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बस्ते के बोझ से हाफ रहे सेक्रेटरी और लेखपाल
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खास खबर...
बस्ते के बोझ से हांफ रहे लेखपाल-सेक्रेट्री
सात सौ लेखपालों पर 36 सौ राजस्व गांव का जिम्मा
पंचायत सेक्रेट्री पर भी सात-आठ गांवों का भार
जिले की चार तहसील की 1245 ग्राम पंचायत
अमर उजाला ब्यूरो
बस्ती। केंद्र व प्रदेश की विभिन्न योजनाओं के क्रियान्वयन का जिम्मा उठाए राजस्व लेखपाल और ग्राम पंचायत अधिकारियों की बोझ से कमर टूट रही है। समय पर काम पूरा न कर पाने से छवि तो धूमिल हो ही रही, भागदौड़ से परेशान होकर आम-आवाम कहीं बिचौलियों के हाथ कठपुतली बने देखा जा रहा। इन दिनों किसान सम्मान योजना को लेकर सांसत में फंसे यह कर्मी हांफ रहे हैं।
जिले की 28 लाख आबादी चार तहसीलों के 1246 ग्राम पंचायतों में बस्ती है। ग्राम्य विकास और विभिन्न कल्याणकारी योजनाओं के संचालन के लिए 14 ब्लॉक और 36 सौ राजस्व गांवों में बांटा गया है। राजस्व विभाग से जुड़े कार्यों के लिए तहसील स्तर से लेखपाल और विकास विभाग के अंतर्गत पंचायतीराज व्यवस्था एवं ग्राम्य विकास अभिकरण, समाज कल्याण आदि विभाग के कार्य के क्रियान्वयन का दायित्व ग्राम पंचायत अधिकारी एवं ग्राम विकास अधिकारी तैनात किए गए हैं। संख्या की बात करें तो जिले में सिर्फ सात सौ राजस्व लेखपाल हैं। यानी एक लेखपाल पर औसतन पांच-छह गांव का भार है। इसी प्रकार बमुश्किल छह सौ ग्राम पंचायत अधिकारी और दो सौ ग्राम विकास अधिकारी तैनात हैं। जिला लेखपाल संघ के उपाध्यक्ष अनिल मिश्रा का कहना है कि लेखपाल एवं सेक्रेट्री के मूल काम के अलावा तमाम तरह के कार्य दिए जा रहे हैं। क्षमता से अधिक दायित्व सौंपकर प्रदेश सरकार खुद ही कर्मियों को तंग कर रही है। दिनरात मेहनत करने के बावजूद न तो उचित सम्मान मिल रहा है न ही साख में सुधार हो रहा है। केंद्र और प्रदेश सरकार की विभिन्न योजनाओं के क्रियान्वयन के लिए इनकी गांव-गांव जाकर हकीकत जांचना हो या समय से गुणवत्तापूर्ण करर्रवाई की बात, अपेक्षा सब करते हैं लेकिन इन कर्मियों की मूल समस्या पर ध्यान नहीं है।
दायित्व पूरा करने में पेंच
पेंशन लगवानी हो या वसीयत, जन्म-मृत्यु का कुटुंब रजिस्टर में अपडेट कराने, छात्रवृत्ति के लिए आय-जाति प्रमाणपत्र की आवश्यकता। सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन की सबसे अहम कड़ी अविश्वास के कारण कमजोर होती जा रही है। योजनाओं के पात्र-अपात्र चयन के लिए तमाम दबाव भी झेलना पड़ रहा है। समय पर न तो काम हो रहा है न ही उसकी गुणवत्ता ही सुदृढ़ हो पा रही है।
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नहीं प्रभावित होंगी योजनाएं
सीडीओ अरविंद पांडेय का कहना है कि किसी भी योजना के क्रियान्वयन का जिम्मा पूरे तंत्र का होता है। आवश्यकतानुसार कार्य सौंपे जाते हैं। इसमें किसी तरह की हीलाहवाली अक्षम्य है। यदि किसी की कोई व्यक्तिगत समस्या हो तो उसे संज्ञान में लाया जाए, उचित कार्यवाई की जाएगी।
