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गौर ब्लॉक क्षेत्र में इस बार टूट ही गया महेश का ‘व्यूह’
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गौर ब्लॉक क्षेत्र में इस बार टूट ही गया महेश का ‘व्यूह’
बभनान। गौर जिले का सबसे बड़ा ब्लॉक माना जाता है। इसकी कमान तीन दशक तक महेश सिंह, उनके परिवार के सदस्य और समर्थक के हाथ में ही रही। पत्नी, बेटा व अन्य चहेतों को प्रमुख बनाने में महेश हमेशा भाग्यशाली रहे। इस बार उनके व्यूह को कांति शुक्ला ने निर्विरोध चुनाव जीतकर तोड़ दिया।
स्थानीय राजनीतिक के जानकार मानते हैं कि यदि पर्चा खारिज न होता तो इस बार भी प्रमुख की कुर्सी महेश के घर में ही रहती। महेश चार बार निर्विरोध और तीन बार चुनाव जीतकर प्रमुख की कुर्सी पर राज कर चुके हैं। गौर ब्लॉक में कई शिक्षण संस्थाओं के संस्थापक पं. महादेव शुक्ल को 1982 में हराकर महेश पहली बार प्रमुख बने। इसके बाद उन्हें शिकस्त देने वाला कोई नहीं मिला।
1986 में महुआ डाबर निवासी सरजू प्रसाद सिंह से कड़े मुकाबले में महेश भारी पड़े। 1990 में निर्विरोध प्रमुख बने। 1995 में उनकी पत्नी उर्मिला सिंह निर्विरोध प्रमुख बनीं। 2000 में प्रमुख की कुर्सी अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित हुई तो अपने खास रामतौल को निर्विरोध प्रमुख बना दिया। 2005 में पिछड़े वर्ग के लिए आरक्षित होने पर मनीराम मौर्या को प्रमुख बनाने में सफल रहे।
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2010 में सीट सामान्य होने पर महेश निर्विरोध प्रमुख बने। 2015 में उनके बेटे अरविंद सिंह और जटाशंकर शुक्ल के बीच चुनाव हुआ। अरविंद ने जीत हासिल की। इस बार चुनाव में महेश की रणनीति काम न आई और उन्हें प्रमुखी से हाथ धोना पड़ा।
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बभनान। गौर जिले का सबसे बड़ा ब्लॉक माना जाता है। इसकी कमान तीन दशक तक महेश सिंह, उनके परिवार के सदस्य और समर्थक के हाथ में ही रही। पत्नी, बेटा व अन्य चहेतों को प्रमुख बनाने में महेश हमेशा भाग्यशाली रहे। इस बार उनके व्यूह को कांति शुक्ला ने निर्विरोध चुनाव जीतकर तोड़ दिया।
स्थानीय राजनीतिक के जानकार मानते हैं कि यदि पर्चा खारिज न होता तो इस बार भी प्रमुख की कुर्सी महेश के घर में ही रहती। महेश चार बार निर्विरोध और तीन बार चुनाव जीतकर प्रमुख की कुर्सी पर राज कर चुके हैं। गौर ब्लॉक में कई शिक्षण संस्थाओं के संस्थापक पं. महादेव शुक्ल को 1982 में हराकर महेश पहली बार प्रमुख बने। इसके बाद उन्हें शिकस्त देने वाला कोई नहीं मिला।
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1986 में महुआ डाबर निवासी सरजू प्रसाद सिंह से कड़े मुकाबले में महेश भारी पड़े। 1990 में निर्विरोध प्रमुख बने। 1995 में उनकी पत्नी उर्मिला सिंह निर्विरोध प्रमुख बनीं। 2000 में प्रमुख की कुर्सी अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित हुई तो अपने खास रामतौल को निर्विरोध प्रमुख बना दिया। 2005 में पिछड़े वर्ग के लिए आरक्षित होने पर मनीराम मौर्या को प्रमुख बनाने में सफल रहे।
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2010 में सीट सामान्य होने पर महेश निर्विरोध प्रमुख बने। 2015 में उनके बेटे अरविंद सिंह और जटाशंकर शुक्ल के बीच चुनाव हुआ। अरविंद ने जीत हासिल की। इस बार चुनाव में महेश की रणनीति काम न आई और उन्हें प्रमुखी से हाथ धोना पड़ा।