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Bhadohi News: जिले में ऑटिज्म काउंसिलिंग की नहीं हैं सुविधा, उच्च संस्थान रेफर होते हैं मरीज

Mon, 28 Sep 2026 01:19 AM IST
Varanasi Bureau वाराणसी ब्यूरो
Updated Mon, 28 Sep 2026 01:19 AM IST
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There are no facilities for autism counseling in the district; patients are referred to higher-level institutions.
ज्ञानपुर। जनपद में ऑटिज्म से पीड़ित किशोरों के लिए काउंसिलिंग की कोई सुविधा नहीं है। जिला अस्पताल से लेकर सीएचसी तक काउंसिलर की तैनाती की गई है, लेकिन यहां थेरेपी सेंटर नहीं हैं। इसके अलावा डीईआईसी सेंटर भी नहीं है। स्पीच थेरेपी, बिहेवियर थेरेपी और विशेष काउंसिलिंग के लिए मरीज को वाराणसी व प्रयागराज सहित अन्य जिलों में रेफर करना पड़ता है।
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बदलती जीवन शैली के बीच जिला मानसिक विभाग की ओपीडी में किशोर, किशोरियों की संख्या में बढ़ोतरी हुई है। हर महीने 50 के करीब ओपीडी हो रही है। इसमें ज्यादातर मानसिक विकृति से पीड़ित मरीज हैं। इसमें ऑटिज्म के मरीज भी पहुंच रहे हैं। ऐसे मरीजों की जांच और दवा की सुविधा है। किशोरियों के लिए अलग से काउंसिलिंग की व्यवस्था नहीं है। एक ही पटल पर सभी मरीजों की काउंसिलिंग की जाती है। डीईआईसी न होने से ऑटिज्म बीमारी से पीड़ित व बच्चे किशोर को वाराणसी व प्रयागराज रेफर किया जाता है। मनोचिकित्सक डॉ. अभिनव पांडेय ने बताया कि ऑटिज्म बीमारी से पीड़ित किशोर व किशोरियों की दिमागी क्षमता शून्य हो जाती हैं। जो आगे चलकर गंभीर बीमारी का रूप ले लेती है। बीमारी के प्रमुख लक्षण हाथ, पैर बार-बार पटकना है। इसका उपचार स्पेशल एजुकेटर करते हैं। मानसिक स्वास्थ्य विभाग में आने वाले मरीजों में किशोरों की संख्या लगातार ध्यान खींच रही है। पढ़ाई का दबाव, परीक्षा, पारिवारिक परिस्थितियां, व्यवहार में बदलाव और अन्य कारणों से किशोर मानसिक समस्याओं से जूझ रहे हैं। बच्चों में विकास संबंधी समस्या, व्यवहार में बदलाव अथवा अन्य मानसिक स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों की पहचान और शुरुआती हस्तक्षेप के लिए डीईआईसी जैसी सुविधा उपयोगी होती है। जिले में ऐसी सुविधा नहीं होने से अभिभावकों को बच्चों को लेकर दूसरे शहरों का रुख करना पड़ता है। दूसरे जिलों में जाने से दवा के अलावा किराये में भी धनराशि खर्च हो जाती है। यदि रिजर्व वाहन से जा रहे हैं तो 2000 रुपये के करीब खर्च होते हैं। जिला अस्पताल के मनो चिकित्सक डॉ. अभिनव पांडेय का कहना है कि ऑटिज्म से ग्रस्त बच्चे सोशल नहीं हो पाते है, जिन्हें दिव्यांग नहीं कहा जा सकता है। ऐसे बच्चों की पहचान कर उनका उपचार किया जाता है। अब तक ऑटिज्म के मुख्य कारण स्पष्ट नहीं हो पाए हैं। बचपन से ही मानसिक बीमारी के लक्षण दिखने लगते हैं। बस अभिभावक को सजग होने की जरूरत है। सीएमओ डॉ. एसके चक का कहना है कि जिले में आठ काउंसिलर और दो मनोचिकित्सक डॉक्टर की तैनाती है। जहां काउंसिलिंग करके बेहतर उपचार किए जाते हैं। डीईआईसी की विशेष सुविधा नहीं है। इसके लिए उच्चाधिकारी से बातचीत की जाएगी।
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