार के पंजे नाजुक होते हैं। इसलिए वह चकरोड पर ही चलता है।
मादा गुलदार के हैं निशान
डीएफओ डा.एम सेम्मारन के मुताबिक मोहंडिया व असगरपुर के पास मिले पंजे के निशान मादा गुलदार के हैं। गुलदार को पकड़ने के लिए पिंजरा लगाया जा रहा है। गांववाले गुुलदार के पकड़े जाने तक सावधान होकर काम करें।

मंडावर के ग्राम मोहंडिया में गुलदार का पंजे का निशान देखते डीएफओ।- फोटो : BIJNOR

मंडावर के ग्राम महेश्वरी में गुलदार के हमले से बचे किसान की लोई देखते एसडीएम व वन विभाग के अधिकार?- फोटो : BIJNOR