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Republic Day 2023: संविधान की संकल्पना में रहा बरेली का सशक्त योगदान, दो स्वतंत्रता सेनानी थे समिति के सदस्य

Thu, 26 Jan 2023 10:13 AM IST
मुकेश कुमार अमर उजाला ब्यूरो, बरेली
अमर उजाला ब्यूरो, बरेली Published by: मुकेश कुमार Updated Thu, 26 Jan 2023 10:13 AM IST
सार

बरेली के लिए यह गर्व की बात है कि संविधान के निर्माण के लिए देश भर से चुने गए 389 सदस्यों में से दो बरेली के भी थे। ये स्वतंत्रता संग्राम सेनानी सेठ दामोदर स्वरूप और सतीश चंद्र थे।  

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Two freedom fighters of Bareilly were members of the constitution making committee
स्वतंत्रता सेनानी सेठ दामोदर स्वरूप की प्रतिमा - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

संविधान की संकल्पना में बरेली का सशक्त योगदान रहा है। विश्व के सबसे बड़े लिखित संविधान की निर्मात्री समिति में बरेली के दो स्वतंत्रता संग्राम सेनानी शामिल रहे। बरेली के लिए यह गर्व की बात है कि संविधान के निर्माण के लिए देश भर से चुने गए 389 सदस्यों में से दो बरेली के भी थे। ये स्वतंत्रता संग्राम सेनानी सेठ दामोदर स्वरूप और सतीश चंद्र थे।  

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सेठ दामोदार स्वरूप... संविधान सभा के थे सदस्य पर नहीं किया हस्ताक्षर

संविधान निर्मात्री समिति में सेठ दामोदर स्वरूप भी थे। अंग्रेज सरकार के खिलाफ पर्चे चिपकाने का काम इन्हें ही मिलता था। चौकी चौराहा स्थित पार्क पर स्थापित प्रतिमा में दर्ज लेख के मुताबिक सेठ दामोदर का जन्म बिहारीपुर, बरेली में 11 फरवरी 1901 में हुआ था। स्वतंत्रता संग्राम में योगदान देने से वे 15 साल कारागार में रहे थे। इन्होंने बरेली छावनी विद्रोह, बनारस कांड, जलियांवाला बाग कांड, काकोरी कांड में सक्रिय भूमिका निभाई थी। 

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सेठ दामोदार केंद्रीय असेम्बली के लिए निर्वाचित हुए थे। साल 1946-48 तक उप्र कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष आचार्य नरेंद्र देव के साथ प्रमुख नेता के रूप में रहे। साल 1965 में इनका देहावसान हुआ था। हालांकि, स्थापित संविधान सभा में सदस्य होने पर भी किन्हीं वजहों से इन्होंने हस्ताक्षर नहीं किए। 

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Two freedom fighters of Bareilly were members of the constitution making committee
साहित्यकार सुधीर विद्यार्थी - फोटो : अमर उजाला

‘बांस बरेली का सरदार, सेठ दामोदर जिंदाबाद’

साहित्यकार सुधीर विद्यार्थी बताते हैं कि 1912 में बनारस कांड में सेठ दामोदर स्वरूप को सजा हुई थी। जेल भी गए थे। 1925 के काकोरी कांड में दस लोग ही थे, मगर गिरफ्तारी 40 से ज्यादा लोगों की हुई थी। जो गिरफ्तार हुए उनमें सेठ दामोदर स्वरूप भी थे। मगर उनकी जेल में हालत बिगड़ी। वे मरणासन्न हो गए तो उन्हें मुकदमे के दौरान ही छोड़ना पड़ा। इसके अतिरिक्त जो भी आंदोलन हुए उनमें वे सक्रिय रहे। 

सेठ दामोदर स्वरूप बाद में समाजवादी हो गए थे। ‘साम्यवाद का संदेश’ नामक पुस्तक में इनका लेख भी है। वह संविधान निर्माता परिषद में भी सदस्य बनाए गए थे। लेकिन संविधान का जो प्रारूप बना था उसके विरोध में थे। उन्होंने लिखित कहा था कि संविधान समाजवाद विरोधी है। इसको लागू करने से देश में समाजवाद की स्थापना नहीं हो सकती। संविधान निर्मात्री परिषद का संविधान लागू होने के बाद सभी सदस्यों को सम्मानित किया गया। उस समारोह में वह भी मौजूद थे। उन्हें आवाज दी गई तो उन्होंने बैठे-बैठे हाथ हिलाकर मना कर दिया था। 

सेठ दामोदर स्वरूप बरेली की स्वाधीनता आंदोलन की राजनीति में इस कदर लोकप्रिय थे कि उनके लिए जनता ने एक नारा गढ़ लिया था। नारा था - ‘बांस बरेली का सरदार, सेठ दामोदर जिंदाबाद’। बाद के दिनों में सेठ जी मोती महल लखनऊ में रहने लगे थे। कुछ लोगों का कहना है कि उन्होंने अपनी आत्मकथा लिखी थी मगर वह गोमती में बाढ़ आने से नष्ट हो गई थी। चंद्रशेखर आजाद ने भी अपनी आत्मकथा में सेठ जी का जिक्र किया है। यशपाल के ‘सिंहावलोकन’ में भी जिक्र है। 

तीन बार सलाखों में कैद हुए थे पूर्व सांसद सतीश चंद्र

आलमगिरिगंज के रहने वाले स्वतंत्रता संग्राम सेनानी सतीश चंद्र को ब्रिटिश सरकार की खिलाफत और क्रांतिकारियों का सहयोग करने क ी वजह से अंग्रेजों ने इन्हें तीन बार जेल में सलाखों के पीछे भेजा था। मगर इन्होंने क्रांति का बिगुल जारी रखा। देश की आजादी में अहम भूमिका निभाने वाले सतीश चंद्र दो साल तक संविधान सभा के सदस्य भी रहे। 

संविधान की स्वीकृति के बाद साल 1950 से 1952 तक देश की अंतरिम संसद के सदस्य रहे। इनकी योग्यता, कार्यक्षमता से प्रभावित होकर प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने साल 1951 में संसदीय सचिव नियुक्त किया था। साल 1952 में पहली बार और दूसरी बार भी बरेली के सांसद बने। तीसरी बार 1971 में सांसद चुने गए। वह कई मंत्रालयों में उपमंत्री रहे। पंडित नेहरू के अलावा वह पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री और इंदिरा गांधी के भी काफी करीबी थे।

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