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Basti News: अस्पताल में सिर्फ इमरजेंसी सेवा... नहीं मिलते विशेषज्ञ डॉक्टर
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जिला अस्पताल की इमरजेंसी वार्ड में भर्ती मरीज- फोटो- संवाद
-ईसीजी- एक्सरे की भी सुविधा मयस्सर नहीं, दुर्घटना होने या अटैक आने पर मिल रही सिर्फ इमरजेंसी सेवा, बाकी भगवान भरोसे
- रात में बुलाने पर भी नहीं पहुंचते विशेषज्ञ चिकित्सक, मरीजों की बढ़ रही परेशानी
संवाद न्यूज एजेंसी
बस्ती। जिले में सरकारी चिकित्सा व्यवस्था धड़ाम हो गई है। मार्ग दुर्घटना में गंभीर रूप से घायल, हार्ट अटैक व ब्रेन स्ट्रोक के मरीजों के लिए इमरजेंसी में सूई, दवाई, मरहम, पट्टी से आगे कोई सुविधा नहीं है। ईसीजी, एक्स-रे और खून जांच तक की सुविधा मयस्सर नहीं हो पा रही है। रात में दुश्वारियां और बढ़ जाती हैं। इमरजेंसी कॉल पर विशेषज्ञ चिकित्सक भी नहीं पहुंच रहे हैं। नतीजतन प्राथमिक उपचार के बाद ईएमओ ऐसे मरीजों का इलाज करने से हाथ खड़े कर दे रहे हैं। वह रेफर कागज बनाकर फुर्सत ले रहे हैं।
जिला अस्पताल में ट्राॅमा सेंटर संचालित है, लेकिन यह कहने भर को है। असलियत में यहां सामान्य इमरजेंसी से अतिरिक्त कोई सुविधा नहीं है। ड्रेसिंग के साथ सूई, दवाई तत्काल की जाती है। यदि मरीज की स्थिति नियंत्रण में नहीं है तो इससे आगे का उपचार नहीं हो पाता है। यहां तक कि रात में ईसीजी, खून की जांच, एक्स-रे, माइनर ऑपरेशन, सिटी स्कैन भी नहीं हो पा रहा है। ड्यूटी पर मौजूद ईएमओ गंभीर मरीज की कुछ देर तक देखभाल के बाद तुरंत बाहर ले जाने की सलाह देना शुरू कर देते हैं।
तीमारदार भी विवशता में सहमति जताकर अपने मरीज को रेफर करा ले रहे हैं। कमोबेश यही स्थिति मेडिकल कॉलेज के ओपेक चिकित्सालय कैली में भी है। यहां इमरजेंसी में ईसीजी की सुविधा है। मगर रात में एक्स-रे, सिटी स्कैन आदि जांच नहीं हो पा रही है। गंभीर मरीज यहां भी भर्ती नहीं किए जा रहे हैं। इमरजेंसी में तैनात चिकित्सक हालत का अंदाजा पाते ही रेफर कर दे रहे हैं।
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ट्रॉमा सेंटर में प्रतिदिन पहुंच रहे 15 से 20 मरीज
जिला अस्पताल के ट्राॅमा सेंटर में प्रतिदिन 15 से 20 मरीज पहुंच रहे हैं। इसमें अमूमन बुखार, उल्टी-दस्त, दुर्घटना में घायल मरीज ही शामिल रहते हैं। जिनकी हालत सामान्य ढंग के इलाज सुधरने लायक होती है उन्हें तो भर्ती कर लिया जाता है, लेकिन गंभीर मरीजों को प्राथमिक उपचार के बाद रेफर करने के सिवाय कोई और विकल्प नहीं रहता है। प्रतिदिन यहां से चार से पांच मरीज रेफर हो रहे हैं।
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इमरजेंसी कॉल पर नहीं पहुंचते हैं विशेषज्ञ डॉक्टर
