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‘खेल को प्रोफेशन नहीं माना, देश के लिए दिल से खेला’
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रानी लक्ष्मीबाई पुरस्कार से नवाजी गईं वेटरन हॉकी खिलाड़ी रजनी जोशी दीक्षित
वर्ष 1982 से 1991 तक नेशनल और इंटरनेशनल चैंपियनशिप में देश को दिलाई थी जीत
बरेली। करीब 40 साल पहले.. जब हॉकी के बजाय क्रिकेट की दीवानगी लोगों के सिर चढ़कर बोल रही थी। क्रिकेट के तमाम स्पॉन्सर थे, हॉकी के लिए कोई आगे आने को तैयार नहीं था। ऐसे में इंटरनेशनल हॉकी चैंपियनशिप जीतना किसी दिवास्वप्न से कम नहीं था। उस दौर में भी बरेली की रजनी जोशी दीक्षित ने हार नहीं मानी। शानदार प्रदर्शन से विदेशी टीमों को धूल चटाकर देश, प्रदेश समेत बरेली को गौरवान्वित होने का मौका दिया। खेल के प्रति उनकी इस दीवानगी को आखिरकार मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने प्रदेश के सबसे बड़े खेल अवॉर्ड ‘रानी लक्ष्मीबाई पुरस्कार’ से नवाजा है।
शुक्रवार को उत्तर प्रदेश के स्थापना दिवस के अवसर पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने बरेली के महानगर निवासी नेशनल हॉकी खिलाड़ी रजनी जोशी दीक्षित को लखनऊ में खेल के प्रति समर्पण और बेहतर प्रदर्शन को सम्मानित किया। उन्हें यह सम्मान वेटरन प्लेयर कैैटगरी में मिला है। रजनी जोशी ने बताया कि देश प्रेम के साथ ही खेल का जज्बा भी उन्हें विरासत में मिला था। पिता डीके जोशी नेवी में ऑफिसर थे और फुटबाल खेलते थे। ताऊ चंद्रशेखर जोशी बिजनेसमेन थे, लेकिन हॉकी के बेहतर खिलाड़ी थे। उन्होंने बताया कि खेल का हुनर उनमें भी था, जिसे देखकर परिवार ने उन्हें सपोर्ट किया और लखनऊ स्पोर्ट्स हॉस्टल में प्रवेश दिलाया। राष्ट्रीय खेल हॉकी को उन्होंने चुना और उस दौरान की बेहतर हॉकी खिलाड़ी प्रेम माया और सुधा चौधरी बनने का संकल्प लिया। कहा दो साल बाद ही उन्हें नेशनल टीम में जगह बनाने में कामयाब हो गईं। फिर शुरू हुआ खेलने का दौर साल जो 1991 तक जारी रहा। साल 1991 में उनका विवाह रणजी और रेलवे के पूर्व क्रिकेट खिलाड़ी मनोज दीक्षित से हुई। इसके बाद रजनी ने खेल को अलविदा कह दिया। फिलहाल वह रेलवे में अकाउंटेंट पद पर और पति मनोज भी रेलवे में ही सीओएस पद पर कार्यरत हैं। सम्मान से नवाजे जाने पर नरमू के मंडल अध्यक्ष उमेश सक्सेना ने उन्हें शुभकामनाएं दी हैं।
वो मैच.. जिसमें रजनी ने किया कमाल
1984 में बंगलुरू में हुई 37वीं सीनियर राष्ट्रीय चैंपियनशिप में प्रतिभाग करने का पहला मौका मिला। साल भर बाद 1985 में कोयंबटूर में हुए 10वें राष्ट्रीय खेल में कांस्य पदक विजेता बनीं। 1985 में ही भारत-चीन हॉकी टेस्ट सीरीज में प्रतिभाग किया। 1986 में सिंगापुर में हुई चार देशों की हॉकी चैंपियनशिप में रजत पदक, 1989 में लखनऊ में हुए इंदिरा गांधी अंतर्राष्ट्रीय गोल्ड कप जीता। 1989 में दिल्ली में हुई इंटर कॉन्टीनेंटल हॉकी में प्रतिभाग किया। 1989 में ही हांगकांग में हुए एशिया कप में चौथा स्थान, 1990 में बीजिंग में हुई अंतरराष्ट्रीय हॉकी प्रतियोगिता में कांस्य पदक, 1990 में बीजिंग में ही 11वें एशियाई खेल में चौथा स्थान, 1991 में चंडीगढ़ में हुए इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय गोल्ड कप में चौथा स्थान हासिल कर देश और प्रदेश को गौरवान्वित किया।
