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Basti News: आधे से अधिक नजूल की जमीन पर अवैध कब्जा... प्रशासन के पास सिर्फ रजिस्टर
Fri, 08 Mar 2024 12:53 AM IST
गोरखपुर ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, बस्ती
संवाद न्यूज एजेंसी, बस्ती
Updated Fri, 08 Mar 2024 12:53 AM IST
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बस्ती। शहरी क्षेत्र की बेशकीमती नजूल की जमीन पर राजकीय कब्जा हो पाना बेहद कठिन है। राज्य सरकार की कैबिनेट की बैठक में नजूल की जमीन पर स्वामित्व का अधिकार वापस लेने संबंधी निर्णय भले हो गया है। मगर, यहां प्रशासनिक कवायद शून्य के बराबर है। अब तक केवल नजूल जमीन से संबंधित रजिस्टर ही प्रशासन के पास है। धरातल पर इन जमीनों का अता-पता नहीं है। आधे से अधिक जमीनों पर लोगों का कब्जा है। कहीं काॅलोनियां बस गई हैं तो कहीं पूरा का पूरा गांव बसा है। इध,र हलचल बढ़ी तो बीडीए को नजूल भूमि पर बोर्ड के साथ कब्जा दखल की जिम्मेदारी मिल गई। मगर, किस भूमि पर बोर्ड लगाए और कहां कब्जा करें यह बीडीए के लिए समझ से परे है।
रसूखदारों ने कभी अपने प्रभाव में सरकारी जमीन को अपने नाम करा लिया था। वर्षों से वहां काबिज हैं। 100 से ज्यादा जमीनों के मालिकाना हक को लेकर कानूनी लड़ाई चल रही है। कुछ जमींदारी प्रथा की जमीन को अपने हक में करने के लिए जमींदारों को हाईकोर्ट तक की शरण लेनी पड़ी है। शहर में दर्जन भर से अधिक ऐसे जमीन हैं जो वक्फ बोर्ड एवं नजूल की है।
अपने समय के प्रभावशाली जनप्रतिनिधियों ने इसे पट्टे के आधार पर अपने नाम आवंटित करा लिया था। इन्हें कब्जा मुक्त करा पाना अब टेढ़ी खीर है। इसके अलावा नजूल की खाली जमीनों पर भी रसूखदारों एवं भू-माफियाओं का कब्जा है। मौके पर नजूल की जमीनों की नवैयत बदल जाने से प्रशासन भी इन हाथ नहीं डाल पा रहा है। बीडीए की बैठक में नजूल की जमीनों को अपने कब्जे में लेने की योजना बनें तीन माह बीत गए अभी तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हो सकी है।
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सिविल जेल गांव में नजूल की जमीनों पर कालोनी
राजस्व अभिलेख में सिविल जेल के नाम से दर्ज गांव में शत-प्रतिशत जमीन नजूल की है। यहां 40986 वर्ग मीटर क्षेत्रफल के भू-भाग पर अधिकारियों के आवास, सरकारी कार्यालय के अलावा निजी क्षेत्र की काॅलोनियां भी बस गई हैं। अभिलेख में रूपांतरण होकर नजूल गाटों में लोगों के नाम दर्ज हो गए हैं। इस आधार पर घर, मकान बनाकर लोग कब्जा किए हैं। सड़क के दोनों किनारे स्थित नजूल की जमीन पर भी आम लोगों का मालिकाना है। यहां विभिन्न तरह के व्यावसायिक निर्माण कर लंबे समय से कमाई की जा रही है। बैनामे के आधार पर इन जमीनों पर कई-कई बार मालिकाना हक भी बदल चुका है। अब इन्हें अपने हक में करने के लिए प्रशासन को नाको चना चबाना पड़ेगा।
एसपी आवास के सामने 11 हेक्टेयर नजूल की जमीन
अमहट क्षेत्र में एसपी आवास के सामने 11 हेक्टेयर क्षेत्रफल में नजूल की जमीन है। इसमें ऑडिटोरियम भवन भी शामिल है। जबकि इस भवन के पीछे कुछ मकान 50 साल से अधिक समय से बने हुए हैं। कुछ खाली जमीन पर प्रशासन ने इधर कब्जे की पेशकश शुरू की है। नए सर्किट हाउस, परिवार न्यायालय, मिनी स्टेडियम आदि नए परियोजनाओं के लिए इसमें से कुछ जमीन का प्रस्ताव भेजा गया है।
