भगवान अपने प्रभाव से नहीं वरन अपने स्वभाव से पूज्य होते हैं। श्रीकृष्ण का प्रभाव तो जग विदित है। वे कभी असुरों का विनाश क्षण मात्र में कर देते हैं तो कभी विराट रूप स्वरूप में दर्शन देकर अर्जुन का मोह भंग करते हैं। ये बातें पंडित प्रमोद शास्त्री ने शनिवार को रैमलपुर में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा के अंतिम दिन कहीं। उन्होंने बताया कि श्रीकृष्ण का स्वभाव तो और भी विचित्र हैं, वे भक्तों का स्वयं पूजन करते हैं। उन्होंने बताया कि सुदामा जी की दो मुट्ठी चूड़े (चावल) के बदले दो लोक की संपत्ति प्रदान करते हैं।
उन्होंने कहा कि संसार में सबसे कुछ न कुछ सीखने को मिलता है। अतः सबको अपने से श्रेष्ठ समझो। नव योगेश्वरों की कथा में भक्ति, ज्ञान, वैराग्य की व्याख्या और अंत में परीक्षित के मोक्ष की कथा हुई। इस दौरान संतोष पाठक, विनोद, प्रमोद, नरेंद्र, शैलेन्द्र, विरेन्द्र पाठक, रमाशंकर दूबे, सोमेश्वर दूबे, नारायण दास, लोकनाथ मिश्र आदि मौजूद रहे। संवाद