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बस्ते के बोझ से हांफ रहे लेखपाल-सेक्रेट्री
सात सौ लेखपालों पर 36 सौ राजस्व गांव का जिम्मा
पंचायत सेक्रेट्री पर भी सात-आठ गांवों का भार
जिले की चार तहसील की 1245 ग्राम पंचायत
अमर उजाला ब्यूरो
बस्ती। केंद्र व प्रदेश की विभिन्न योजनाओं के क्रियान्वयन का जिम्मा उठाए राजस्व लेखपाल और ग्राम पंचायत अधिकारियों की बोझ से कमर टूट रही है। समय पर काम पूरा न कर पाने से छवि तो धूमिल हो ही रही, भागदौड़ से परेशान होकर आम-आवाम कहीं बिचौलियों के हाथ कठपुतली बने देखा जा रहा। इन दिनों किसान सम्मान योजना को लेकर सांसत में फंसे यह कर्मी हांफ रहे हैं।
जिले की 28 लाख आबादी चार तहसीलों के 1246 ग्राम पंचायतों में बस्ती है। ग्राम्य विकास और विभिन्न कल्याणकारी योजनाओं के संचालन के लिए 14 ब्लॉक और 36 सौ राजस्व गांवों में बांटा गया है। राजस्व विभाग से जुड़े कार्यों के लिए तहसील स्तर से लेखपाल और विकास विभाग के अंतर्गत पंचायतीराज व्यवस्था एवं ग्राम्य विकास अभिकरण, समाज कल्याण आदि विभाग के कार्य के क्रियान्वयन का दायित्व ग्राम पंचायत अधिकारी एवं ग्राम विकास अधिकारी तैनात किए गए हैं। संख्या की बात करें तो जिले में सिर्फ सात सौ राजस्व लेखपाल हैं। यानी एक लेखपाल पर औसतन पांच-छह गांव का भार है। इसी प्रकार बमुश्किल छह सौ ग्राम पंचायत अधिकारी और दो सौ ग्राम विकास अधिकारी तैनात हैं। जिला लेखपाल संघ के उपाध्यक्ष अनिल मिश्रा का कहना है कि लेखपाल एवं सेक्रेट्री के मूल काम के अलावा तमाम तरह के कार्य दिए जा रहे हैं। क्षमता से अधिक दायित्व सौंपकर प्रदेश सरकार खुद ही कर्मियों को तंग कर रही है। दिनरात मेहनत करने के बावजूद न तो उचित सम्मान मिल रहा है न ही साख में सुधार हो रहा है। केंद्र और प्रदेश सरकार की विभिन्न योजनाओं के क्रियान्वयन के लिए इनकी गांव-गांव जाकर हकीकत जांचना हो या समय से गुणवत्तापूर्ण करर्रवाई की बात, अपेक्षा सब करते हैं लेकिन इन कर्मियों की मूल समस्या पर ध्यान नहीं है।
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दायित्व पूरा करने में पेंच
पेंशन लगवानी हो या वसीयत, जन्म-मृत्यु का कुटुंब रजिस्टर में अपडेट कराने, छात्रवृत्ति के लिए आय-जाति प्रमाणपत्र की आवश्यकता। सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन की सबसे अहम कड़ी अविश्वास के कारण कमजोर होती जा रही है। योजनाओं के पात्र-अपात्र चयन के लिए तमाम दबाव भी झेलना पड़ रहा है। समय पर न तो काम हो रहा है न ही उसकी गुणवत्ता ही सुदृढ़ हो पा रही है।
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नहीं प्रभावित होंगी योजनाएं
सीडीओ अरविंद पांडेय का कहना है कि किसी भी योजना के क्रियान्वयन का जिम्मा पूरे तंत्र का होता है। आवश्यकतानुसार कार्य सौंपे जाते हैं। इसमें किसी तरह की हीलाहवाली अक्षम्य है। यदि किसी की कोई व्यक्तिगत समस्या हो तो उसे संज्ञान में लाया जाए, उचित कार्यवाई की जाएगी।