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पकड़ी गई बाघिन

Sat, 19 Jun 2021 12:33 AM IST
Bareily Bureau बरेली ब्यूरो
Updated Sat, 19 Jun 2021 12:33 AM IST
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tigress rescue
बरेली। किशनपुर सेंक्चुरी से रबर फैक्टरी में आई बाघिन को पकड़ने के अभियान पर सवा साल में 62 लाख रुपये से भी ज्यादा रकम फूंक दी गई लेकिन इसके बाद भी विशेषज्ञ उसके ठिकाने तक का पता नहीं लगा पाए। इस बार भी अभियान शुरू हुआ तो रबर फैक्टरी के मंदिर में उसके छिपने की संभावना मानते हुए कई दिन कवायद की जाती रही लेकिन आखिर में पता लगा कि बाघिन ने मंदिर नहीं बल्कि टैंक को ठिकाना बना रखा है। सही लोकेशन मिलते ही बाघिन को पकड़ने में कामयाबी मिल गई।
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रबर फैक्टरी में पहली बार बाघिन को करीब सवा साल पहले देखा गया था, तभी से उसे पकड़ने का अभियान चलाया जा रहा था। वन विभाग ने बाघिन की लोकेशन का पता लगाने के लिए रबर फैक्टरी में तमाम कैमरे लगाए थे। इन कैमरों की फुटेज के आधार कई बार उसके ठिकाने का अनुमान लगाने की कोशिश की गई लेकिन दूर-दूर से आए विशेषज्ञ भी इसमें कामयाब नहीं हो सके। बाघिन भी बार-बार अपना ठिकाना बदलकर उन्हें लगातार चकमा देती रही। एक चूक यह भी हुई कि काफी-काफी समय तक कैमरों को एक ही जगह लगाए रखा गया, लिहाजा यह पता नहीं लग पाया कि ठिकाना बदल रही बाघिन की रबर फैक्टरी के किस हिस्से में ज्यादा आवाजाही है।
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इस बार भी करीब तीन हफ्ते से चल रहे अभियान के शुरुआती दौर में बाघिन के ठिकाने का विशेषज्ञ कोई अंदाजा नहीं लगा पाए। विशेषज्ञ के मुताबिक चालाक बाघिन दिन भर मंदिर के पास रहती थी लेकिन रात में वहां नजर नहीं आती थी। इस वजह से लगातार भ्रम बना रहा। कई बार जाल लगाने के बाद भी कोई नतीजा हासिल नहीं हुआ तो कैमरों की लोकेशन बदली गई तब कहीं पता चला कि उसका ठिकाना टैंक में है। बताया जा रहा है कि पिंजड़े में बांधे गए पडडे को दो दिन पहले चारा देने पहुंचे वनकर्मी शंकर ने टैंक के रास्ते पर बाघिन के बाल देखे तो इसकी पुष्टि हो गई। अधिकारियों ने इसके बाद टैंक के पास कैमरा लगाया, इसके बाद बाघिन की सटीक लोकेशन मिल गई।
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रबर की मोटी परत पर नहीं मिल रहे थे पगमार्क
पीलीभीत टाइगर रिजर्व से आए विशेषज्ञ सुशांत सोमा ने बताया कि रबर फैक्टरी में बाघिन की लोकेशन का पता लगाना इसलिए भी चुनौती थी क्योंकि फैक्टरी में जगह-जगह रबर की मोटी परत जमी हुई है, इस वजह से उसके पगमार्क नहीं मिल रहे थे। इसी कारण 50 पगमार्क इम्प्रेशन पैड भी लगाने पड़े। फैक्टरी में छिपने के लिए काफी जगह है और बाघिन लगातार अपना ठिकाना बदल रही थी। शिकार के लिए फैक्टरी के जंगल में तमाम जानवर हैं। इसलिए वह कहीं और नहीं गई और न किसी के लिए खतरा बनी। 27 मई से ऑपरेशन शुरू हुआ, 15 जून को सटीक लोकेशन मिली।
31 घंटे चला ऑपरेशन तब
पिंजड़े में कै द हुई बाघिन
नापजोख और वजन के बाद 36 मिनट के अंदर पिंजड़े में डाला बेहोश बाघिन को
मुख्य वन सरंक्षक ललित वर्मा के मुताबिक बाघिन को टैंक में ही बेहोश करके सुरक्षित निकालने में भी बड़ी चुनौती थी। ट्रैंक्युलाइज किए जाने के बाद टीम के पास उसे निकालने के लिए सिर्फ 40 मिनट थे। लिहाजा आनन-फानन टैंक के उस हिस्से की मोटी चादर को काटा गया जहां बाघिन मौजूद थी। इस काम में करीब 20 मिनट लगे। बाकी 20 मिनट में उसकी नापजोख, वजन करने और कैनाइन परीक्षण के बाद उसे पिंजड़े में बंद किया जाना था लिहाजा टीम ने काफी फुर्ती से ये सारे काम निपटाए। 36 मिनट में ही बाघिन को पिंजड़े में डाल दिया गया।
15 दिन रह सकती थी टैंक में