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इस दौर में हॉकी खिलाड़ियों के लिए कई मौके
वेटरन हॉकी खिलाड़ी रजनी ने बताया कि उस दौर के मुकाबले अब हॉकी खिलाड़ियों को काफी बेहतर सुविधाएं मिल रहीं हैं। पहले विदेशी टीमों के साथ खेलने का मौका कम मिलता था और मैच कम होते थे। इससे अन्य देशों की खेल की तकनीक को समझने का मौका कम मिलता था। कई बार टीम को इसके चलते हार का सामना भी करना पड़ा था। कहा, अब हॉकी खिलाड़ियों को कई बेहतर सुविधाएं मिल रहीं हैं। स्पॉन्सर भी मिल रहे हैं और साल भर मुकाबले हो रहे हैं, इससे खेल के कई दांवपेंच टीम के खिलाड़ी सीख रहे हैं। वहीं, नियमों में भी काफी बदलाव हुए हैं, जिसके चलते देश की टीम बेहतर प्रदर्शन कर रही है।
खेल को प्रोफेशन न बनाएं, देश के लिए खेलें
क्रिकेट, फुटबाल, हॉकी, बैडमिंटन, कुश्ती, एथेलेटिक्स, वॉलीबॉल या अन्य खेलों से जुड़े खिलाड़ियों को वेटरन हॉकी खिलाड़ी रजनी ने खेल को प्रोफेशन बनाने के बजाय उसे दिल से खेलने का सुझाव दिया है। कहा कि खिलाड़ियों को मिल रही तमाम सुविधाओं को देखकर कई युवा खिलाड़ी बन रहे हैं। जो गलत है। उन्होंने ऐसे युवाओं को संदेश दिया है कि खेल से देश की गरिमा जुड़ी होती है। एक-एक रन या गोल से देश का मान सम्मान जुड़ा होता है। इसलिए इसे करियर समझ कर खेलने वाले खिलाड़ी अक्सर असफल होते हैं और दिल से खेलने वाले ही आगे बढ़ते हैं।
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वर्ष 1982 से 1991 तक नेशनल और इंटरनेशनल चैंपियनशिप में देश को दिलाई थी जीत
बरेली। करीब 40 साल पहले.. जब हॉकी के बजाय क्रिकेट की दीवानगी लोगों के सिर चढ़कर बोल रही थी। क्रिकेट के तमाम स्पॉन्सर थे, हॉकी के लिए कोई आगे आने को तैयार नहीं था। ऐसे में इंटरनेशनल हॉकी चैंपियनशिप जीतना किसी दिवास्वप्न से कम नहीं था। उस दौर में भी बरेली की रजनी जोशी दीक्षित ने हार नहीं मानी। शानदार प्रदर्शन से विदेशी टीमों को धूल चटाकर देश, प्रदेश समेत बरेली को गौरवान्वित होने का मौका दिया। खेल के प्रति उनकी इस दीवानगी को आखिरकार मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने प्रदेश के सबसे बड़े खेल अवॉर्ड ‘रानी लक्ष्मीबाई पुरस्कार’ से नवाजा है।
शुक्रवार को उत्तर प्रदेश के स्थापना दिवस के अवसर पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने बरेली के महानगर निवासी नेशनल हॉकी खिलाड़ी रजनी जोशी दीक्षित को लखनऊ में खेल के प्रति समर्पण और बेहतर प्रदर्शन को सम्मानित किया। उन्हें यह सम्मान वेटरन प्लेयर कैैटगरी में मिला है। रजनी जोशी ने बताया कि देश प्रेम के साथ ही खेल का जज्बा भी उन्हें विरासत में मिला था। पिता डीके जोशी नेवी में ऑफिसर थे और फुटबाल खेलते थे। ताऊ चंद्रशेखर जोशी बिजनेसमेन थे, लेकिन हॉकी के बेहतर खिलाड़ी थे। उन्होंने बताया कि खेल का हुनर उनमें भी था, जिसे देखकर परिवार ने उन्हें सपोर्ट