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मेरे जनाजे की नमाज में शिरकत करना.. और ठहर गई फाजिले बरेलवी की कलम
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आला हजरत का आखिरी खत
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बरेली। आला हजरत ने अपनी जिंदगी में तमाम किताबें लिखी, फतवे लिखे, नातो मनकबत लिखी और भविष्यवाणियां की। जिंदगी का जब आखिरी वक्त आया तो बीमारी की हालत में अपने खलीफा को खत लिखा और अपनी मौत से भी आगाह कर दिया। अपनी जिंदगी के इसी आखिरी खत के साथ उनकी कलम हमेशा के लिए ठहर गई थी।
इस खत में आला हजरत ने अपने खलीफा जबलपुर के मौलाना अब्दुस्सलाम को तबियत के बारे में तफ्सील से बताया और कहा ये जान कर परेशान मत होना, न खैरियत के लिए आना। जाने का वक्त आ जाएगा तो तुम्हें तार मिल जाएगा। तब तुम्हें आना होगा। दर असल यह खत खलीफा को अयादत में लिखा था, जब उनके ऊपर गमों का पहाड़ टूटा था। एक ही वक्त में उनके भाई, पोते और पोती का इंतकाल हो गया था। इधर आला हजरत की तबियत भी खराब थी। ऐसी स्थिति में आला हजरत खुद वहां ताजियत (गम में शरीक होेने) में नहीं जा पाए तो उन्होंने खत लिखा था। यह खत आला हजरत ने 9 सफर 1340 हिजरी में लिखा था। (यानी तब भी अक्तूबर का ही महीना था और इस बार 101 वें उर्स में भी अक्तूबर है) अंग्रेजी साल 1921 था। इसके 16 दिन बाद ही 25 सफर 1340 को आला हजरत का इंतकाल हो गया था।
इस खत मजमून यूं तो लगभग चार पन्नों का है। इसमें पहले तो मौलाना अब्दुस्सलाम के अपनी तबियत के बारे में बताते हुए लिखा है कि डाक्टरों ने उन्हें हवा बदलन को कहा तो वह भवाली चले गए। फिर वहां दवा और डाक्टर नहीं मिला तो वह 17 मुहर्रम को वापस बरेली आ गए। तबियत ज्यादा खराब होने की वजह से उन्हें लारी पर लाया गया। फिर लिखा ‘मै कसम देता हूं कि आप लोग मेरी अयादत (देखने) के लिए हरगिज तकलीफ न करें। वहीं से दुआ करें और अगर वक्त आ गया तो मैं इनसे (यानी अपने साहबजादे मुफ्ती आजम हिंद हजरत मुस्तफा रजा खां की ओर इशारा था) कह दूंगा। आपको तार मिल जाएगा। मेरी नमाजे जनाजा में शिरकत बाइसे बरकत होगा’। .. उनकी कलम से लिखी गई बस यही आखिरी लाइन थी।
इस खत में आला हजरत ने अपने खलीफा जबलपुर के मौलाना अब्दुस्सलाम को तबियत के बारे में तफ्सील से बताया और कहा ये जान कर परेशान मत होना, न खैरियत के लिए आना। जाने का वक्त आ जाएगा तो तुम्हें तार मिल जाएगा। तब तुम्हें आना होगा। दर असल यह खत खलीफा को अयादत में लिखा था, जब उनके ऊपर गमों का पहाड़ टूटा था। एक ही वक्त में उनके भाई, पोते और पोती का इंतकाल हो गया था। इधर आला हजरत की तबियत भी खराब थी। ऐसी स्थिति में आला हजरत खुद वहां ताजियत (गम में शरीक होेने) में नहीं जा पाए तो उन्होंने खत लिखा था। यह खत आला हजरत ने 9 सफर 1340 हिजरी में लिखा था। (यानी तब भी अक्तूबर का ही महीना था और इस बार 101 वें उर्स में भी अक्तूबर है) अंग्रेजी साल 1921 था। इसके 16 दिन बाद ही 25 सफर 1340 को आला हजरत का इंतकाल हो गया था।
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इस खत मजमून यूं तो लगभग चार पन्नों का है। इसमें पहले तो मौलाना अब्दुस्सलाम के अपनी तबियत के बारे में बताते हुए लिखा है कि डाक्टरों ने उन्हें हवा बदलन को कहा तो वह भवाली चले गए। फिर वहां दवा और डाक्टर नहीं मिला तो वह 17 मुहर्रम को वापस बरेली आ गए। तबियत ज्यादा खराब होने की वजह से उन्हें लारी पर लाया गया। फिर लिखा ‘मै कसम देता हूं कि आप लोग मेरी अयादत (देखने) के लिए हरगिज तकलीफ न करें। वहीं से दुआ करें और अगर वक्त आ गया तो मैं इनसे (यानी अपने साहबजादे मुफ्ती आजम हिंद हजरत मुस्तफा रजा खां की ओर इशारा था) कह दूंगा। आपको तार मिल जाएगा। मेरी नमाजे जनाजा में शिरकत बाइसे बरकत होगा’। .. उनकी कलम से लिखी गई बस यही आखिरी लाइन थी।
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