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तेजी से बदल रही दुनिया में समाजशास्त्रियों ने बदली ‘बुढ़ापे की लाठी’ की परिभाषा
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बरेली। आमतौर पर बच्चों को ही ‘बुढ़ापे की लाठी’ कहा जाता है लेकिन आधुनिक समाजशास्त्र में यह परिभाषा बदल गई है। नई परिभाषा यह है कि संतान के साथ अपने बुढ़ापे के लिए भी धन-संपत्ति का होना बेहद जरूरी है ताकि बुढ़ापे में अपनी जरूरी ख्वाहिशों को पूरा करने के लिए औलाद की ओर न ताकना पड़े। समाजशास्त्रियों का कहना है कि बुजुर्ग जब अपने बच्चों के हाथों में जीवन भर की कमाई सौंपने के बाद अपनी जरूरतों के लिए उनसे फरियाद करते हैं तभी स्थितियां बिगड़नी शुरू होती हैं और इस डगर का अंत ‘वृद्धाश्रम’ पहुंचने के बाद ही होता है।
समाजशास्त्री नवनीत कौर आहूजा के मुताबिक आर्थिक कमजोर वर्ग के बजाय मध्यम और उच्च आयवर्ग के परिवारों में बुजुर्गों की हालत ज्यादा खराब है। कारण यह है कि इस दौर में व्यक्तिवादी सोच हावी होती जा रही है। संयुक्त परिवार बिखर रहे हैं। अपनी इच्छाएं बढ़ रही हैं और अपनेपन के अहसास का ह्रास हो रहा है। उपभोक्तावाद तेजी से लोगों को अपनी चपेट में ले रहा है। बच्चे शादी के बाद ‘अपने परिवार’ को ज्यादा तवज्जो देते हैं तो बुजुर्ग माता-पिता अलग-थलग पड़ जाते हैं। इन परिस्थितियों में अगर बुजुर्गों ने गाढ़ी कमाई बच्चों के हाथ में सौंपी तो ज्यादातर घरों में कुछ दिन बाद सब बदलने लग जाता है। बुजुर्ग माता-पिता की बातें बोझिल और किसी सामान की मांग ‘भारी’ लगने लगती है। लिहाजा, बहस और फिर मारपीट होती है या फिर बच्चे मां-बाप को छोड़कर गुपचुप घर से कहीं चले जाते हैं। आखिर में बुजुर्गों को वृद्धाश्रम जाना पड़ता है। या बच्चे बुजुर्गों को खुद ही आश्रम भेजकर खर्चा संचालक को देते हैं।
बुजुर्गों को सुविधाएं नहीं चाहिए अपनापन
मनोवैज्ञानिक हेमा खन्ना के मुताबिक अपने बच्चों के लिए जीवन भर की कमाई लुटाने वाले बुजुर्गों को रुपया या धन दौलत नहीं चाहिए। वे सिर्फ अपनेपन का अहसास और सम्मान चाहते हैं। समय के साथ बुजुर्गों में सहनशीलता कम हो जाती है और वे बीमार होते जाते हैं। ऐसी स्थिति में बच्चों पर ही उनका भरोसा रहता है। इसी भरोसे के चलते वे अपना सब कुछ बच्चों को सौंपने को मजबूर हो जाते हैं, फिर धोखा खाते हैं। कहा, अगर बुजुर्ग संपत्ति न दें या दे भी दें, दोनों ही परिस्थितियों में उनकी स्थिति बदतर रहती है। उन्होंने बुजुर्गों को बदलते समय के साथ खुद को बदलने और अपनी जिम्मेदारियां निभाने के बाद बुढ़ापे के लिए अपनी कमाई का कुछ हिस्सा संरक्षित रखने का सुझाव दिया है।
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समाजशास्त्री नवनीत कौर आहूजा के मुताबिक आर्थिक कमजोर वर्ग के बजाय मध्यम और उच्च आयवर्ग के परिवारों में बुजुर्गों की हालत ज्यादा खराब है। कारण यह है कि इस दौर में व्यक्तिवादी सोच हावी होती जा रही है। संयुक्त परिवार बिखर रहे हैं। अपनी इच्छाएं बढ़ रही हैं और अपनेपन के अहसास का ह्रास हो रहा है। उपभोक्तावाद तेजी से लोगों को अपनी चपेट में ले रहा है। बच्चे शादी के बाद ‘अपने परिवार’ को ज्यादा तवज्जो देते हैं तो बुजुर्ग माता-पिता अलग-थलग पड़ जाते हैं। इन परिस्थितियों में अगर बुजुर्गों ने गाढ़ी कमाई बच्चों के हाथ में सौंपी तो ज्यादातर घरों में कुछ दिन बाद सब बदलने लग जाता है। बुजुर्ग माता-पिता की बातें बोझिल और किसी सामान की मांग ‘भारी’ लगने लगती है। लिहाजा, बहस और फिर मारपीट होती है या फिर बच्चे मां-बाप को छोड़कर गुपचुप घर से कहीं चले जाते हैं। आखिर में बुजुर्गों को वृद्धाश्रम जाना पड़ता है। या बच्चे बुजुर्गों को खुद ही आश्रम भेजकर खर्चा संचालक को देते हैं।
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बुजुर्गों को सुविधाएं नहीं चाहिए अपनापन
मनोवैज्ञानिक हेमा खन्ना के मुताबिक अपने बच्चों के लिए जीवन भर की कमाई लुटाने वाले बुजुर्गों को रुपया या धन दौलत नहीं चाहिए। वे सिर्फ अपनेपन का अहसास और सम्मान चाहते हैं। समय के साथ बुजुर्गों में सहनशीलता कम हो जाती है और वे बीमार होते जाते हैं। ऐसी स्थिति में बच्चों पर ही उनका भरोसा रहता है। इसी भरोसे के चलते वे अपना सब कुछ बच्चों को सौंपने को मजबूर हो जाते हैं, फिर धोखा खाते हैं। कहा, अगर बुजुर्ग संपत्ति न दें या दे भी दें, दोनों ही परिस्थितियों में उनकी स्थिति बदतर रहती है। उन्होंने बुजुर्गों को बदलते समय के साथ खुद को बदलने और अपनी जिम्मेदारियां निभाने के बाद बुढ़ापे के लिए अपनी कमाई का कुछ हिस्सा संरक्षित रखने का सुझाव दिया है।
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