लैबुड़वा, तुरकहिया में बस गई आबादी
लैबुड़वा, तुरकहिया में नजूल की जमीन पर आबादी बस गई है। ढाई दशक पहले से लैबुड़वा ताल में नजूल की जमीन पर कब्जा शुरू हो गया था। दो दर्जन से अधिक मकान यहां बन चुके हैं। पांच साल पहले प्रशासन ने लैबुड़वा ताल की जमीन की रजिस्ट्री पर रोक लगाया, तब जाकर अवैध कब्जा बंद हुआ। तुरकहिया मोहल्ला और पांडेय पोखरा पर भी नजूल एवं सरकारी जमीन पर लोगों का कब्जा बरकरार है। यहां पांडेय पोखरा के पैमाइश की पेशकश दो माह पहले शुरू हुई थी। मगर, राजस्व टीम के मौका मुआयना के बाद मामला ठंडा पड़ गया।
सदर तहसील के 22 गांवों में नहीं टूटी जमींदारी प्रथा
सदर तहसील के नगर पालिका समेत आसपास के 22 गांवों में अब तक चकबंदी नहीं हुई है। यहां जमींदारी प्रथा आजादी के बाद से नहीं टूटी है। इन गांवों में नान जेड-ए और नजूल की जमीन को बड़े पैमाने पर अभिलेख में हेरफेर कर हथिया लिया गया है। तहसील से कुछ जगहों पर जमीनों के पुराने अभिलेख तक गायब कर दिए गए हैं। जमींदारी प्रथा लागू होने की आड़ में तालाब, पोखरों एवं गड़ही तक की जमीन पर कब्जा कर लिया गया है।
पिकौरा शिवगुलाम का अभिलेख गायब, जांच नहीं हो पाई पूरी
पिकौरा शिवगुलाम मोहल्ले का नान जेड-ए जमीन का नौ फसली वर्ष का राजस्व अभिलेख वर्षों से गायब है। तहसील एवं जिला अभिलेखागार में इस मौजे की नौ वर्षों की खतौनी गायब है। इसी अवधि में तमाम भूमि के मालिकाना हक बदल गए हैं। यह मामला छह माह पहले उजागर हुआ। तत्कालीन डीएम ने जांच के निर्देश दिए। मगर, अब तक जांच पूरी नहीं हो पाई है। छह से अधिक काश्तकार अपनी भूमि के लिए न्यायालयों की शरण में हैं।
नजूल की जमीन पर मालिकाना हक राज्य सरकार का है। इस प्रकृति की जमीनों को सूचीबद्ध कराया गया है। इन्हें कब्जा मुक्त कराने के लिए ठोस रणनीति तैयार की जाएगी। इसके पैमाइश एवं चिह्नांकन का कार्य होगा। नजूल की समस्त जमीनों को सरकारी उपयोग के लिए संरक्षित किया जाएगा।
-शत्रुहन पाठक, एसडीएम सदर
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रसूखदारों ने कभी अपने प्रभाव में सरकारी जमीन को अपने नाम करा लिया था। वर्षों से वहां काबिज हैं। 100 से ज्यादा जमीनों के मालिकाना हक को लेकर कानूनी लड़ाई चल रही है। कुछ जमींदारी प्रथा की जमीन को अपने हक में करने के लिए जमींदारों को हाईकोर्ट तक की शरण लेनी पड़ी है। शहर में दर्जन भर से अधिक ऐसे जमीन हैं जो वक्फ बोर्ड एवं नजूल की है।
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अपने समय के प्रभावशाली जनप्रतिनिधियों ने इसे पट्टे के आधार पर अपने नाम आवंटित करा लिया था। इन्हें कब्जा मुक्त करा पाना अब टेढ़ी खीर है। इसके अलावा नजूल की खाली जमीनों पर भी रसूखदारों एवं भू-माफियाओं का कब्जा है। मौके पर नजूल की जमीनों की नवैयत बदल जाने से प्रशासन भी इन हाथ नहीं डाल पा रहा है। बीडीए की बैठक में नजूल की जमीनों को अपने कब्जे में लेने की योजना बनें तीन माह बीत गए अभी तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हो सकी है।
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सिविल जेल गांव में नजूल की जमीनों पर कालोनी
