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इंजीनियर बनते-बनते समाज का विलेन बन गया विनय
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मुंबई के बांद्रा में अफवाह फैलाने के आरोपी विनय दूबे के भदोही जनपद के हरिनारायणपुर स्थित घर पर पस
- फोटो : BHADOHI
औराई (भदोही)। लॉकडाउन की पाबंदियों के बीच मुंबई के बांद्रा में भारी भीड़ एकत्र करने का आरोपी भदोही का विनय दुबे निजी जिंदगी में इंजीनियर बनते-बनते कब समाज का दुश्मन बन गया, वह खुद और उसके परिवार वाले भी नहीं समझ पाए। उसने गरीब-मजदूरों के हक-हकूक के लिए सिस्टम से दो-दो हाथ करने की तमन्ना मन में पाली थी, लेकिन वह मानवता का गुनहगार बन बैठा।
भदोही जिले के औराई क्षेत्र के हरिनारायणपुर गांव निवासी जटाशंकर दुबे के पहले पुत्र विनय की जिंदगी में कुछ कर गुजरने की हसरत उसके होश संभालते ही दिखने लगी थी। यही वजह थी कि महज 22 साल की उम्र में उसने 2012 में वाराणसी शहर उत्तरी से विधानसभा का चुनाव अजय राय के सामने एनसीपी के टिकट पर लड़ा। सफलता नहीं मिली तो पार्टी छोड़कर महाराष्ट्र में उत्तर भारतीय महापंचायत नाम से स्वयंसेवी संगठन बनाकर समाजसेवा में जुट गया। लेकिन, राजनीतिक से मोहभंग अब भी नहीं हुआ था। लिहाजा, महज सोशल मीडिया के फैन फॉलोवर्स के बूते पिछले लोकसभा चुनाव में मुंबई के ऐरोली सीट से निर्दलीय चुनाव मैदान में उतर गया, मगर फिर हार का सामना करना पड़ा। इस बीच मुंबई में उत्तर भारतीयों की अगुवाई करने की हसरत को लॉकडाउन में मुफीद मौका मिल गया और वह सोशल नेटवर्किंग साइट्स फेसबुक, ट्विटर, व्हाट्सएप आदि के जरिए लंबे-चौड़े पोस्ट कर मुंबई में उत्तर भारतीयों की नुमाइंदगी करने की राह पर चल पड़ा। इस बीच उसके एक पोस्ट ने सोशल मीडिया पर खलबली मचा कर रख दी। आरोप है कि उसकी पोस्ट के कारण ही बड़ी तादाद में उत्तर भारतीय लोग बांद्रा में एकत्र हुए और लॉकडाउन तार-तार हो गया।
गाहे-बगाहे होता है गांव आगमन
औराई। हरिनारायण पुर गांव निवासी विनय दुबे और उसके परिवार का आगमन यहां कम ही हो पाता है। किसी शादी-विवाह या खास मौकों पर ही उसका परिवार यहां आता है। उसके पिता जटाशंकर मुंबई में ऑटो ड्राइवर हैं। यहां गांव में पैतृक मकान है, जिसमें उसके बड़े पिताजी रविशंकर दुबे अपनी पत्नी के साथ रहते हैं। विनय की पैदाइश से लेकर पढ़ाई-लिखाई तक सब कुछ मुंबई में ही हुआ। चार भाइयों में सबसे बड़ा विनय मुंबई से बीई कर रहा था, लेकिन प्रथम वर्ष में फेल होने के कारण पढ़ाई छोड़कर समाजसेवा की ओर मुड़ गया। तीन छोटे भाई निर्भय, अभय और अजय माता-पिता के साथ मुंबई में ही रहते हैं और पढ़-लिखकर विभिन्न कंपनियों में जॉब करते हैं। गांव में बड़े पिता रविशंकर कहते हैं कि एक बार उसे समझाया था कि वह राजनीति वगैरह के चक्कर में न पड़े, लेकिन नहीं माना।
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राजनीति में पिस रहा हमारा बेटा
ज्ञानपुर। विनय के परिवार का कहना है कि हमारा बेटा विनय राजनीति का शिकार हो रहा है। बांद्रा की इस भीड़ से उसका कोई लेना-देना नहीं है। अमर उजाला ने मुंबई में विनय के पिता जटाशंकर से संपर्क साधा तो उन्होंने फोन अपने दूसरे बेटे निर्भय को दे दिया। निर्भय ने कहा कि हमारे भाई को राजनीति का शिकार बना दिया गया है। उन्होंने जो पोस्ट की थी, उसमें 18 अप्रैल को पैदल निकलने की बात कही थी, जबकि यह भीड़ 15 को ही एकत्र हो गई। इससे उनका कोई लेना-देना नहीं है। बाद की पोस्ट को भी अगर देखा जाए तो वह पोस्ट शाम के चार बजे की गई है, जबकि बांद्रा में भीड़ सुबह 10 बजे से ही लगनी शुरू हो गई थी। उनके साथ राजनीति हो रही है।
