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टीवी पर उलमा का बहस करना नजायज
ब्यूरो, अमर उजाला बरेली
Updated Mon, 15 Aug 2016 12:50 AM IST
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टीवी पर उलमा की तकरीर, लंबी-लंबी बहस का दिखाई देना आज कल आम बात है। मगर यह शरियत के एतबार से ठीक नहीं माना गया है। इस पर दरगाह आला हजरत स्थित मरकजी दारुल इफ्ता से फतवा जारी करते हुए इसे नाजायज करार दिया गया है।
यह फतवा मरकजी दारुल इफ्ता के मुफ्ती मोहम्मद नाजिम अली कादरी ने जारी किया है। इसमें उन्होंने लिखा है कि टीवी वीडियो जायज नहीं, उस पर तकरीर और बहस करना भी नाजायज है। इसकी तफसील के लिए उन्होंने ताजुश्शरिया मुफ्ती अख्तर रजा खां (अजहरी मियां) की किताब ‘टीवी वीडियो का आपरेशन और शरई हुक्म’ का हवाला दिया है। जिसमें टीवी वीडियों को शरियत के रोशनी में हराम करार दिया गया है।
इस मुद्दे पर फतवे के लिए शाहबाद निवासी गुलफाम अंसारी ने दारुल इफ्ता में सवाल डाला था। इसमें उन्होंने पूछा है कि उलमा हजरात टीवी पर तकरीर किया करते हैं और बहसो मुबाहिसे करते हैं। शरियत की नजर में यह जायज है या नहीं। कुरान व हदीस के रोशनी में मसले को वाजे करें। इस संबंध में दारुल इफ्ता के ही मुफ्ती गुलाम मुस्तफा नूरी का कहना है कि यूं तो यह पूरी एक बहस का मुद्दा है। फिर भी टीवी पर जो तस्वीर आती है वह तस्वीर है भी या नहीं। तस्वीर होने की वजह से यह शरियत में हराम है। टीवी आज के दौर की वाहियात चीज है। यह नाच गाने का जरिया है जो शरियत में हराम है। इसी लिए टीवी पर आकर उलमा का बहस करना और लोगों का देखना दोनों ही हराम है। तस्वीर के मुद्दे पर आला हजरत इमाम अहमद रजा खां फाजिले बरेलवी, उनके पीर हजरत सय्यद मुस्तफा हसन मियां खानकाह बरकातिया मारहरा शरीफ, मुफ्ती आजम हिंद मुसतफा रजा खां, हजरत तहसीन रजा खां सहित दुनियां भर के तमाम धर्मगुरुओं ने फतवा दे रखा है।
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यह फतवा मरकजी दारुल इफ्ता के मुफ्ती मोहम्मद नाजिम अली कादरी ने जारी किया है। इसमें उन्होंने लिखा है कि टीवी वीडियो जायज नहीं, उस पर तकरीर और बहस करना भी नाजायज है। इसकी तफसील के लिए उन्होंने ताजुश्शरिया मुफ्ती अख्तर रजा खां (अजहरी मियां) की किताब ‘टीवी वीडियो का आपरेशन और शरई हुक्म’ का हवाला दिया है। जिसमें टीवी वीडियों को शरियत के रोशनी में हराम करार दिया गया है।
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इस मुद्दे पर फतवे के लिए शाहबाद निवासी गुलफाम अंसारी ने दारुल इफ्ता में सवाल डाला था। इसमें उन्होंने पूछा है कि उलमा हजरात टीवी पर तकरीर किया करते हैं और बहसो मुबाहिसे करते हैं। शरियत की नजर में यह जायज है या नहीं। कुरान व हदीस के रोशनी में मसले को वाजे करें। इस संबंध में दारुल इफ्ता के ही मुफ्ती गुलाम मुस्तफा नूरी का कहना है कि यूं तो यह पूरी एक बहस का मुद्दा है। फिर भी टीवी पर जो तस्वीर आती है वह तस्वीर है भी या नहीं। तस्वीर होने की वजह से यह शरियत में हराम है। टीवी आज के दौर की वाहियात चीज है। यह नाच गाने का जरिया है जो शरियत में हराम है। इसी लिए टीवी पर आकर उलमा का बहस करना और लोगों का देखना दोनों ही हराम है। तस्वीर के मुद्दे पर आला हजरत इमाम अहमद रजा खां फाजिले बरेलवी, उनके पीर हजरत सय्यद मुस्तफा हसन मियां खानकाह बरकातिया मारहरा शरीफ, मुफ्ती आजम हिंद मुसतफा रजा खां, हजरत तहसीन रजा खां सहित दुनियां भर के तमाम धर्मगुरुओं ने फतवा दे रखा है।
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