रात के समय इमरजेंसी में आने वाले मरीजों के लिए विशेषज्ञ डॉक्टर आसानी से नहीं मिलते हैं। मरीज की बीएसटी पर ईएमओ द्वारा विशेषज्ञ चिकित्सक की डिमांड दर्ज किए जाने के बाद भी कोई पहुंचता नहीं है। पहले तो इमरजेंसी कॉल लिखी नहीं जाती है, लेकिन यदि तीमारदारों के दबाव में रात में कॉल होती भी है तो विशेषज्ञ चिकित्सक नहीं पहुंचते हैं। हाई प्रोफाइल मामला होने पर ही इमरजेंसी कॉल पर विशेषज्ञ चिकित्सक आते हैं।
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आज तक नहीं शुरू हो पाई एमआरआई जांच
जिला अस्पताल या ओपेक चिकित्सालय कैली में अभी तक एमआरआई जांच की सुविधा सुलभ नहीं हो सकी है। दरअसल उस लेबल के विशेषज्ञों की तैनाती न होने से भी इस तरह की आधुनिक जांच की व्यवस्था नहीं बन पा रही है। जिले के इन दोनों प्रमुख अस्पतालों में न्यूरोलॉजिस्ट और कार्डियोलॉजिस्ट नहीं हैं। ऐसे में एमआरआई, ईकोे, एंजियोग्राफी जैसी जांच की व्यवस्था नहीं है।
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केस- एक
मेरे पिता मार्ग दुर्घटना में घायल हो गए थे। उन्हें लेकर जिला अस्पताल के ट्राॅमा सेंटर में पहुंचा गया। ड्रेसिंग कक्ष में मरहम, पट्टी करने के साथ कुछ इंजेक्शन दिए गए। वह अचेतावस्था में थे। बावजूद इसके किसी तरह की जांच नहीं हुई। कुछ देर बाद उन्हें लखनऊ रेफर कर दिया। बाद में लखनऊ के लोहिया में भी आईसीयू वार्ड में शिफ्ट न होने के कारण उनकी मौत हो गई।
-हरिओम, नगर बाजार।
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केस- दो
मेरी माता जी को अचानक पसीना होने लगा। कुछ देर बाद वह मूर्छित अवस्था में चली गईं। उन्हें लेकर जिला अस्पताल पहुंचे। वहां प्राथमिक उपचार करने के साथ चिकित्सक ने हार्ट अटैक की समस्या बताई। उन्हें रेफर कर दिया गया। किसी तरह हम लोग लखनऊ लोहिया हॉस्पिटल में ले गए। वहां भर्ती कराने के सप्ताह भर बाद वह ठीक हुई।
-शशांक, गांधीनगर।
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- रात में बुलाने पर भी नहीं पहुंचते विशेषज्ञ चिकित्सक, मरीजों की बढ़ रही परेशानी
संवाद न्यूज एजेंसी
बस्ती। जिले में सरकारी चिकित्सा व्यवस्था धड़ाम हो गई है। मार्ग दुर्घटना में गंभीर रूप से घायल, हार्ट अटैक व ब्रेन स्ट्रोक के मरीजों के लिए इमरजेंसी में सूई, दवाई, मरहम, पट्टी से आगे कोई सुविधा नहीं है। ईसीजी, एक्स-रे और खून जांच तक की सुविधा मयस्सर नहीं हो पा रही है। रात में दुश्वारियां और बढ़ जाती हैं। इमरजेंसी कॉल पर विशेषज्ञ चिकित्सक भी नहीं पहुंच रहे हैं। नतीजतन प्राथमिक उपचार के बाद ईएमओ ऐसे मरीजों का इलाज करने से हाथ खड़े कर दे रहे हैं। वह रेफर कागज बनाकर फुर्सत ले रहे हैं।
जिला अस्पताल में ट्राॅमा सेंटर संचालित है, लेकिन यह कहने भर को है। असलियत में यहां सामान्य इमरजेंसी से अतिरिक्त कोई सुविधा नहीं है। ड्रेसिंग के साथ सूई, दवाई तत्काल की जाती है। यदि मरीज की स्थिति नियंत्रण में नहीं है तो इससे आगे का उपचार नहीं हो पाता है। यहां तक कि रात में ईसीजी, खून की जांच, एक्स-रे, माइनर ऑपरेशन, सिटी स्कैन भी नहीं हो पा रहा है। ड्यूटी पर मौजूद ईएमओ गंभीर मरीज की कुछ देर तक देखभाल के बाद तुरंत बाहर ले जाने की सलाह देना शुरू कर देते हैं।
