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स्क्रैप टाइपस किलनी एइएस का कारक
Updated Sat, 22 Jul 2017 11:34 PM IST
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स्क्रैप टाइपस किलनी एईएस का कारक
बस्ती।
जलजनित रोग के रूप में चिह्नित एक्यूट इंसेफेलाइटिस सिंड्रोम यानी एईएस का एक और कारक स्वास्थ्य विभाग की शोध में सामने आ गया है। एईएस रोग में स्क्रैप टाइपस किलनी के कीटाणु इसके एक और कारक हैं।
यह किलनी झाड़-झंखाड़ में पैदा होती है। इसके काटने से एईएस के कीटाणु शरीर में फैल जाते हैं। तेज बुखार होता है। फिर मरीज को झटके आने लगते हैं। शोध से हुए खुलासे के बाद स्वास्थ्य महकमा सजग हो गया है। इससे निपटने के लिए स्वास्थ्य महकमा वन विभाग का सहयोग लेगा। पूर्वांचल के लिए अभिशाप बन चुके जापानी मस्तिष्क ज्वर से स्वास्थ्य विभाग कुछ हद तक निजात पा चुका है। पर जेई से मिलते-जुलते एईएस का प्रभाव अब भी बरकरार है। इसके चलते जिले में इस साल दर्जन भर मौतें हो चुकी हैं। एईएस में भी मरीज का समय से इलाज न होने पर स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। इस रोग में मरीज को दिव्यांगता का खतरा तो रहता ही है जान भी चली जाती है। शुरुआती दौर में जांच-पड़ताल के बाद इस रोग का कारक स्वास्थ्य विभाग नहीं खोज पाया। बाद में जलजनित बता दिया गया। इसके बाद लोगों को स्वच्छ जल के उपयोग की सलाह दी जाने लगी। जल निगम सहित अन्य जिम्मेदार विभागों को पानी की स्वच्छता के लिए शासन स्तर पर आदेश-निर्देश जारी कर दिए गए। जलजनित होने के अलावा एईएस का एक और कारक स्वास्थ्य विभाग की शोध में सामने आया है। इस रोग के लिए दूसरा कारक स्क्रैप टाइपस किलनी भी है। यह किलनी जंगली घास में प्राकृतिक रूप से पनपती है। झाड़-झंखाड़ और जंगली घास में रहने वाली इस किलनी को मारने के लिए हालांकि अभी किसी दवा की ईजाद नहीं हो सकी है मगर इसके लिए झाड़-झंखाड़ को दूर करना जरूरी होता है। इस रोग में किलनी की जानकारी सामने आने के बाद स्वास्थ्य महकमे ने वन विभाग से सहयोग मांगा है। जंगली इलाकों के आसपास के गांवों में इस रोग का प्रभाव इसी किलनी के चलते है।
सीएमओ डॉ. जेएलएम कुशवाहा ने इसकी पुष्टि करते हुए कहा कि शोध में स्क्रैप टाइपस किलनी की जानकारी मिल गई है। चूंकि अभी इसको मारने के लिए किसी कीटनाशक की इजाद नहीं हो सकी है। ऐसे में घास-फूस और झाड़-झंखाड़ की सफाई कर इससे निजात पाई जा सकती है। कहा कि जलजनित होने के अलावा यह किलनी भी एईएस का कारक है।
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बस्ती।
जलजनित रोग के रूप में चिह्नित एक्यूट इंसेफेलाइटिस सिंड्रोम यानी एईएस का एक और कारक स्वास्थ्य विभाग की शोध में सामने आ गया है। एईएस रोग में स्क्रैप टाइपस किलनी के कीटाणु इसके एक और कारक हैं।
यह किलनी झाड़-झंखाड़ में पैदा होती है। इसके काटने से एईएस के कीटाणु शरीर में फैल जाते हैं। तेज बुखार होता है। फिर मरीज को झटके आने लगते हैं। शोध से हुए खुलासे के बाद स्वास्थ्य महकमा सजग हो गया है। इससे निपटने के लिए स्वास्थ्य महकमा वन विभाग का सहयोग लेगा। पूर्वांचल के लिए अभिशाप बन चुके जापानी मस्तिष्क ज्वर से स्वास्थ्य विभाग कुछ हद तक निजात पा चुका है। पर जेई से मिलते-जुलते एईएस का प्रभाव अब भी बरकरार है। इसके चलते जिले में इस साल दर्जन भर मौतें हो चुकी हैं। एईएस में भी मरीज का समय से इलाज न होने पर स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। इस रोग में मरीज को दिव्यांगता का खतरा तो रहता ही है जान भी चली जाती है। शुरुआती दौर में जांच-पड़ताल के बाद इस रोग का कारक स्वास्थ्य विभाग नहीं खोज पाया। बाद में जलजनित बता दिया गया। इसके बाद लोगों को स्वच्छ जल के उपयोग की सलाह दी जाने लगी। जल निगम सहित अन्य जिम्मेदार विभागों को पानी की स्वच्छता के लिए शासन स्तर पर आदेश-निर्देश जारी कर दिए गए। जलजनित होने के अलावा एईएस का एक और कारक स्वास्थ्य विभाग की शोध में सामने आया है। इस रोग के लिए दूसरा कारक स्क्रैप टाइपस किलनी भी है। यह किलनी जंगली घास में प्राकृतिक रूप से पनपती है। झाड़-झंखाड़ और जंगली घास में रहने वाली इस किलनी को मारने के लिए हालांकि अभी किसी दवा की ईजाद नहीं हो सकी है मगर इसके लिए झाड़-झंखाड़ को दूर करना जरूरी होता है। इस रोग में किलनी की जानकारी सामने आने के बाद स्वास्थ्य महकमे ने वन विभाग से सहयोग मांगा है। जंगली इलाकों के आसपास के गांवों में इस रोग का प्रभाव इसी किलनी के चलते है।
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सीएमओ डॉ. जेएलएम कुशवाहा ने इसकी पुष्टि करते हुए कहा कि शोध में स्क्रैप टाइपस किलनी की जानकारी मिल गई है। चूंकि अभी इसको मारने के लिए किसी कीटनाशक की इजाद नहीं हो सकी है। ऐसे में घास-फूस और झाड़-झंखाड़ की सफाई कर इससे निजात पाई जा सकती है। कहा कि जलजनित होने के अलावा यह किलनी भी एईएस का कारक है।
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