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तीन दशक बाद कांग्रेस को संजीवनी की आस!
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ज्ञानपुर। इंदिरा गांधी की हत्या के बाद सहानुभूति लहर में 1984 में जीत दर्ज करने के बाद कांग्रेस के ‘हाथ’ से जीत ऐसी फिसली कि तीन दशक से जनता का साथ नहीं मिला। 1989 में बोफोर्स तोप का मुद्दा सामने आने के बाद हुए चुनाव से यहां की जनता ने हाथ का साथ छोड़ा, तभी से कांग्रेस जिले में हाशिए पर चली गई। 2019 के चुनाव में खोई जमीन की तलाश में पार्टी ने आजमगढ़ के पूर्व सांसद रमाकांत यादव पर दांव खेला है। पार्टी को रमाकांत से संजीवनी की उम्मीद है। वह क्या गुल खिलाएंगे यह तो आने वाला समय बताएगा, लेकिन सियासी सरगर्मी तेज हो गई है।
आजादी के बाद से भदोही-मिर्जापुर संसदीय सीट पर कांग्रेस का दबदबा रहा। प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या से उपजी सहानुभूति की लहर में 1984 में उमाकांत मिश्र कांग्रेस के टिकट पर चुनाव जीते। वर्ष 1989 मे बोफोर्स तोप का मामला सामने आने के बाद नए राजनीतिक समीकरण बने और जनता दल से यूसुफ बेग ने जीत दर्ज की। उसके बाद से करीब तीन दशक गुजर गए, लेकिन कांग्रेस की वापसी नहीं हो सकी।
1991 में राम मंदिर लहर में भाजपा ने खाता खोला। बलिया से आए वीरेंद्र सिंह ने जीत दर्ज की। 1996 में सपा से फूलन देवी, 1998 में भाजपा से वीरेंद्र सिंह और 1999 में फिर फूलन देवी ने जीत दर्ज की। 2001 में फूलन की हत्या के बाद हुए उपचुनाव में सपा से 2002 में रामरति बिंद चुनाव जीते, 2004 में बसपा से नरेंद्र कुशवाहा ने जीत हासिल की, लेकिन संसद में पैसे लेकर सवाल पूछने के मामले में उनकी सदस्यता चली गई। 2007 के उपचुनाव में बसपा से ही रमेश दूबे ने जीत दर्ज की।
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2009 में नए परिसीमन के बाद भदोही संसदीय सीट पर बसपा के गोरखनाथ पांडेय ने बाजी मारी, लेकिन 2014 में मोदी लहर में वीरेंद्र सिंह ने फिर मैदान मार लिया। खास बात यह रही कि तीन दशक में हुए करीब आठ चुनावों में 1989 में रनरअप तो 1991 राजेशपति ने कुछ हद तक पार्टी की साख बचाई, लेकिन उसके बाद कांग्रेस की दशा बद से बदतर होती गई। उसका वोट प्रतिशत लगातार गिरता गया। यहां तक कि उसके प्रत्याशी जमानत तक भी नहीं बचा सके। कभी डेढ़ फीसदी तो कभी ढाई फीसदी ही वोट प्रतिशत रहा। मुलायम सिंह यादव के खिलाफ 2014 में चुनाव लड़कर अंतर्राष्ट्रीय मीडिया के लिए सुर्खियां बने आजमगढ़ के पूर्व सांसद रमाकांत यादव को 2019 के चुनाव में टिकट मिलने से कार्यकर्ताओं को संजीवनी मिल गई है।
आजादी के बाद से भदोही-मिर्जापुर संसदीय सीट पर कांग्रेस का दबदबा रहा। प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या से उपजी सहानुभूति की लहर में 1984 में उमाकांत मिश्र कांग्रेस के टिकट पर चुनाव जीते। वर्ष 1989 मे बोफोर्स तोप का मामला सामने आने के बाद नए राजनीतिक समीकरण बने और जनता दल से यूसुफ बेग ने जीत दर्ज की। उसके बाद से करीब तीन दशक गुजर गए, लेकिन कांग्रेस की वापसी नहीं हो सकी।
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1991 में राम मंदिर लहर में भाजपा ने खाता खोला। बलिया से आए वीरेंद्र सिंह ने जीत दर्ज की। 1996 में सपा से फूलन देवी, 1998 में भाजपा से वीरेंद्र सिंह और 1999 में फिर फूलन देवी ने जीत दर्ज की। 2001 में फूलन की हत्या के बाद हुए उपचुनाव में सपा से 2002 में रामरति बिंद चुनाव जीते, 2004 में बसपा से नरेंद्र कुशवाहा ने जीत हासिल की, लेकिन संसद में पैसे लेकर सवाल पूछने के मामले में उनकी सदस्यता चली गई। 2007 के उपचुनाव में बसपा से ही रमेश दूबे ने जीत दर्ज की।
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2009 में नए परिसीमन के बाद भदोही संसदीय सीट पर बसपा के गोरखनाथ पांडेय ने बाजी मारी, लेकिन 2014 में मोदी लहर में वीरेंद्र सिंह ने फिर मैदान मार लिया। खास बात यह रही कि तीन दशक में हुए करीब आठ चुनावों में 1989 में रनरअप तो 1991 राजेशपति ने कुछ हद तक पार्टी की साख बचाई, लेकिन उसके बाद कांग्रेस की दशा बद से बदतर होती गई। उसका वोट प्रतिशत लगातार गिरता गया। यहां तक कि उसके प्रत्याशी जमानत तक भी नहीं बचा सके। कभी डेढ़ फीसदी तो कभी ढाई फीसदी ही वोट प्रतिशत रहा। मुलायम सिंह यादव के खिलाफ 2014 में चुनाव लड़कर अंतर्राष्ट्रीय मीडिया के लिए सुर्खियां बने आजमगढ़ के पूर्व सांसद रमाकांत यादव को 2019 के चुनाव में टिकट मिलने से कार्यकर्ताओं को संजीवनी मिल गई है।