{"_id":"5a7f3e1b4f1c1b2a788b525e","slug":"171518288411-bijnor-news","type":"story","status":"publish","title_hn":"खुले आसमान के नीचे गुजरी नंगला के उजड़े परिवारों कीठंडी रात","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
खुले आसमान के नीचे गुजरी नंगला के उजड़े परिवारों कीठंडी रात
Updated Sun, 11 Feb 2018 12:16 AM IST
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नींदडू़। हकीमपुर नारायन उर्फ नंगला में शुक्रवार को प्रशासन ने जेसीबी से चार मकानों को गिरा दिया था। ये मकान पट्टे की जमीन पर बने हुए थे। तालाब की इस जमीन के पट्टे निरस्त होने के बाद न्यायालय के आदेश पर यह कार्रवाई की गई। 400 वर्गमीटर भूमि में बने मकान गिराने के बाद 15 परिवार के 64 सदस्यों को कड़कड़ाती ठंड में खुले आसमान के नीचे रात गुजारनी पड़ी।
शनिवार को जयचंद, भगवाना, हरपाल, बलराम, परमेश्वरी, बीरो आदि ने बताया कि शुक्रवार को उनके घर उजाड़ने के बाद प्रशासनिक अधिकारियों ने उनसे अपना सामान अस्थायी घरों में शिफ्ट करने को कहा था। आश्वासन दिया था कि जल्दी ही प्रधानमंत्री ग्रामीण आवास योजना के तहत उनके नए मकान बनाए जाएंगे। इस आश्वासन के बाद कुछ लोग नए बसेरे की ओर आ गए और बाकी सामान के पास रहे। शाम को उनके घरों में चूल्हे तक नहीं जले। ठंड के मौसम में उन्हें खुले आसमान के नीचे रात गुजारनी पड़ी।
उनका कहना था कि रात में सुरक्षा के लिए सिपाहियों की ड्यूटी लगाई गई थी, किंतु वे अंधेरा गहराते ही चले गए। उनका कहना है कि मिट्टी से तामीर की गई सात आठ फुट ऊंची दीवारों पर छत के लिए टिन की चादरें ऐसे ही रखी गई हैं। जिनके हवा में उड़ जाने का खतरा है। प्रशासन के आश्वासन पर वे वहां आ तो गए हैं, लेकिन सामने से खुले अस्थायी चार छोटे घरों में 15 परिवारों का रह पाना मुश्किल है।
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पौने दो बीघा जमीन बनी बेघर होने की वजह
नींदडू़। बलराम सिंह ने बताया कि जंगल में जयचंद, बिशन सिंह, रोहिताश, भगवाना और उस समेत पांच भाइयों की पौने दो बीघा खेती की जमीन है। उसके बराबर में गांव के ही एक व्यक्ति की डेढ़ बीघा कृषि की भूमि है, जो जुताई करते समय उनके खेत को काटता रहता था। इतना ही नहीं उनकी बोई फसल भी काट लेता था। इस बात को लेकर दोनों पक्ष में तकरार हुई तथा मामला मुंसफी तक पहुंच गया, जहां से यथास्थिति बनाए रखने का आदेश है। इसी बात से नाराज व्यक्ति ने तालाब में पट्टों का मामला उठाया और प्रशासन द्वारा अदालत के आदेश पर नौ फरवरी को वे घर से बेघर कर दिए गए, जबकि गांव में इस प्रकार के 32 पट्टे किए गए हैं।
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शनिवार को जयचंद, भगवाना, हरपाल, बलराम, परमेश्वरी, बीरो आदि ने बताया कि शुक्रवार को उनके घर उजाड़ने के बाद प्रशासनिक अधिकारियों ने उनसे अपना सामान अस्थायी घरों में शिफ्ट करने को कहा था। आश्वासन दिया था कि जल्दी ही प्रधानमंत्री ग्रामीण आवास योजना के तहत उनके नए मकान बनाए जाएंगे। इस आश्वासन के बाद कुछ लोग नए बसेरे की ओर आ गए और बाकी सामान के पास रहे। शाम को उनके घरों में चूल्हे तक नहीं जले। ठंड के मौसम में उन्हें खुले आसमान के नीचे रात गुजारनी पड़ी।
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उनका कहना था कि रात में सुरक्षा के लिए सिपाहियों की ड्यूटी लगाई गई थी, किंतु वे अंधेरा गहराते ही चले गए। उनका कहना है कि मिट्टी से तामीर की गई सात आठ फुट ऊंची दीवारों पर छत के लिए टिन की चादरें ऐसे ही रखी गई हैं। जिनके हवा में उड़ जाने का खतरा है। प्रशासन के आश्वासन पर वे वहां आ तो गए हैं, लेकिन सामने से खुले अस्थायी चार छोटे घरों में 15 परिवारों का रह पाना मुश्किल है।
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पौने दो बीघा जमीन बनी बेघर होने की वजह
नींदडू़। बलराम सिंह ने बताया कि जंगल में जयचंद, बिशन सिंह, रोहिताश, भगवाना और उस समेत पांच भाइयों की पौने दो बीघा खेती की जमीन है। उसके बराबर में गांव के ही एक व्यक्ति की डेढ़ बीघा कृषि की भूमि है, जो जुताई करते समय उनके खेत को काटता रहता था। इतना ही नहीं उनकी बोई फसल भी काट लेता था। इस बात को लेकर दोनों पक्ष में तकरार हुई तथा मामला मुंसफी तक पहुंच गया, जहां से यथास्थिति बनाए रखने का आदेश है। इसी बात से नाराज व्यक्ति ने तालाब में पट्टों का मामला उठाया और प्रशासन द्वारा अदालत के आदेश पर नौ फरवरी को वे घर से बेघर कर दिए गए, जबकि गांव में इस प्रकार के 32 पट्टे किए गए हैं।