शौक: मंदिरों में रूई की बत्तियां, बच्चों को मालाएं देती हैं उपहार; पूनम ने व्यस्त रहने का तलाशा तरीका
जेन जी की दुनिया में 76 वर्षीय पूनम देवी हर्ष ने खुद को व्यस्त रखने का अनूठा तरीका तलाशा है। वह रोज करीब 200 रूई की बत्तियां बनाती हैं। साथ ही फूलों की मालाएं और गजरे तैयार करती हैं। बत्तियां और मालाएं मंदिरों में भेजती हैं, जबकि गजरे और मालाएं बच्चों व अन्य लोगों को उपहार में देकर खुशियां बांटती हैं।
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उम्र के जिस पड़ाव पर अक्सर लोग आराम और दूसरों पर निर्भरता की ओर बढ़ने लगते हैं, वहां भदोही नगर की 76 वर्षीय पूनम देवी हर्ष आज भी अपने हाथों और हुनर को सक्रिय रखे हुए हैं। आधुनिक दौर में जब नई पीढ़ी स्मार्टफोन और अपनी व्यस्त दिनचर्या में उलझी है, तब पूनम देवी ने अकेलेपन और खाली समय को अपनी ताकत बना लिया है। वह रोज धार्मिक उपयोग की सामग्री तैयार करती हैं और इसी काम में उन्हें सुकून और खुशी मिलती है।
पूनम देवी प्रतिदिन करीब 200 रुई के दिए की बत्तियां तैयार करती हैं। इसके साथ ही घर के परिसर में लगे फूलों से देवी-देवताओं के लिए आकर्षक मालाएं और महिलाओं के लिए अलग-अलग डिजाइन के गजरे भी बनाती हैं। उनके इस काम के पीछे कमाई का कोई उद्देश्य नहीं है। हाथों से तैयार की गई बत्तियां और मालाएं वह मंदिरों में भेज देती हैं। वहीं बच्चों और परिचितों को भी फूलों के गजरे और मालाएं उपहार के रूप में देती हैं।
पूनम देवी बताती हैं कि उनके घर के परिसर में कई तरह के फूल लगे हैं। इन्हीं फूलों को तोड़कर वह अपनी जरूरत के अनुसार मालाएं और गजरे तैयार करती हैं। कभी वह साधारण माला बनाती हैं तो कभी अलग-अलग डिजाइन देकर उन्हें आकर्षक रूप देती हैं। बालों में लगाने वाले गजरों को भी वह अपनी पसंद के अनुसार तैयार करती हैं।
उनका कहना है कि उम्र बढ़ने के साथ शरीर की सक्रियता भले कम हो जाए, लेकिन मन को व्यस्त रखना बेहद जरूरी है। आधुनिक पीढ़ी के पास अपनी व्यस्तता के कारण बुजुर्गों के साथ पहले जैसा समय बिताने का अवसर नहीं है। ऐसे में बुजुर्गों को भी खुद को व्यस्त रखने के लिए अपनी रुचि का काम तलाशना चाहिए।
पूनम देवी के लिए रुई की बत्तियां बनाना और फूलों को सजाना सिर्फ समय बिताने का जरिया नहीं, बल्कि मन की खुशी का माध्यम है। वह कहती हैं कि इस काम से दिनभर व्यस्त रहती हैं और मन को शांति मिलती है। मंदिरों में सामग्री भेजने से धार्मिक कार्यों में सहयोग का संतोष मिलता है, जबकि बच्चों को उपहार देने में उन्हें सबसे ज्यादा खुशी मिलती है। 76 की उम्र में उनकी सक्रिय दिनचर्या बुजुर्गों के लिए प्रेरणा बन गई है।