किया और लखनऊ स्पोर्ट्स हॉस्टल में प्रवेश दिलाया। राष्ट्रीय खेल हॉकी को उन्होंने चुना और उस दौरान की बेहतर हॉकी खिलाड़ी प्रेम माया और सुधा चौधरी बनने का संकल्प लिया। कहा दो साल बाद ही उन्हें नेशनल टीम में जगह बनाने में कामयाब हो गईं। फिर शुरू हुआ खेलने का दौर साल जो 1991 तक जारी रहा। साल 1991 में उनका विवाह रणजी और रेलवे के पूर्व क्रिकेट खिलाड़ी मनोज दीक्षित से हुई। इसके बाद रजनी ने खेल को अलविदा कह दिया। फिलहाल वह रेलवे में अकाउंटेंट पद पर और पति मनोज भी रेलवे में ही सीओएस पद पर कार्यरत हैं। सम्मान से नवाजे जाने पर नरमू के मंडल अध्यक्ष उमेश सक्सेना ने उन्हें शुभकामनाएं दी हैं।
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वो मैच.. जिसमें रजनी ने किया कमाल
1984 में बंगलुरू में हुई 37वीं सीनियर राष्ट्रीय चैंपियनशिप में प्रतिभाग करने का पहला मौका मिला। साल भर बाद 1985 में कोयंबटूर में हुए 10वें राष्ट्रीय खेल में कांस्य पदक विजेता बनीं। 1985 में ही भारत-चीन हॉकी टेस्ट सीरीज में प्रतिभाग किया। 1986 में सिंगापुर में हुई चार देशों की हॉकी चैंपियनशिप में रजत पदक, 1989 में लखनऊ में हुए इंदिरा गांधी अंतर्राष्ट्रीय गोल्ड कप जीता। 1989 में दिल्ली में हुई इंटर कॉन्टीनेंटल हॉकी में प्रतिभाग किया। 1989 में ही हांगकांग में हुए एशिया कप में चौथा स्थान, 1990 में बीजिंग में हुई अंतरराष्ट्रीय हॉकी प्रतियोगिता में कांस्य पदक, 1990 में बीजिंग में ही 11वें एशियाई खेल में चौथा स्थान, 1991 में चंडीगढ़ में हुए इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय गोल्ड कप में चौथा स्थान हासिल कर देश और प्रदेश को गौरवान्वित किया।
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इस दौर में हॉकी खिलाड़ियों के लिए कई मौके
वेटरन हॉकी खिलाड़ी रजनी ने बताया कि उस दौर के मुकाबले अब हॉकी खिलाड़ियों को काफी बेहतर सुविधाएं मिल रहीं हैं। पहले विदेशी टीमों के साथ खेलने का मौका कम मिलता था और मैच कम होते थे। इससे अन्य देशों की खेल की तकनीक को समझने का मौका कम मिलता था। कई बार टीम को इसके चलते हार का सामना भी करना पड़ा था। कहा, अब हॉकी खिलाड़ियों को कई बेहतर सुविधाएं मिल रहीं हैं। स्पॉन्सर भी मिल रहे हैं और साल भर मुकाबले हो रहे हैं, इससे खेल के कई दांवपेंच टीम के खिलाड़ी सीख रहे हैं। वहीं, नियमों में भी काफी बदलाव हुए हैं, जिसके चलते देश की टीम बेहतर प्रदर्शन कर रही है।
खेल को प्रोफेशन न बनाएं, देश के लिए खेलें
क्रिकेट, फुटबाल, हॉकी, बैडमिंटन, कुश्ती, एथेलेटिक्स, वॉलीबॉल या अन्य खेलों से जुड़े खिलाड़ियों को वेटरन हॉकी खिलाड़ी रजनी ने खेल को प्रोफेशन बनाने के बजाय उसे दिल से खेलने का सुझाव दिया है। कहा कि खिलाड़ियों को मिल रही तमाम सुविधाओं को देखकर कई युवा खिलाड़ी बन रहे हैं। जो गलत है। उन्होंने ऐसे युवाओं को संदेश दिया है कि खेल से देश की गरिमा जुड़ी होती है। एक-एक रन या गोल से देश का मान सम्मान जुड़ा होता है। इसलिए इसे करियर समझ कर खेलने वाले खिलाड़ी अक्सर असफल होते हैं और दिल से खेलने वाले ही आगे बढ़ते हैं।