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भदोही जिले के औराई क्षेत्र के हरिनारायणपुर गांव निवासी जटाशंकर दुबे के पहले पुत्र विनय की जिंदगी में कुछ कर गुजरने की हसरत उसके होश संभालते ही दिखने लगी थी। यही वजह थी कि महज 22 साल की उम्र में उसने 2012 में वाराणसी शहर उत्तरी से विधानसभा का चुनाव अजय राय के सामने एनसीपी के टिकट पर लड़ा। सफलता नहीं मिली तो पार्टी छोड़कर महाराष्ट्र में उत्तर भारतीय महापंचायत नाम से स्वयंसेवी संगठन बनाकर समाजसेवा में जुट गया। लेकिन, राजनीतिक से मोहभंग अब भी नहीं हुआ था। लिहाजा, महज सोशल मीडिया के फैन फॉलोवर्स के बूते पिछले लोकसभा चुनाव में मुंबई के ऐरोली सीट से निर्दलीय चुनाव मैदान में उतर गया, मगर फिर हार का सामना करना पड़ा। इस बीच मुंबई में उत्तर भारतीयों की अगुवाई करने की हसरत को लॉकडाउन में मुफीद मौका मिल गया और वह सोशल नेटवर्किंग साइट्स फेसबुक, ट्विटर, व्हाट्सएप आदि के जरिए लंबे-चौड़े पोस्ट कर मुंबई में उत्तर भारतीयों की नुमाइंदगी करने की राह पर चल पड़ा। इस बीच उसके एक पोस्ट ने सोशल मीडिया पर खलबली मचा कर रख दी। आरोप है कि उसकी पोस्ट के कारण ही बड़ी तादाद में उत्तर भारतीय लोग बांद्रा में एकत्र हुए और लॉकडाउन तार-तार हो गया।
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गाहे-बगाहे होता है गांव आगमन
औराई। हरिनारायण पुर गांव निवासी विनय दुबे और उसके परिवार का आगमन यहां कम ही हो पाता है। किसी शादी-विवाह या खास मौकों पर ही उसका परिवार यहां आता है। उसके पिता जटाशंकर मुंबई में ऑटो ड्राइवर हैं। यहां गांव में पैतृक मकान है, जिसमें उसके बड़े पिताजी रविशंकर दुबे अपनी पत्नी के साथ रहते हैं। विनय की पैदाइश से लेकर पढ़ाई-लिखाई तक सब कुछ मुंबई में ही हुआ। चार भाइयों में सबसे बड़ा विनय मुंबई से बीई कर रहा था, लेकिन प्रथम वर्ष में फेल होने के कारण पढ़ाई छोड़कर समाजसेवा की ओर मुड़ गया। तीन छोटे भाई निर्भय, अभय और अजय माता-पिता के साथ मुंबई में ही रहते हैं और पढ़-लिखकर विभिन्न कंपनियों में जॉब करते हैं। गांव में बड़े पिता रविशंकर कहते हैं कि एक बार उसे समझाया था कि वह राजनीति वगैरह के चक्कर में न पड़े, लेकिन नहीं माना।
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राजनीति में पिस रहा हमारा बेटा
ज्ञानपुर। विनय के परिवार का कहना है कि हमारा बेटा विनय राजनीति का शिकार हो रहा है। बांद्रा की इस भीड़ से उसका कोई लेना-देना नहीं है। अमर उजाला ने मुंबई में विनय के पिता जटाशंकर से संपर्क साधा तो उन्होंने फोन अपने दूसरे बेटे निर्भय को दे दिया। निर्भय ने कहा कि हमारे भाई को राजनीति का शिकार बना दिया गया है। उन्होंने जो पोस्ट की थी, उसमें 18 अप्रैल को पैदल निकलने की बात कही थी, जबकि यह भीड़ 15 को ही एकत्र हो गई। इससे उनका कोई लेना-देना नहीं है। बाद की पोस्ट को भी अगर देखा जाए तो वह पोस्ट शाम के चार बजे की गई है, जबकि बांद्रा में भीड़ सुबह 10 बजे से ही लगनी शुरू हो गई थी। उनके साथ राजनीति हो रही है।