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इस्राइली तकनीक से तैयार हो रहे आम्रपाली के पौधे
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फल उत्कृष्टता केंद्र परिसर में तैयार हो रही आम्रपाली की पौध। संवाद
- फोटो : BASTI
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इस्राइली तकनीक से तैयार हो रहे आम्रपाली के पौधे
बस्ती। जिले में आम की आम्रपाली प्रजाति को उत्कृष्टता केंद्र इस्राइली तकनीक से तैयार कर रहा है। इस तकनीक से तैयार पौधे उच्च गुणवत्ता और बेहतर फलों के लिए जाने जाते हैं।
आम्रपाली प्रजाति के आम के लिए जिला देशभर में प्रसिद्ध है। उद्यान विभाग अभी तक पारंपरिक विधि से इसकी पौध तैयार कर देशभर में भेजता है। करीब ढाई दशक पहले उद्यान विभाग दिल्ली से आम्रपाली की पौध मंगवाई गई थी। तब कोई नहीं जानता था कि एक दिन यह प्रजाति जिले की पहचान बनकर उभरेगी। आम्रपाली की पौध लगाने के तीन साल बाद से ही फल आने लगते हैं।
हर साल फल देने की खूबी इसे आम से खास बनाती है। इसकी खुशबू और स्वाद, आम के दीवानों को खूब भाता है। इंडियन एग्रीकल्चर इंस्टीट्यूट नई दिल्ली की ओर से विकसित यह प्रजाति जिले में पहली बार 1995-96 में लाई गई थी। तब से उद्यान विभाग हर साल 15,000 से 20,000 पौध तैयारकर देश के कई राज्यों में भेजता है। प्रति पौध 50 रुपये की दर से बिक्री की जाती है।
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जेडी उद्यान बताते हैं कि फल उत्कृष्टता केंद्र पर इजराइली तकनीक से तैयार की जा रही आम्रपाली में मिट्टी का उपयोग नहीं किया जाता है। पौधे तैयार करने में कोकोपिट और परलाइट का इस्तेमाल किया जाता है। परलाइट ज्वालामुखी से निकला एक प्राकृतिक अकार्बनिक, गैर-विषाक्त पदार्थ है।
कोकोपिट नारियल की जटाओं का चूरा है। दोनों को मिश्रित कर इसमें पौध तैयार करते हैं। इस विधि को इस्राइली तकनीक कही जाती है। इस विधि से तैयार पौधों में जड़ें अधिक होती हैं।
आधा दर्जन से अधिक राज्यों में भेजी जाती है पौध
आम्रपाली की मांग देश के करीब आधा दर्जन राज्यों में है। संयुक्त उद्यान निदेशक अतुल कुमार सिंह बताते हैं कि फल उत्कृष्टता केंद्र पर इसकी पौध तैयार कर बिहार, पंजाब, महाराष्ट्र, हरियाणा, उत्तराखंड, गुजरात आदि राज्यों में भेजी जाती है। इसके पेड़ की लंबाई पांच से छह मीटर होने के कारण भी लोग इसे खूब पसंद करते हैं।
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बस्ती। जिले में आम की आम्रपाली प्रजाति को उत्कृष्टता केंद्र इस्राइली तकनीक से तैयार कर रहा है। इस तकनीक से तैयार पौधे उच्च गुणवत्ता और बेहतर फलों के लिए जाने जाते हैं।
आम्रपाली प्रजाति के आम के लिए जिला देशभर में प्रसिद्ध है। उद्यान विभाग अभी तक पारंपरिक विधि से इसकी पौध तैयार कर देशभर में भेजता है। करीब ढाई दशक पहले उद्यान विभाग दिल्ली से आम्रपाली की पौध मंगवाई गई थी। तब कोई नहीं जानता था कि एक दिन यह प्रजाति जिले की पहचान बनकर उभरेगी। आम्रपाली की पौध लगाने के तीन साल बाद से ही फल आने लगते हैं।
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हर साल फल देने की खूबी इसे आम से खास बनाती है। इसकी खुशबू और स्वाद, आम के दीवानों को खूब भाता है। इंडियन एग्रीकल्चर इंस्टीट्यूट नई दिल्ली की ओर से विकसित यह प्रजाति जिले में पहली बार 1995-96 में लाई गई थी। तब से उद्यान विभाग हर साल 15,000 से 20,000 पौध तैयारकर देश के कई राज्यों में भेजता है। प्रति पौध 50 रुपये की दर से बिक्री की जाती है।
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जेडी उद्यान बताते हैं कि फल उत्कृष्टता केंद्र पर इजराइली तकनीक से तैयार की जा रही आम्रपाली में मिट्टी का उपयोग नहीं किया जाता है। पौधे तैयार करने में कोकोपिट और परलाइट का इस्तेमाल किया जाता है। परलाइट ज्वालामुखी से निकला एक प्राकृतिक अकार्बनिक, गैर-विषाक्त पदार्थ है।
कोकोपिट नारियल की जटाओं का चूरा है। दोनों को मिश्रित कर इसमें पौध तैयार करते हैं। इस विधि को इस्राइली तकनीक कही जाती है। इस विधि से तैयार पौधों में जड़ें अधिक होती हैं।
आधा दर्जन से अधिक राज्यों में भेजी जाती है पौध
आम्रपाली की मांग देश के करीब आधा दर्जन राज्यों में है। संयुक्त उद्यान निदेशक अतुल कुमार सिंह बताते हैं कि फल उत्कृष्टता केंद्र पर इसकी पौध तैयार कर बिहार, पंजाब, महाराष्ट्र, हरियाणा, उत्तराखंड, गुजरात आदि राज्यों में भेजी जाती है। इसके पेड़ की लंबाई पांच से छह मीटर होने के कारण भी लोग इसे खूब पसंद करते हैं।