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संगीत साधना से माधुरी को मिला नारी शक्ति सम्मान
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नजीबाबाद। किसी भी लक्ष्य के लिए की गई साधना बेकार नहीं होती। आकाशवाणी नजीबाबाद केंद्र से सेवानिवृत्त हुई संगीत साधिका डा. माधुरी बड़थवाल ने संगीत साधना के लिए राष्ट्रपति से नारी शक्ति सम्मान पाकर यह बात सच साबित की है।
उत्तराखंड की पारंपरिक लोक विधाओं को विलुप्त होने से बचाने, कलाकारों को खोजने, लोकगीतों को जन-जन तक पहुंचा कर संरक्षित रखने के लिए डा. माधुरी बड़थवाल को राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने नारी शक्ति सम्मान प्रदान किया। विभिन्न क्षेत्रों में सराहनीय कार्य करने वाली देश की 40 महिलाओं के साथ उन्हें यह सम्मान दिया गया है। आकाशवाणी नजीबाबाद केंद्र में बतौर म्यूजिक कंपोजर पद पर करीब तीन दशक तक अपनी सेवाएं देने वाली माधुरी बड़थवाल को संगीत के प्रति समर्पण की भावना अपने पिता संगीत अनुरागी चंद्रमणि उनियाल से मिली। प्रयाग संगीत समिति से संगीत की शिक्षा पाने वाली माधुरी ने नजीबाबाद केंद्र के संगीत विभाग से जुड़कर गढ़वाल के पारंपरिक गढ़वाली, कुमाउनी और जौनसारी लोकगीतों को विलुप्त होने से बचाने के लिए काम किया। उन्होंने लोकगीतों से जुड़े कलाकारों को खोजने, आकाशवाणी से माध्यम से उन्हें जन-जन तक पहुंचाने में सेतु का काम किया।
आकाशवाणी नजीबाबाद केंद्र से वर्ष 2010 में सेवानिवृत्त होने के बाद उन्होंने उत्तराखंड के चप्पे-चप्पे मेें भ्रमण कर लोकगीतों पर शोध के साथ पुस्तक लिखी।
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उत्तराखंड की पारंपरिक लोक विधाओं को विलुप्त होने से बचाने, कलाकारों को खोजने, लोकगीतों को जन-जन तक पहुंचा कर संरक्षित रखने के लिए डा. माधुरी बड़थवाल को राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने नारी शक्ति सम्मान प्रदान किया। विभिन्न क्षेत्रों में सराहनीय कार्य करने वाली देश की 40 महिलाओं के साथ उन्हें यह सम्मान दिया गया है। आकाशवाणी नजीबाबाद केंद्र में बतौर म्यूजिक कंपोजर पद पर करीब तीन दशक तक अपनी सेवाएं देने वाली माधुरी बड़थवाल को संगीत के प्रति समर्पण की भावना अपने पिता संगीत अनुरागी चंद्रमणि उनियाल से मिली। प्रयाग संगीत समिति से संगीत की शिक्षा पाने वाली माधुरी ने नजीबाबाद केंद्र के संगीत विभाग से जुड़कर गढ़वाल के पारंपरिक गढ़वाली, कुमाउनी और जौनसारी लोकगीतों को विलुप्त होने से बचाने के लिए काम किया। उन्होंने लोकगीतों से जुड़े कलाकारों को खोजने, आकाशवाणी से माध्यम से उन्हें जन-जन तक पहुंचाने में सेतु का काम किया।
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आकाशवाणी नजीबाबाद केंद्र से वर्ष 2010 में सेवानिवृत्त होने के बाद उन्होंने उत्तराखंड के चप्पे-चप्पे मेें भ्रमण कर लोकगीतों पर शोध के साथ पुस्तक लिखी।