राजस्व अभिलेख में सिविल जेल के नाम से दर्ज गांव में शत-प्रतिशत जमीन नजूल की है। यहां 40986 वर्ग मीटर क्षेत्रफल के भू-भाग पर अधिकारियों के आवास, सरकारी कार्यालय के अलावा निजी क्षेत्र की काॅलोनियां भी बस गई हैं। अभिलेख में रूपांतरण होकर नजूल गाटों में लोगों के नाम दर्ज हो गए हैं। इस आधार पर घर, मकान बनाकर लोग कब्जा किए हैं। सड़क के दोनों किनारे स्थित नजूल की जमीन पर भी आम लोगों का मालिकाना है। यहां विभिन्न तरह के व्यावसायिक निर्माण कर लंबे समय से कमाई की जा रही है। बैनामे के आधार पर इन जमीनों पर कई-कई बार मालिकाना हक भी बदल चुका है। अब इन्हें अपने हक में करने के लिए प्रशासन को नाको चना चबाना पड़ेगा।
एसपी आवास के सामने 11 हेक्टेयर नजूल की जमीन
अमहट क्षेत्र में एसपी आवास के सामने 11 हेक्टेयर क्षेत्रफल में नजूल की जमीन है। इसमें ऑडिटोरियम भवन भी शामिल है। जबकि इस भवन के पीछे कुछ मकान 50 साल से अधिक समय से बने हुए हैं। कुछ खाली जमीन पर प्रशासन ने इधर कब्जे की पेशकश शुरू की है। नए सर्किट हाउस, परिवार न्यायालय, मिनी स्टेडियम आदि नए परियोजनाओं के लिए इसमें से कुछ जमीन का प्रस्ताव भेजा गया है।
लैबुड़वा, तुरकहिया में बस गई आबादी
लैबुड़वा, तुरकहिया में नजूल की जमीन पर आबादी बस गई है। ढाई दशक पहले से लैबुड़वा ताल में नजूल की जमीन पर कब्जा शुरू हो गया था। दो दर्जन से अधिक मकान यहां बन चुके हैं। पांच साल पहले प्रशासन ने लैबुड़वा ताल की जमीन की रजिस्ट्री पर रोक लगाया, तब जाकर अवैध कब्जा बंद हुआ। तुरकहिया मोहल्ला और पांडेय पोखरा पर भी नजूल एवं सरकारी जमीन पर लोगों का कब्जा बरकरार है। यहां पांडेय पोखरा के पैमाइश की पेशकश दो माह पहले शुरू हुई थी। मगर, राजस्व टीम के मौका मुआयना के बाद मामला ठंडा पड़ गया।
सदर तहसील के 22 गांवों में नहीं टूटी जमींदारी प्रथा
सदर तहसील के नगर पालिका समेत आसपास के 22 गांवों में अब तक चकबंदी नहीं हुई है। यहां जमींदारी प्रथा आजादी के बाद से नहीं टूटी है। इन गांवों में नान जेड-ए और नजूल की जमीन को बड़े पैमाने पर अभिलेख में हेरफेर कर हथिया लिया गया है। तहसील से कुछ जगहों पर जमीनों के पुराने अभिलेख तक गायब कर दिए गए हैं। जमींदारी प्रथा लागू होने की आड़ में तालाब, पोखरों एवं गड़ही तक की जमीन पर कब्जा कर लिया गया है।
पिकौरा शिवगुलाम का अभिलेख गायब, जांच नहीं हो पाई पूरी
पिकौरा शिवगुलाम मोहल्ले का नान जेड-ए जमीन का नौ फसली वर्ष का राजस्व अभिलेख वर्षों से गायब है। तहसील एवं जिला अभिलेखागार में इस मौजे की नौ वर्षों की खतौनी गायब है। इसी अवधि में तमाम भूमि के मालिकाना हक बदल गए हैं। यह मामला छह माह पहले उजागर हुआ। तत्कालीन डीएम ने जांच के निर्देश दिए। मगर, अब तक जांच पूरी नहीं हो पाई है। छह से अधिक काश्तकार अपनी भूमि के लिए न्यायालयों की शरण में हैं।
नजूल की जमीन पर मालिकाना हक राज्य सरकार का है। इस प्रकृति की जमीनों को सूचीबद्ध कराया गया है। इन्हें कब्जा मुक्त कराने के लिए ठोस रणनीति तैयार की जाएगी। इसके पैमाइश एवं चिह्नांकन का कार्य होगा। नजूल की समस्त जमीनों को सरकारी उपयोग के लिए संरक्षित किया जाएगा।
-शत्रुहन पाठक, एसडीएम सदर