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साढ़े तीन करोड़ बढ़ी लागत, अस्पताल अधूरा
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ज्ञानपुर। सभी को बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं मुहैया कराने के लिए जिला मुख्यालय में निर्माणाधीन 100 शैया का अस्पताल कार्यदायी संस्थाओं की मनमानी से एक दशक बाद भी पूरा नहीं हो सका है। 10 वर्षों में लागत करीब साढ़े तीन करोड़ बढ़ गई, लेकिन परियोजना अब भी अधूरी ही है। इससे सरकार को करीब साढ़े तीन करोड़ राजस्व की चपत लग चुकी है।
बसपा सरकार में वर्ष 2008-09 में जिला मुख्यालय के सामने 14 करोड़ की लागत से 100 शैया वाले जिला अस्पताल भवन का निर्माण शुरू हुआ। कार्यदायी संस्था उत्तर प्रदेश राजकीय निर्माण निगम को भवन बनाने की जिम्मेदारी दी गई थी। 2010 के बाद आधा अधूरा निर्माण कार्य करा कर कार्यदायी संस्था ने काम बंद कर दिया। कार्यदायी संस्थाओं के अधिकारियों और ठेकेदारों की साठगांठ से सरकारी पैसे की भी जमकर लूट की गई। उसके बाद 2018 तक कार्यदायी संस्था ने ठेकेदार बदले, नए प्रपोजल से लागत भी बढ़ गई पर परियोजना अब तक पूरी नहीं हो सकी। 14 करोड़ से बनने वाले अस्पताल की लागत अब 17.50 करोड़ तक पहुंच चुकी है, लेकिन यह प्रशासन को कब हैंडओवर होगा और आम लोगों को सुविधाएं कब मिलेंगी यह अब भी एक प्रश्न ही बना हुआ है। जब अस्पताल स्वीकृत हुआ तो जिले में बदहाल स्वास्थ्य सेवाओं को संजीवनी मिलने की उम्मीद जगी, लेकिन लापरवाही के चलते योजना की लागत बढ़ती चली गई। इसमें आर्थिक गबन भी सामने आया है। जिला प्रशासन ने इसकी जांच भी शुरू करवा दी है।
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बसपा सरकार में वर्ष 2008-09 में जिला मुख्यालय के सामने 14 करोड़ की लागत से 100 शैया वाले जिला अस्पताल भवन का निर्माण शुरू हुआ। कार्यदायी संस्था उत्तर प्रदेश राजकीय निर्माण निगम को भवन बनाने की जिम्मेदारी दी गई थी। 2010 के बाद आधा अधूरा निर्माण कार्य करा कर कार्यदायी संस्था ने काम बंद कर दिया। कार्यदायी संस्थाओं के अधिकारियों और ठेकेदारों की साठगांठ से सरकारी पैसे की भी जमकर लूट की गई। उसके बाद 2018 तक कार्यदायी संस्था ने ठेकेदार बदले, नए प्रपोजल से लागत भी बढ़ गई पर परियोजना अब तक पूरी नहीं हो सकी। 14 करोड़ से बनने वाले अस्पताल की लागत अब 17.50 करोड़ तक पहुंच चुकी है, लेकिन यह प्रशासन को कब हैंडओवर होगा और आम लोगों को सुविधाएं कब मिलेंगी यह अब भी एक प्रश्न ही बना हुआ है। जब अस्पताल स्वीकृत हुआ तो जिले में बदहाल स्वास्थ्य सेवाओं को संजीवनी मिलने की उम्मीद जगी, लेकिन लापरवाही के चलते योजना की लागत बढ़ती चली गई। इसमें आर्थिक गबन भी सामने आया है। जिला प्रशासन ने इसकी जांच भी शुरू करवा दी है।
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