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अबोध बेटे के हत्यारे पिता को आजीवन कारावास
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ज्ञानपुर। अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश फास्ट ट्रैक द्वितीय की अदालत ने बेटे के हत्यारे पिता को आजीवन कारावास की सजा सुनाई है। तीन साल पहले गोपीगंज थानाक्षेत्र के बरजी गांव में हुई घटना में कोर्ट ने यह फैसला सुनाया है।
दो अगस्त 2016 को गंगेश्वर नाथ उपाध्याय निवासी बरजी थाना गोपीगंज अपने बेटे शिवम को सुबह स्कूल ले गया। शिवम के नहीं लौटने पर काफी खोजबीन के बाद घर वालों ने थाने में गुमशुदगी का केस दर्ज कराया। दूसरे दिन गांव वालों ने बताया कि गांव के एक कुएं में लाश दिखाई दे रही है, जिसे निकालने पर पता चला कि वह शिवम का शव है। उसके बाद पुलिस ने हत्या का मुकदमा दर्ज कर साक्ष्य का संकलन किया, जिसमें पाया गया कि उसका पिता गंगेश्वर नाथ ही स्कूल ले गया था और उसे एक घंटे बाद ही वापस ले आया। रास्ते में उसकी फोटो और आईडी लेने के बहाने उसे गांव के ही एक सुनसान कुएं में जिंदा फेंक दिया था, जिससे उसकी मृत्यु हो गई थी।
मामले में कोई प्रत्यक्षदर्शी साक्ष्य नहीं था। हत्या करते किसी ने अपनी आंखों से नहीं देखा था, लेकिन परिस्थितजन्य साक्ष्यों से संदेह से परे यह बात साबित की गई कि उस बच्चे का हत्यारा उसका पिता ही था। इस मामले में घटना के दो दिन पहले उस बच्चे ने पुलिस के सामने यह बात बताई थी कि उसकी माता को उसका पिता मारता पीटता है और खाना पीना नहीं देता है। इसी बात को मन में ठान कर उसके पिता ने उस बालक को स्कूल के बहाने ले जाकर रास्ते में ही कुएं में धकेल दिया।
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बचाव पक्ष के अधिवक्ता ने यह तर्क दिया कि एक पिता अपने पुत्र की हत्या नहीं कर सकता। अभियोजन पक्ष की तरफ से शासकीय अधिवक्ता पंकज तिवारी ने तर्क दिया यह सनातन से चला आ रहा है कि आत्म संतुष्टि के लिए लोग अपने पुत्र की भी हत्या कर देते हैं। हिरण्यकश्यप ने प्रह्लाद को इसीलिए मारने की कोशिश की थी, क्योंकि उसकी सत्ता को स्वीकार नहीं करता। उस समय भगवान ने उसे बचाया, लेकिन कलयुग में भगवान नहीं आते। इसलिए बच्चा मर गया। न्यायाधीश रामकरन यादव की अदालत ने दोनों पक्षों के तर्क सुनने के पश्चात हत्यारे पिता को दोषी पाते हुए आजीवन कारावास और 10 हजार के अर्थदंड की सजा सुनाई।
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दो अगस्त 2016 को गंगेश्वर नाथ उपाध्याय निवासी बरजी थाना गोपीगंज अपने बेटे शिवम को सुबह स्कूल ले गया। शिवम के नहीं लौटने पर काफी खोजबीन के बाद घर वालों ने थाने में गुमशुदगी का केस दर्ज कराया। दूसरे दिन गांव वालों ने बताया कि गांव के एक कुएं में लाश दिखाई दे रही है, जिसे निकालने पर पता चला कि वह शिवम का शव है। उसके बाद पुलिस ने हत्या का मुकदमा दर्ज कर साक्ष्य का संकलन किया, जिसमें पाया गया कि उसका पिता गंगेश्वर नाथ ही स्कूल ले गया था और उसे एक घंटे बाद ही वापस ले आया। रास्ते में उसकी फोटो और आईडी लेने के बहाने उसे गांव के ही एक सुनसान कुएं में जिंदा फेंक दिया था, जिससे उसकी मृत्यु हो गई थी।
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मामले में कोई प्रत्यक्षदर्शी साक्ष्य नहीं था। हत्या करते किसी ने अपनी आंखों से नहीं देखा था, लेकिन परिस्थितजन्य साक्ष्यों से संदेह से परे यह बात साबित की गई कि उस बच्चे का हत्यारा उसका पिता ही था। इस मामले में घटना के दो दिन पहले उस बच्चे ने पुलिस के सामने यह बात बताई थी कि उसकी माता को उसका पिता मारता पीटता है और खाना पीना नहीं देता है। इसी बात को मन में ठान कर उसके पिता ने उस बालक को स्कूल के बहाने ले जाकर रास्ते में ही कुएं में धकेल दिया।
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बचाव पक्ष के अधिवक्ता ने यह तर्क दिया कि एक पिता अपने पुत्र की हत्या नहीं कर सकता। अभियोजन पक्ष की तरफ से शासकीय अधिवक्ता पंकज तिवारी ने तर्क दिया यह सनातन से चला आ रहा है कि आत्म संतुष्टि के लिए लोग अपने पुत्र की भी हत्या कर देते हैं। हिरण्यकश्यप ने प्रह्लाद को इसीलिए मारने की कोशिश की थी, क्योंकि उसकी सत्ता को स्वीकार नहीं करता। उस समय भगवान ने उसे बचाया, लेकिन कलयुग में भगवान नहीं आते। इसलिए बच्चा मर गया। न्यायाधीश रामकरन यादव की अदालत ने दोनों पक्षों के तर्क सुनने के पश्चात हत्यारे पिता को दोषी पाते हुए आजीवन कारावास और 10 हजार के अर्थदंड की सजा सुनाई।