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तड़पती गर्भवती को अस्पताल से भगाया ऑटो में हुआ प्रसव, नवजात की मौत

Sun, 15 Oct 2017 01:14 AM IST
बरेली।
बरेली। Updated Sun, 15 Oct 2017 01:14 AM IST
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Prostate pregnant from hospital Auto birth delivery, neonatal death
प्रसूता

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मातृ और शिशु मृत्यु दर कम करने के लिए सरकार की ओर से तमाम जतन किए जा रहे हैं, लेकिन सरकारी अस्पतालों के डॉक्टर और स्टाफ सुधरने का नाम नहीं ले रहे। प्रसव पीड़ा से तड़पते हुए महिला अस्पताल पहुंची बाकरगंज की गर्भवती शहाना यहां पांच घंटे तक भर्ती रही लेकिन उसे इस दौरान कोई इलाज नहीं मिला। उल्टे उसके परिवार के लोगों को स्टाफ खूब खरी-खोटी सुनाता रहा। शहाना को बगैर इलाज के मरता देखकर उसके परिवार वाले उसे निजी अस्पताल ले गए लेकिन रास्ते में ऑटो में ही उसका प्रसव हो गया। नवजात की तो मौत हो गई, शहाना की जान भी बमुश्किल बच सकी। 
बाकरगंज में रहने वाले नाजिम की पत्नी शहाना के गर्भ में दो बच्चे थे। शनिवार तड़के चार बजे उसे प्रसव पीड़ा शुरू हुई और एक बच्चे ने घर पर ही जन्म ले लिया और दूसरे बच्चे का एक हाथ निकल आया। शहाना के पति नाजिम ने तुरंत 102 पर कॉल किया। सुबह सात बजे एंबुलेंस आई तो परिवार के लोग शहाना को लेकर महिला अस्पताल पहुंचे। पति नाजिम और ननद अफसाना का कहना है कि महिला अस्पताल में स्टाफ ने उन्हें एक यूनिट खून तो लाने को कह दिया लेकिन साढ़े 11 बजे तक कोई भी डॉक्टर उसे देखने नहीं आया। उल्टे इस दौरान अस्पताल का स्टाफ खरी-खोटी सुनाने के साथ उन पर शहाना को अस्पताल से ले जाने का दबाव बनाता रहा। साढ़े 11 बजे के बाद जब डॉक्टर राउंड पर आए तो उन्होंने शहाना की गंभीर हालत देखकर उसे निजी अस्पताल ले जाने को कह दिया। शहाना की हालत इस समय तक काफी गंभीर हो चुकी थी। डॉक्टर के जवाब दे देने पर नाजिम ने तुरंत ऑटो बुलाया और उसे प्रेमनगर स्थित एक मैटरनिटी अस्पताल के लिए लेकर चले, लेकिन ऑटो में ही शहाना का प्रसव हो गया और नवजात की फौरन ही मौत हो गई। 
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जिला अस्पताल में मिलेगा खून, यह भी नहीं बताया
शहाना के पति नाजिम ने बताया कि महिला अस्पताल में डॉक्टर और स्टाफ ने यह तक नहीं बताया कि खून जिला अस्पताल में ही मिलता है। खून के लिए इधर-उधर भटकने के बाद नाजिम आईएमए ब्लड बैंक पहुंचे और वहां से 1500 रुपये में खून लेकर आए, जबकि जननी सुरक्षा योजना के तहत गर्भवती महिलाआें को मुफ्त खून मिलता है। गर्भकाल के दौरान शहर की आशा ने भी शहाना से संपर्क नहीं किया। 
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कितनी बार गर्भवती महिलाओं पर क्रूरता...
14 फरवरी को उमरसिया की उर्मिला को 7 घंटे तक महिला अस्पताल में इलाज नहीं मिला
4 अगस्त को संजयनगर की ममता को भी महिला अस्पताल से भगा दिया गया 
23 सितंबर को पीलीभीत की तबस्सुम स्टाफ की बदसलूकी के कारण अधूरा इलाज छोड़कर भागी
24 सितंबर को सथरी गांव की विमला भी स्टाफ के दुर्व्यवहार से तंग आकर अस्पताल से चली गई 


शहाना का हीमोग्लोबिन मात्र 4.8 ग्राम था इसलिए उसके पति को खून का इंतजाम करने को कह दिया गया था। उसकी हालत काफी खराब थी, जो बच्चा पैदा हुआ था उसे भी सेप्टिक हो गया था। खतरे को देखते हुए डॉक्टर परिवार वालों से हस्ताक्षर करने को कह रहे थे जिसके लिए परिवार वाले राजी नहीं हुए और शहाना को बिना चिकित्सकीय सलाह के ही ले गए। -डॉ. साधना सक्सेना, सीएमएस, महिला अस्पताल 
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