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17 साल बाद भी अधूरा सेज का सपना
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चौरी के कंधिया फाटक के पास सेज की जमीन पर रोपी गई धान की फसल।
- फोटो : BHADOHI
ज्ञानपुर/चौरी। कालीन उद्योग के विकास को लेकर करोड़ों के विशेष आर्थिक क्षेत्र (सेज) का सपना 17 साल बाद भी पूरा नहीं हो सका। प्रशासन से लेकर शासन तक ने इसे भुला दिया है। किसानों से 208 एकड़ जमीन का अधिग्रहण करने के बाद भी सेज की परिकल्पना राजनीति की भेंट चढ़ गई। सेज की जमीनों पर अब अवैध कब्जा हो गया है। आज भी जमीन देने वाले 710 किसानों को अभी तक मुआवजा नहीं मिल सका है।
भदोही में कालीन उद्योग के विकास के लिए वर्ष 2003 में वाराणसी-भदोही मार्ग पर स्थित कंधिया के पास स्पेशल इकोनामिक जोन स्थापित करने के लिए 208 हेक्टेयर भूमि अधिगृहीत की गई थी। अधिग्रहण में कछुआ बोझ, कंधिया, जोल्हापुर, धनापुर आदि गांव के 1800 से अधिक किसान प्रभावित हुए थे। इसमें से 1023 किसानों को बतौर मुआवजा 9 करोड़ 13 लाख 33 हजार 315 रुपये का भुगतान हो गया था, जबकि 710 किसानों के 7 करोड़ 31 लाख 19 हजार 933 रुपये का भुगतान 17 साल बाद भी नहीं हो सका है। सेज के निर्माण की जिम्मेदारी उत्तर प्रदेश राज्य औद्योगिक विकास निगम लिमिटेड को सौंपी गई थी। आरोप है कि किसानों की बेशकीमती भूमि कौड़ियों के दाम अधिगृहीत कर ली गई थी। अधिग्रहण की कार्रवाई शुरू होने से लेकर अब तक किसानों ने हार नहीं मानी। उनकी लड़ाई चलती रही। कालीन कारोबारी ऋषि दुबे और जावेद अंसारी ने कहा सेज का निर्माण होना निर्यातकों को काफी सहूलियत मिलती। जनप्रतिनिधियों को चाहिए कि इस पर पहल कराएं। किसान रामचंद्र, ओमकारनाथ पटेल, देवनाथ ने बताया कि उपजाऊ जमीन को कोई एक हजार रुपये बिस्वे में कैसे देता। आज अधिग्रहित जमीनों में खेती होती है।
प्रशासन संग जनप्रतिनिधि भी जिम्मेदार
चौरी। जिले का दुर्भाग्य ही कहा जाएगा की 17 साल का लंबा समय गुजरने के बाद भी स्पेशल इकोनामिक जोन की स्थापना नहीं हो सकी। बसपा, सपा ने पांच-पांच साल जबकि अब भाजपा की सरकार भी तीन साल से अधिक का कार्यकाल पूर्ण कर चुकी लेकिन सांसद से लेकर विधायक तक ने सेज का मामला संसद से लेकर विधानसभा तक में नहीं रखा।
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अधिग्रहीत जमीन पर होने लगा कब्जा
चौरी। विशेष आर्थिक क्षेत्र के लिए अधिग्रहीत जमीन पर फिर से कब्जा भी होने लगा है। इससे माना जा रहा है कि प्रशासन के लिए आने वाले समय में चुनौतियां और बढ़ेंगी। अगर भविष्य में सेज का मसला सुलझा तो फिर अधिग्रहीत जमीन को कब्जामुक्त करने के लिए शासन-प्रशासन को ऊर्जा व्यय करनी होगी। कहा जा रहा है कि समय रहते इस पर ध्यान देना चाहिए।
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भदोही में कालीन उद्योग के विकास के लिए वर्ष 2003 में वाराणसी-भदोही मार्ग पर स्थित कंधिया के पास स्पेशल इकोनामिक जोन स्थापित करने के लिए 208 हेक्टेयर भूमि अधिगृहीत की गई थी। अधिग्रहण में कछुआ बोझ, कंधिया, जोल्हापुर, धनापुर आदि गांव के 1800 से अधिक किसान प्रभावित हुए थे। इसमें से 1023 किसानों को बतौर मुआवजा 9 करोड़ 13 लाख 33 हजार 315 रुपये का भुगतान हो गया था, जबकि 710 किसानों के 7 करोड़ 31 लाख 19 हजार 933 रुपये का भुगतान 17 साल बाद भी नहीं हो सका है। सेज के निर्माण की जिम्मेदारी उत्तर प्रदेश राज्य औद्योगिक विकास निगम लिमिटेड को सौंपी गई थी। आरोप है कि किसानों की बेशकीमती भूमि कौड़ियों के दाम अधिगृहीत कर ली गई थी। अधिग्रहण की कार्रवाई शुरू होने से लेकर अब तक किसानों ने हार नहीं मानी। उनकी लड़ाई चलती रही। कालीन कारोबारी ऋषि दुबे और जावेद अंसारी ने कहा सेज का निर्माण होना निर्यातकों को काफी सहूलियत मिलती। जनप्रतिनिधियों को चाहिए कि इस पर पहल कराएं। किसान रामचंद्र, ओमकारनाथ पटेल, देवनाथ ने बताया कि उपजाऊ जमीन को कोई एक हजार रुपये बिस्वे में कैसे देता। आज अधिग्रहित जमीनों में खेती होती है।
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प्रशासन संग जनप्रतिनिधि भी जिम्मेदार
चौरी। जिले का दुर्भाग्य ही कहा जाएगा की 17 साल का लंबा समय गुजरने के बाद भी स्पेशल इकोनामिक जोन की स्थापना नहीं हो सकी। बसपा, सपा ने पांच-पांच साल जबकि अब भाजपा की सरकार भी तीन साल से अधिक का कार्यकाल पूर्ण कर चुकी लेकिन सांसद से लेकर विधायक तक ने सेज का मामला संसद से लेकर विधानसभा तक में नहीं रखा।
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अधिग्रहीत जमीन पर होने लगा कब्जा
चौरी। विशेष आर्थिक क्षेत्र के लिए अधिग्रहीत जमीन पर फिर से कब्जा भी होने लगा है। इससे माना जा रहा है कि प्रशासन के लिए आने वाले समय में चुनौतियां और बढ़ेंगी। अगर भविष्य में सेज का मसला सुलझा तो फिर अधिग्रहीत जमीन को कब्जामुक्त करने के लिए शासन-प्रशासन को ऊर्जा व्यय करनी होगी। कहा जा रहा है कि समय रहते इस पर ध्यान देना चाहिए।