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तीमारदार भी विवशता में सहमति जताकर अपने मरीज को रेफर करा ले रहे हैं। कमोबेश यही स्थिति मेडिकल कॉलेज के ओपेक चिकित्सालय कैली में भी है। यहां इमरजेंसी में ईसीजी की सुविधा है। मगर रात में एक्स-रे, सिटी स्कैन आदि जांच नहीं हो पा रही है। गंभीर मरीज यहां भी भर्ती नहीं किए जा रहे हैं। इमरजेंसी में तैनात चिकित्सक हालत का अंदाजा पाते ही रेफर कर दे रहे हैं।
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ट्रॉमा सेंटर में प्रतिदिन पहुंच रहे 15 से 20 मरीज
जिला अस्पताल के ट्राॅमा सेंटर में प्रतिदिन 15 से 20 मरीज पहुंच रहे हैं। इसमें अमूमन बुखार, उल्टी-दस्त, दुर्घटना में घायल मरीज ही शामिल रहते हैं। जिनकी हालत सामान्य ढंग के इलाज सुधरने लायक होती है उन्हें तो भर्ती कर लिया जाता है, लेकिन गंभीर मरीजों को प्राथमिक उपचार के बाद रेफर करने के सिवाय कोई और विकल्प नहीं रहता है। प्रतिदिन यहां से चार से पांच मरीज रेफर हो रहे हैं।
इमरजेंसी कॉल पर नहीं पहुंचते हैं विशेषज्ञ डॉक्टर
रात के समय इमरजेंसी में आने वाले मरीजों के लिए विशेषज्ञ डॉक्टर आसानी से नहीं मिलते हैं। मरीज की बीएसटी पर ईएमओ द्वारा विशेषज्ञ चिकित्सक की डिमांड दर्ज किए जाने के बाद भी कोई पहुंचता नहीं है। पहले तो इमरजेंसी कॉल लिखी नहीं जाती है, लेकिन यदि तीमारदारों के दबाव में रात में कॉल होती भी है तो विशेषज्ञ चिकित्सक नहीं पहुंचते हैं। हाई प्रोफाइल मामला होने पर ही इमरजेंसी कॉल पर विशेषज्ञ चिकित्सक आते हैं।
आज तक नहीं शुरू हो पाई एमआरआई जांच
जिला अस्पताल या ओपेक चिकित्सालय कैली में अभी तक एमआरआई जांच की सुविधा सुलभ नहीं हो सकी है। दरअसल उस लेबल के विशेषज्ञों की तैनाती न होने से भी इस तरह की आधुनिक जांच की व्यवस्था नहीं बन पा रही है। जिले के इन दोनों प्रमुख अस्पतालों में न्यूरोलॉजिस्ट और कार्डियोलॉजिस्ट नहीं हैं। ऐसे में एमआरआई, ईकोे, एंजियोग्राफी जैसी जांच की व्यवस्था नहीं है।
केस- एक
मेरे पिता मार्ग दुर्घटना में घायल हो गए थे। उन्हें लेकर जिला अस्पताल के ट्राॅमा सेंटर में पहुंचा गया। ड्रेसिंग कक्ष में मरहम, पट्टी करने के साथ कुछ इंजेक्शन दिए गए। वह अचेतावस्था में थे। बावजूद इसके किसी तरह की जांच नहीं हुई। कुछ देर बाद उन्हें लखनऊ रेफर कर दिया। बाद में लखनऊ के लोहिया में भी आईसीयू वार्ड में शिफ्ट न होने के कारण उनकी मौत हो गई।
-हरिओम, नगर बाजार।
केस- दो
मेरी माता जी को अचानक पसीना होने लगा। कुछ देर बाद वह मूर्छित अवस्था में चली गईं। उन्हें लेकर जिला अस्पताल पहुंचे। वहां प्राथमिक उपचार करने के साथ चिकित्सक ने हार्ट अटैक की समस्या बताई। उन्हें रेफर कर दिया गया। किसी तरह हम लोग लखनऊ लोहिया हॉस्पिटल में ले गए। वहां भर्ती कराने के सप्ताह भर बाद वह ठीक हुई।
-शशांक, गांधीनगर।