विशेषज्ञ डॉ. दक्ष और सुशांत के मुताबिक बाघिन एक बार शिकार करने के बाद 15 दिन से ज्यादा समय तक बगैर खाए रह सकती है। तीन दिन पहले ही बाघिन ने एक सुअर का शिकार किया था लिहाजा आशंका थी कि वह टैंक से बाहर निकलने में कई दिन लगा सकती है। उसे बाहर निकालने की कोशिश नाकाम रहीं तो उसे ट्रैंक्युलाइज करना जरूरी हो गया।
7.66 फुट लंबी और डेढ़ सौ
किलो वजन की है शर्मीली
विशेषज्ञों के मुताबिक बाघिन वयस्क है। नापजोख में उसके शरीर की लंबाई 147 सेंटीमीटर, पूंछ 83 सेंटीमीटर, ऊपर के दांत चार सेंटीमीटर और नीचे के 3.8 सेंटीमीटर लंबे मिले। वजन 150 किलो, ऊंचाई 97 सेंटीमीटर है।
बेहोश बाघिन की खुली आंखें देखकर
घबराई टीम, दहाड़ से गिरा मोबाइल
टैंक की चादर काटने के बाद जब वन विभाग कर्मी बाघिन के पास गए तो उसकी आंखें खुली देखकर घबरा गए। अफसरों ने बेहोश होने की वजह से उसकी आंखें खुली होना बताया तो वनकर्मी फिर उसके पास गए। डरते-डरते उसे छूकर देखा और कोई प्रतिक्रिया न होने पर उसे बाहर निकाला। पिंजड़े में कैद करने के बाद होश में लाने के लिए उसे रिवर्स डोज दी गई। इसी दौरान टीम का एक सदस्य वीडियो बना रहा था। धीरे-धीरे होश में आई बाघिन ने खुद को पिंजड़े में कैद पाया तो दहाड़ मारी। इस पर वीडियो बना रहा कर्मचारी इतना घबरा गया कि उसके हाथ से मोबाइल छूटकर नीचे गिर पड़ा। इसके बाद अफसरों ने पिंजड़े पर सामने काला कपड़ा डलवा दिया।
परिवार के साथ बाघिन को देखने पहुंचे अफसर
बाघिन को पिंजड़े में कैद कर मुख्य वन संरक्षक कार्यालय ले जाया गया जहां डीएम नितीश कुमार और सीडीओ चंद्र मोहन गर्ग परिजन के साथ उसे देखने पहुंचे। उन्होंने वन विभाग के अफसरों और विशेषज्ञों से ऑपरेशन के बारे में जानकारी ली। इसी दौरान आसपास के कुछ बच्चे भी पिंजड़े के इर्द-गिर्द खड़े हो गए। अफसरों को बाघिन दिखाने के लिए जैसे ही पिंजड़े पर पड़ा काला परदा हटाया गया, उसने फिर दहाड़ मारी। इस पर डरकर बच्चे चीखते हुए वहां से भाग निकले। काफी देर तक लोग बाघिन का वीडियो बनाते रहे।
पड्डे का नाम अब जीवनदान
करीब सात दिन से एक पड्डे को बांधकर बाघिन को ट्रैक करने की कोशिश हो रही थी मगर चालाक बाघिन एक भी दिन उस पड्डे के पास नहीं गई। शुक्रवार को बाघिन के ट्रैंक्युलाइज होने की वजह से पड्डे की जान बच गई। इसके बाद अफसरों ने पड्डे का नामकरण करते हुए उसका नाम ‘जीवनदान’ रख दिया और सुरक्षित छुड़वा दिया।
फतेह के बाद शर्मीली
एक तेंदुआ भी है रबर फैक्टरी के जंगल में
दो साल पहले फैक्टरी में एक बाघ को पकड़कर उसे फतेह नाम दिया गया था। उसके पंजे में चोट लगने से एक नाखून निकल जाने की वजह से उसे कानपुर चिड़ियाघर भेजा गया था। उस अभियान में करीब आठ महीने लगे थे। कुछ दिन बाद एक तेंदुआ पहुंचा जो बाघिन के पहुंचने के बाद भाग निकला। हाईवे पर एक दुर्घटना में उसकी मौत हो गई। 18 जून को बाघिन शर्मीली का रेस्क्यु हुआ। फैक्टरी के एक गार्ड ने बताया कि बाघिन से पहले फैक्टरी में दो तेंदुए दिखे थे। एक तेंदुआ तो मारा गया, दूसरा फैक्टरी के पश्चिमी जंगल मे बाघिन से छिपकर रह रहा है। 15 दिन पहले एक कैमरे में तेंदुए की तस्वीरें दिखी थीं।
वर्जन:
बाघिन किशनपुर सेंक्चुरी से रबर फैक्टरी पहुंची थी इसलिए उसे वापस किशनपुर सेंक्चुरी भेजने का निर्णय लिया गया। अगर वह चोटिल होती तो उसे चिड़ियाघर ले जाया जाता लेकिन वह पूरी तरह स्वस्थ है। ऑपरेशन सफल रहा। - भारत लाल, डीएफओ

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बाघिन के बाहर निकलने का इंतजार करते तो कई दिन लग सकते थे। इसी कारण विशेषज्ञों से परामर्श के बाद मुख्यालय से ट्रेंक्युलाइज करने की अनुमति ली गई। एक ही डॉट में वह बेहोश हो गई और उसे पिंजड़े में कैद कर लिया गया। - ललित वर्मा, सीएफओ
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